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सशक्त होता भारत

Written byArchiveArchive
Jun 27, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 27 Jun 2016 12:44:07

5 जून , 2016  
आवरण कथा 'करार से बहार'  से यह बात स्पष्ट है कि भारत ने कूटनीति का परिचय देते हुए चाबहार संधि क
माध्यम से अफगानिस्तान और ईरान का ह्दय जीत लिया। इस संधि से आपसी संबंध तो मजबूत होंगे ही, संस्कृति और व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा। इस संधि के होने से तीनों देशों का और अधिक विकास होने वाला है।
—अनुराग सिरोही, जयपुर (राज.)

ङ्म    ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के नजरिये से समुद्र के रास्ते व्यापार की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इस रास्ते से यूरोप तक माल भेजने में लगने वाले समय और खर्च में भारी बचत होगी। नरेन्द्र मोदी सरकार इसके लिए काफी समय से प्रयासरत थी और अंत में उसने कुशल कूटनीति का परिचय दिया और अपने सपने को साकार कर दिखाया।
—कृष्ण वोहरा, सिरसा (हरियाणा)

कहां हैं मानवाधिकार संगठन?
रपट 'दोराहे पर खड़ा बंगलादेश(22 मई,2016)' से जाहिर होता है कि मजहबी कट्टरता और हत्याओं के दौर में बंगलादेश सभ्य समाज के माथे पर बदनुमा दाग है। दुनिया के कई देश उद्योग, विज्ञान, कृषि के क्षेत्र में आसमान छू रहे हैं वहीं बंगलादेश और पाकिस्तान जैसे देश आतंक का पर्याय बने हुए हैं। बंगलादेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष विचार रखने वालों की चुन-चुन कर हत्या की जा रही है। इतना सब होने के बाद भी सरकार चुप्पी साधे बैठी है। ऐसा लग रहा है कि शासन-प्रशासन ने इनके आगे समर्पण कर दिया है या फिर अंदर ही अंदर सांठगांठ है । सवाल यह उठता है कि आज पूरे विश्व में मानवाधिकार संगठन सक्रिय हो कर काम कर रहे हैं लेकिन इस निर्ममता को लेकर वे मौन क्यों?
—राजकुमार कनौजिया, रोहतक (हरियाणा)

सेकुलर दलों का विष वमन
रपट 'सत्ता के नशे में डूबते-इतराते नेता (22 मई,2016)'से स्पष्ट होता है कि देश के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाने वालों का समर्थन कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की हकीकत को उजागर करने के लिए काफी है। शिक्षा के मंदिर में आज देश के विकास की बात न होकर देश तोड़ने की बात की जा रही है। शायद इससे दुर्भाग्यपूर्ण देश के लिए और क्या हो सकता है। कांग्रेस ने हर मौके पर देश विरोधी लोगों को समर्थन किया है। चाहे वह आतंकी इशरत जहां की बात हो या फिर जेएनयू विश्वविद्यालय में घटित घटना। हर उस जगह उसने वोट बैंक की राजनीति खेली और अपने स्वार्थ को साधने का प्रयास किया।
                        —हरिओम जोशी, ईमेल से
 
ङ्म    कुछ समय से देश में कुछ लोगों द्वारा माहौल बिगाड़ने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। उनके द्वारा ऐसा प्रयास किया जा रहा है कि देश अशांत हो जाये। समाज आपस में लड़ने लगे, जाति-पांति की खाई चौड़ी हो जाए और जिसके बाद वे वोट बैंक की रोटियां सेंक सकें। समाज को ऐसे लोगांे से सचेत रहना है और किसी भी गतिविधि का मुंहतोड़ जवाब देना है।
—कुंदन जायसवाल, कानपुर(उ.प्र.)

ङ्म    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नकल करने चले हैं। लेकिन वे भूल गए कि नकल के लिए भी अक्ल चाहिए। गुजरात के नक्शेकदम पर बिहार में उन्होंने शराबबंदी तो लागू कर दी लेकिन मोदी के गुजरात की तरह अपराध मुक्त समाज बनाना उनके बस की बात नहीं है। आप प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब जरूर देखें, लेकिन घोटाला विरासत की पोषक राजनीति के जरिये देश के लोकतंत्र  से खिलवाड़ करने की छूट आपको हरगिज नहीं मिल सकती।
—शौम्या चौहान, ईमेल से

