''एक रोटी है तो आधी-आधी खाएंगे पर आत्महत्या नहीं''
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''एक रोटी है तो आधी-आधी खाएंगे पर आत्महत्या नहीं''

Written byArchiveArchive
Jun 27, 2016, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 27 Jun 2016 13:29:38

 

 

       
मायानगरी में पारंपरिक नायकों से अलग अभिनय शैली के कारण अपनी खास पहचान रखने वाले अभिनेता नाना पाटेकर महाराष्ट्र के किसानों की टूटती सांसों को संभालने का काम कर रहे हैं। सहज-खरी छवि वाले नाना का यह रूप उनकी स्थापित छवि के करीब है। अब तक वे हजारों किसान परिवारों का सहारा बन चुके हैं। नाना कहते हैं, ''मैं आखिरी सांस तक देश के किसानों के साथ हूं।''  किसानों की समस्याएं और चुनौतियों को लेकर उनसे  लंबी बातचीत की पाञ्चजन्य संवाददाता अश्वनी मिश्र ने। प्रस्तुत हैं  वार्ता के प्रमुख अंश :-

 

 आपकी पहचान खरी बात करने वाले अभिनेता के रूप में है। अभिनय की इतनी व्यस्तता के बावजूद आप किसानों के लिए काम कर रहे हैं। अचानक किस घटना ने झकझोरा जो आप स्टूडियो छोड़ किसानों के आंसू पोंछने के लिए निकल पड़े?
मैं एक दिन टी.वी. पर एक साक्षात्कार देख रहा था, जो एक किसान परिवार से जुड़ा था। उसमें बच्चे और उनके परिवारवालों का साक्षात्कार चल रहा था। वे जिस तरह से अपनी व्यथा बता रहे थे वह पल मेरे लिए बड़ा अजीब था।  मुझसे यह देखा नहीं जा रहा था। मैंने मन ही मन कहा कि ये क्या है? घर का प्रमुख व्यक्ति गुजर गया और हालत यह है कि आंखों में पानी तक नहीं है। इतने सूख गए हैं लोग। ऐसे में हम यहां बैठकर क्या कर रहे हैं? इस घटना ने मुझे झकझोरा। मैंने खुद से कहा कि आज तक तो मैंने कुछ नहीं किया पर अब जरूर कुछ करूंगा। मेरे एक दोस्त मकरंद हैं। मैंने उससे कहा कि तुम्हारे पास मेरे डेढ़ करोड़ रुपये रखे हैं, मन था कि इस पैसे से एक नई गाड़ी लूंगा। पर अब इस पैसे को जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं, उनमें 15-15 हजार के हिसाब से बांट दो। यह पैसा जितने भी लोगों को मिलेगा कम से कम उनको तो राहत होगी। उसने मुझसे कहा कि एक काम करिये नाना जी आप एक जगह खुद चलकर किसानों को राहत सामग्री दीजिये। बाकी जगह हम करते हैं। मैं इसके लिए सहमत नहीं था लेकिन उसके ज्यादा कहने पर मैं गया। जहां मैं गया वहां एक जगह पर करीब 150 विधवाएं, जिसमें कुछ तो किशोरियां ही थीं, उनको देखकर लगा कि अगर इसमें एक बेटी मेरी होती तो मैं क्या करता?  लगा कि अब इनके लिए कुछ करना ही है। और यह पल था कि मुझे मरते दम तक काम करने की एक वजह मिल गई। मेरी एक ही अपील रहती है कि सरकार अपनी ओर से जो करना है वह कर ही रही है। लेकिन हम सभी निजी तौर पर कुछ करें तो ही स्थितियां बेहतर होंगी। सरकार तो हमारी ही है न। सरकार हमने ही चुनी है। अगर आमजन को लगता है कि हां हम दस लोगों के लिए कुछ कर सकते हैं तो हम सभी को करना चाहिए।

