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80 के दशक से बचपन बचाने के अभियान में लगे नोबल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी बाल कल्याण एवं अधिकार संरक्षण के लिए निरंतर सक्रिय रहे हैं। 'आजाद बचपन की ओर' नामक पुस्तक इनके लेखों का संकलन है जिसमें व्यावहारिक अनुभव, चुनौतियों और समाधान के उपायों का विवरण है। मुक्ति का सपना, बचपन की आजादी, बिकता बचपन, बचपन की सुरक्षा, टूटेंगी दासता की बेडि़यां, शिक्षा मुक्ति का औजार, बच्चे और धर्म आदि शीर्षकों में विभक्त अलग-अलग अध्याय हैं। इन लेखों में मासूम बचपन के प्रति संवेदनशील एवं सहज होने का व्यक्तिगत एवं सामाजिक भाव निरूपित किया गया है। उसके बाद बच्चों का अनेक प्रकार से शोषण होने की चिंता के साथ बालश्रम से जुड़े मानवाधिकार आदि का जिक्र है। इसमें बच्चों के बिकने तक के अमानवीय कृत्य का भी उल्लेख है।
बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं और सभी में एक समान ऊर्जा और प्रतिभा होती है गरीब और अभावग्रस्त परिवार का बच्चा ही अपने बचपन को तिलांजलि देकर मजदूरी और दासता में अपने सपनों, इच्छा और आकांक्षाओं को झोंक देता है। लेखक बाल मित्र गांव बनाने पर जोर देते हैं- ''नई रणनीति के तहत कारखानों और कार्यस्थलों में कैद कर दिए गए बच्चों की मुक्ति के लिए छापामार कार्रवाई जरूरी है। न्यायपालिका की सहायता के साथ नागरिकों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। देश में लगभग 1 लाख 20 हजार छोटे बच्चों का प्रतिवर्ष गायब होना भी चिंता का विषय है।''
बाल तस्करी के केन्द्र के रूप में असम के स्थापित होने पर पूरा एक अध्याय है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर में चाय के बागानों, देश के अन्य क्षेत्रों में ईंट भट्ठों, बीड़ी उद्योग और पटाखे के काम में मासूमों को बंधुआ बना दिया जाता है। कुछ राज्यों में बाल किशोर अपराधियों की संख्या बढ़ी है, जो चिंताजनक है। वास्तव में बहुत राज्य सरकारें बाल कल्याण के नाम पर लाए गए केन्द्रीय बजट को इधर से उधर करने में देर नहीं लगातीं। त्रासदी से पीडि़त बच्चों का ज्यादा अमानवीय शोषण बहुत चिंताजनक है। बचपन को निर्भय और सुरक्षित बनाने के लिए यह संकल्प जरूरी है- ''बच्चों का यौन उत्पीड़न शरीर, मन और आत्मा पर लगा ऐसा जख्म है, जिसे भर पाना बहुत कठिन होता है। इसे हमें हर हाल में रोकना होगा।''
पुस्तक में नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों पर चिंता व्यक्त की गई है। वर्ष 2014 में लगभग 9000 यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों में से 2014 तक मात्र एक प्रतिशत मामलों में ही दोषियों को सजा हुई। लेखक इस मासूम बचपन को बचाने के लिए सामाजिक सुरक्षा और कानून को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। बच्चों के प्रति बढ़ती अपनों की क्रूरता, जिम्मेदारी का अभाव और अमानवीयता बताते हैं- ''कितने शर्म की बात है कि यौन उत्पीड़न और हिंसा की चपेट में आए आधे से ज्यादा बच्चे अपने परिचितों, रिश्तेदारों या शिक्षकों की दरिंदगी और हवस का शिकार होते हैं। ऐसी घटनाओं के शिकार 70 प्रतिशत पीडि़त बच्चे तो कभी किसी को अपनी आपबीती तक नहीं बताते।'' स्वयं लेखक के शब्दों में- ''मैंने पैंतीस सालों में इन्हीं विचारों की ताकत को संगठनों व संस्थाओं के निर्माणों, सरकारी महकमों के गहन शोध प्रबंधों,कॉर्पोरेट जगत की नीतियों, राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय कानूनों और सरकारी बजटों में परिवर्तित होते देखा है''। कुल मिलाकर 'आजाद बचपन की ओर' पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।
ल्ल सूर्य प्रकाश सेमवाल
पुस्तक का नाम
आजाद बचपन की ओर
लेखक
कैलाश सत्यार्थी
पृष्ठ : 240, मूल्य : 400 रुपए मात्र
प्रकाशक
प्रभात प्रकाशन
आसफ अली रोड़, नई दिल्ली