विकास की ओर अग्रसर भारत
रपट 'राह लंबी, संकेत शुभ (29 मई, 2016)' में सरकार के कामकाज को विस्तृत ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कोई भी सरकार सभी के मनों को सतुष्ट नहीं कर सकती, यह बिल्कुल असंभव काम है। पर आज की केन्द्र में आसीन नरेन्द्र मोदी सरकार देश के 125 करोड़ देशवासियों के लिए काम कर रही है। प्रधानमंत्री हर मौके पर इस बात का जिक्र भी करते हैं। यह भी सत्य है कि दो साल में देश ही नहीं, विदेशों में भारत की छवि में काफी बदलाव आया है। विकास और प्रगति के रास्ते खुले हैं। आज हर देश भारत के साथ मित्रता करने को आतुर है। साथ ही देश में सरकार ने विभिन्न योजनाओं के माध्यम से हर क्षेत्र में काम किया है।
                                —स्नेहलता वर्मा, ईमेल से

ङ्म    अमेरिकी संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण और कई बार तालियों की गड़गड़ाहट और अमेरिकी सांसदों द्वारा उनके ऑटोग्राफ लेने के लिए उत्सुकता, जाहिर करता है कि देश ही नहीं विश्व में भी नरेन्द्र मोदी के विचारों और उनकी कार्यशैली को सब पसंद करते हैं।  अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर तेजी से उभरते विश्व के विशालतम लोकतंत्र भारत की सशक्त छवि देश के लिए शुभ संकेत है।
—बी.के.मंगल, मेरठ (उ.प्र.)
ङ्म    भारत के प्रति निष्ठा, समर्पण बढ़ रहा है। विश्व में भारत का नाम ऊंचा हो रहा है। लेकिन यह भी देखने में आ रहा कि भारत भारत की ओर न जाकर इंडिया की ओर ज्यादा झुक रहा है। भारत सरकार अनेक योजनाओं का नाम अंग्रेजी में रखती है। गरीब, गांव की जनता और किसान इन योजनाओं को समझ ही नहीं पाते। जब तक हम गांव तक नहीं पहुंचेंगे तब तक भारत-भारत नहीं बनेगा। भारत की जय का अर्थ सबका विकास सबका साथ होना चाहिए। भारत की विजय यही है।
—वैद्य अजय गर्ग, बिजनौर (उ.प्र.)
 
इन से लें प्रेरणा
रपट 'इरादों से फूटी जलधारा' अच्छी लगी। पानी पर हायतौबा मचाने वाले लोगों को इस रपट को जरूर पढ़ना चाहिए। कुछ लोग होते हैं जो थोड़ी सी समस्या आने पर शोर मचाना शुरू कर देते हैं और ऐसा माहौल तैयार कर देते हैं जैसे संकट बहुत बड़ा हो। हां, ये बात सत्य है कि देश के कई हिस्सों में पानी की कमी से काफी समस्या हुई है। लेकिन एक तरफ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने पानी की कमी को दूर करने के लिए रास्ता खोज निकाला।
                  —विष्णुप्रभाकर, साशाराम (बिहार)

समाज का आईना मीडिया
आवरण कथा 'खबर सच है (22 मई, 2016)' से जाहिर होता है कि नारंद जयंती के कार्यक्रमों के जरिये समाज पत्रकारिता को ठीक ढंग से समझेगा। नारद जयंती के कार्यक्रमों में पत्रकार और पत्रकारिता के धर्म पर विभिन्न वरिष्ठ पत्रकारों के कर्तव्य, दायित्व सीमा व वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देश-समाज को सही दिशा देने में निष्पक्ष पत्रकारिता के सहयोग को रेखांकित किया जा रहा है। आज कुछ पत्रकार अपना दायित्व भूलकर गलत समाचार परोसने का काम कर रहे हैं, जो ठीक नहीं है। पत्रकारिता का काम समाज को सच से परिचित कराना है और जो ऐसा नहीं करते हैं वह अपने पत्रकारिता धर्म का पालन नहीं करते हैं। पत्रकारों को चाहिए कि वह अपने धर्म का पालन करें।
—प्रेम शर्मा, टोंक (राज.)
विचारधारा की जीत
रपट 'नया दौर (29 मई,2016)' से एक बात स्पष्ट है कि पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य में भाजपा की जीत केवल राजनीतिक जीत ही नहीं वरन् वैचारिक जीत है। देश में जिस प्रकार राष्ट्रीय संस्कृति पर आघात करने का कुचक्र किया जा रहा है, उसे देशवासी समझ चुके हैं। पांच राज्यों में भले ही भाजपा ने एक राज्य में जीत हासिल की है लेकिन हर राज्य में उसका जनाधार और उसके मत प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है। केरल में भाजपा ने एक सीट जीतकर एक इतिहास रचने का काम किया है। यह विजय राष्ट्रवादी विचारों की विजय है। सबसे दुर्गति कांग्रेस की हुई जिसने सात दशक तक देश के साथ विश्वासघात किया। अगर स्थिति ऐसी ही रही तो वह दिन दूर नहीं जब वास्तव में कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार होगा।
—रमेश कुमार मिश्र, अंबेडकर नगर (उ.प्र.)