 आपने किसानों के लिए अब तक क्या-क्या किया है?
जहां नहरें हैं हम उनको व्यवस्थित करने का काम कर रहे हैं। कम से कम 540 किमी. में यह काम हो गया है। अगर यही कार्य सरकार के दायरे कराया जाता तो करोड़ों रुपये खर्च हो जाते। लेकिन यह सब काम हमने 12 से 15 करोड़ में ही कर दिया है। यह काम इतने कम पैसे में इसलिए संभव हो पाया क्योंकि इसमें हजारों की संख्या में जनसहभागिता है। किसी ने पैसे दिये, किसी ने मशीन दी, कोई खुद काम में लग गया। इसलिए काम और उसके खर्च की गिनती करना मैं ठीक नहीं समझता। क्योंकि ये सब करते हुए और उनकी पीड़ा देखकर दर्द ज्यादा होता है। मैं तो दो वक्त की रोटी आराम से खा सकता हूं लेकिन ये क्यों नहीं खा सकते? साथ ही इस सबसे जुड़ने की एक और वजह है कि मैं भी यहीं से हूं। मैंने भी 13 वर्ष की उम्र में नौकरी करनी शुरू कर दी थी। मुझे भी एक वक्त की रोटी मिलती थी और 35 रुपये पगार। तो मुझे अच्छे और खराब दिनों का अच्छी तरह से अनुभव है। आज मैं जो काम कर रहा हंू असल में मैं नहीं, लोग कर रहे हैं। क्योंकि मेरा मानना है कि अगर कल मैं गुजर जाऊंगा तो 'नाम' नहीं गुुजरना चाहिए। 'नाम' रहने के लिए उस तरह के लोग हमें तैयार करने होंगे। क्योंकि मैं चला जाऊंगा तो दूसरा इसे हाथ में लेगा।
ल्ल    आपके अभियान में अभी तक कौन-कौन लोग जुड़े हैं। किसानों की मदद के लिए आगे क्या करने का विचार है?
इसमंे सभी आम लोग हैं, कोई खास नहीं है। एक राजीव खेडे़कर हैं, वरिष्ठ अधिवक्ता उज्जवल निकम हैं और ऐसे ही बहुत से लोग हैं जो अभियान में मदद के लिए आगे आए हैं।  दूसरे इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर सोचना होगा। पैसे आते रहेंगे लेकिन इसके लिए कार्यक्रम होना चाहिए। अभी हमारे 18 गांव हो गए हैं, जहां काम चल रहा है। इस काम में जो भी मदद के लिए कहता है, मैं उससे बस एक ही बात कहता हूं अपनी ओर से जितना कर सकते हो करो। आप ये सोचो कि आप किसानों के लिए काम कर रहे हैं। कम या ज्यादा, कुछ तो करते रहो। क्योंकि पता नहीं किस दिन ऊपर से बुुलावा आ जाये।

 महाराष्ट्र सहित पूरे देश में किसानों की आत्महत्या चिंता का विषय है। आखिर चूक कहां रह रही है। आपका क्या मानना है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाये?
इसके लिए किसान की तरह सोचना होगा। सबसे पहले मेरी किसान होने के नाते बड़ी जरूरत बिजली और पानी है। अगर ये मिल जातीं हैं तो उसके बाद हम कुछ नहीं मांगेंगे आपसे। पहले हमारे पास ढेर सारा पानी था, लेकिन तब आबादी सीमित थी। अब आबादी ज्यादा है। जमीन उतनी है, उपज उतनी है और आबादी बढ़ती जा रही है। तो समस्या यह है कि आबादी के बारे में कोई बोल ही नहीं रहा है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यही है। दूसरी बात है पानी और बिजली। ये अगर असानी से मिल जाये और इसके लिए हमें भीख मांगनी न पड़े तो उसके बाद तो हमारा गुजारा आराम से होगा। स्वतंत्रता के बाद अब तक शासन-व्यवस्था किसानों की मूलभूत जरूरतंे भी पूरी नहीं कर सके यह चिंता की बात है।

   यह सच है कि आप ने सैकड़ों परिवारों का दर्द बांटने और उनके आंसू पोंछने का काम किया है, लेकिन समस्या इतनी बड़ी है कि आप जो मदद कर रहे हैं, वह ऊंट के मुंह में जीरे जैसी ही है। यह बात सोच कर आप परेशान नहीं होते हैं? 

देखिये, मैं किसान की तरह सोचता हूं। मुझे महसूस हो रहा है कि मेरा यानी किसानों का कोई नहीं है। मैं बिलकुल अकेला हो चुका हूं। मैं जिऊं या मरूं, इसकी किसी को कोई चिंता नहीं है। बात यह नहीं है कि आप दो निवाले मुंह में डालो। आप कुछ मत डालो, लेकिन कम से कम ये तो कहो कि मैं तुम्हारे साथ हूं। आज मैं जो बिलकुल अकेला महसूस करता हूं यही वजह है कि मैं खुदकुशी करूं। ये अकेलापन ही है जो हमें मजबूर करता है आत्महत्या के लिए। बिल्कुल सही बात है कि मैं जो मदद कर रहा हूं वह बहुत ही कम है। लेकिन मेरा उनसे एक ही कहना है कि तुम अकेले नहीं हो मैं हूं तुम्हारे साथ। पर किसी भी कीमत पर आत्महत्या नहीं। एक रोटी है तो आधी-आधी खाएंगे। आधी है तो उसकी भी आधी करके खाएंगे। नहीं है तो सिर्फ पानी पिएंगे लेकिन खुदकुशी नहीं। और मुझे लगता है कि पिछले साल जो दु:खद घटनाएं घटीं इस साल ईश्वर की कृपा से कुछ भी नहीं होगा।

    महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के लिए हर संभव मदद का भरोसा दिया है। क्या आप सहायता से संतुष्ट हैं? साथ ही उसे किन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए?
महाराष्ट्र सरकार ने इस बार किसानों के लिए बजट में बहुत कुछ दे दिया है। लेकिन उसका अमल कैसे होगा, हो रहा है या नहीं हो रहा है, इस बात की जानकारी मुझे नहीं है। लेकिन एक बात जो खटकती है वह यह कि जो किसान अन्न उगाता है, उसका मूल्य तो हमें पता ही होना चाहिए। दवाई, पानी की बोतल, सोना-चांदी सबका मूल्य लगभग तय है, लेकिन  किसान के अनाज की कीमत तय नहीं है। हमें पता तो होना चाहिए कि हमने जो उगाया है, उसकी कीमत क्या है? वह सोना है या मिट्टी। आप कभी सौ रुपये बाहर खुले आसमान में रख दीजिये। आपको नींद नहीं आएगी। लेकिन हमारी तो पूरी की पूरी आमदनी आसमान के नीचे होती है। ओले गिरते हैं तो हमारी आमदनी गई, वर्षा हो जाये तो हमारी फसल बर्बाद। तो इस सबकी चिंता सरकार को करनी ही होगी।

केन्द्र और राज्य सरकार से किसानों के संबंध में क्या कहना चाहते हैं?
पहली बात तो मैं न भाजपा का हूं और न  ही कांग्रेस या अन्य किसी दल का, इसलिए मुझे न किसी की निंदा करनी है और न ही सराहना। मुझे जो लग रहा है, वह मैं कह रहा हूं। इस बार महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के हित में बहुत कुछ करने की कोशिश की है और केन्द्र से भी भरपूर सहायता महाराष्ट्र को मिल रही है। तो मुझे अगर कोई बात खलती भी है तो इस समय के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडनवीस से कह देता हूं। मेरे उनके साथ अच्छे दोस्ताना संबंध हैं। (हंसते हुए) वैसे, मेरी किसी भी दल के किसी भी व्यक्ति से कोई दुश्मनी नहीं है। तो मैं उनको भी जाकर बोल सकता हूं कि ये गलत है और ये सही है।

 खेती-किसानी के प्रति राजनेताओं की उदासीनता के साथ ही जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं, उनके लिए आपका क्या संदेश है?
मेरा देश के सभी किसानों से एक ही कहना है कि आत्महत्या नहीं। क्योंकि मेरे साथ मिट्टी है। एक दाना बोते हैं तो वह मुझे सौ दाने देती
है। हमें खुद पर,जमीन पर और आसमान पर भरोसा रखना चाहिए। सरकारों से मैं एक ही बात कहना चाहूंगा कि जिसने भी किसानों के लिए काम करना और उनके बारे में सोचना शुरू
कर दिया, वह जिंदगी भर राज करेगा। और
अगर इनके घर में सूखा तो सबके घर मंे
सूखा होगा।    

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