ङ्म    कुछ समय से यह देखने में आया है कि पत्रकारों पर सच बोलने और निष्पक्ष समाचार देने के कारण हमले ही नहीं हुए बल्कि बिहार जैसे प्रदेश में हत्या तक कर दी गई। इससे साफ जाहिर है कि यह कार्य आसान नहीं है। साथ ही यह लोकतंत्र के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है। अब ऐसे में कौन पत्रकार सच्ची खबर देने का साहस करेगा, यह सोचने का विषय है। सरकार को पत्रकारों की सुरक्षा और उन पर होते हमलों को गंभीरता से लेना होगा।
—दया सागर, रीवा (म.प्र.)

ये है इनकी हकीकत
वामपंथ  की शुरुआत ही स्वतंत्रता आन्दोलन की शक्तियों को कुंद करने के लिए हुई थी।  संदर्भ 'एसएफआई में स्वतंत्र विचारों के लिए कोई जगह नहीं' में स्पष्ट रूप से इनकी कारगुजारियां देखने को मिल जाती हैं।' वामपंथियों का स्वतंत्रता,अस्मिता, एकता और भारतीय संस्कृति से कुछ लेना-देना नहीं है। आज शैक्षिक संस्थानों और अकादमियों पर कांग्रेस की मिलीभगत से इनका एकाधिपत्य है। कुछ दिन पहले जेएनयू मे घटी घटना और वामपंथी नेताओं का वहां जुटना इसका तात्कालिक प्रमाण है। पूर्वोत्तर के अधिकतर राज्यों में कम्युनिस्ट शासनतंत्र की कारगुजारियों से सभी अवगत हैं। इन सभी राज्यों में आज कन्वर्जन के दम पर ईसाई जनसंख्या प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। वामपंथ लोकतांत्रिक मूल्यों से परे, एकाधिपत्य, तानाशाही और हिंसा और प्रतिहिंसा में विश्वास रखता है। पश्चिम बंगाल और केरल में इसकी हिंसात्मक वृत्ति चरम पर है। समाज को तोड़ने और जातिपंाति की खाई को चौड़ा करने के लिए शोषित-पीडि़त एवं दलित संघर्ष के नाम पर राष्ट्र की अस्मिता एवं स्वतंत्रता के विरुद्ध लोगों को उकसाना इनका काम है। मानवाधिकार के नाम पर अलगाववादियों का समर्थन करना भी इनके कार्य का एक हिस्सा है। इस बात को कहने में बिलकुल संकोच नहीं है कि ये रक्त और रंग से तो भारतीय लेकिन विचार, नैतिकता से अंग्रेज हैं। इसलिए ये धर्म, भाषा और संस्कृति को नाकारा कहकर अंग्रेजियत, उपभोक्तावाद और अंग्रेजी के पक्षधर हैं। ये दिल्ली में बैठकर शोषित-पीडि़त और दलितों की खूब बात करते देखे जा सकते हैं लेकिन जमीन पर इनका काम शून्य है। ये रोहित वेमुला पर तो शोर मचाते हैं लेकिन कन्नूर में स्वयंसेवको की हत्याओं पर इनके मुंह पर ताले जड़ जाते हैं।
                                                    -डॉ. सिद्धेश्वर काश्यप
                          हिंदी विभाग, बी.एन.मंडल विवि., मधेपुरा (बिहार)

तुष्टीकरण की राजनीति
यू़पी. की सरकार का, कैसा रंग कमाल
कैराना तो नाम है, बुरा सब तरफ हाल।
बुरा सब तरफ हाल, माफिया ऐसे छाए
कैसे हो व्यापार, किस तरह रोटी खाएं ?
कह 'प्रशांत' भयभीत हिन्दु कर रहे पलायन
कुछ मत बोलो, यहां मुलायम का है शासन॥ 

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