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विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए मालदा और उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में उभारे जा रहे सांप्रदायिक तनाव का परिणाम है कालियाचक का हिंसाचार; ममता सरकार के लिए यह चेतावनी की घंटी है
नीरेन्द्र देव
28 दिसम्बर 2015-दोपहर करीब 12 बजे कालियाचक के पास डांगा गांव में कुछ विस्फोट हुए। यह स्थान ममता बनर्जी के शासन बाले पश्चिम बंगाल के मालदा शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर है। विस्फोट में कम से कम दो नौजवान मारे गए और दो अन्य घायल हुए।
3 जनवरी 2016-सुबह करीब 9.30 बजे डेढ़ लाख से ज्यादा मुस्लिम नागरिक कथित हिन्दू महासभा नेता कमलेश तिवारी के बयानों के विरुद्ध प्रदर्शन करने के लिए कालियाचक इलाके में इकट्ठे हुए। एक स्थानीय मजहबी गुट इदारा-ए-शरिया ने कमलेश तिवारी के कथित बयान पर 'अफसोस' जताते हुए, उसकी भर्त्सना करते हुए कुछ पर्चे बांटे। गुट ने मुसलमानों और मोहम्मद के बताए रास्ते पर चलने वालों से इस तरह के बयानों की भर्त्सना करने और उचित कार्रवाई की मांग करने की अपील की थी। भीड़ धीरे-धीरे हिंसक होती गयी और इसने साम्प्रदायिक रंग लेते हुए बीएसएफ के दल से झड़प मोल ली, स्थानीय हिन्दू घरों पर पथराव किया और बाद में बहुत खूबसूरत बने कालियाचक पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया।
हैरानी की बात है कि कमलेश तिवारी का बयान 11-12 दिसम्बर के आस-पास आया था और वह भी समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां के रा.स्व. संघ के अधिकारियों के विरुद्ध दिए विवादित बयानों पर प्रतिक्रिया स्वरूप दिया गया था। तकनीकी रूप से, पश्चिम बंगाल और उसमें भी दूरस्थ मालदा का आजम खां या कमलेश तिवारी से कुछ लेना-देना ही नहीं था। यानी सारा मामला राजनीतिक था, नेताओं की जमात तथा अपराध के बीच साठगांठ का था। लेकिन इसमें भी एक पेच है।
स्थानीय लोगों, कुछ समझदार किस्म के लोगों की राय में मालदा में हालात को जरूरत से ज्यादा उछाला गया, जिसके पीछे 'स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य' थे। उनको पिछले कुछ महीनों से आशंका थी कि मालदा और उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में राजनीतिक तथा सांप्रदायिक तनाव उभारा जा रहा था। जाहिर है यह आने वाले विधानसभा चुनावों को नजर में रखते हुए पैदा किया जा रहा था। इसमें नि:संदेह अहम भूमिका में हैं ताकतवर ममता बनर्जी और उनकी सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस। लेकिन पता नहीं क्यों, मालदा, सिलिगुड़ी और उत्तर बंगाल के अन्य हिस्सों में ममता का जादू नहीं चल पाया था।
उत्तरी बंगाल हमेशा से कांग्रेस का गढ़ रहा है और इधर कुछ समय पहले सिलिगुड़ी में कम्युनिस्ट पार्टियों ने निकाय चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया है। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने कई हिस्सों में अपना मत प्रतिशत बढ़ाया है और महत्वपूर्ण दार्जीलिंग लोकसभा सीट जीती है।
मालदा क्षेत्र की बात करें तो नि:सहाय दिखने वाले मतदाता (जिनमें निश्चित रूप से मुसलमान ज्यादा हैं, जो वही समूह है जिसे ममता बनर्जी अपने पाले में लेना चाहती हैं) ऐसा महसूस करते हैं जैसे उस इलाके में सिर्फ जबानी जमाखर्च और 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' के अलावा कुछ भी नहीं हुआ है। इलाके में पूर्ववर्ती कम्युनिस्ट सत्ता ने भी दशकों तक प्रशासनिक अनदेखी की और अब तृणमूल कांग्रेस-ममता शासन में इस बात के सबूतों की लंबी फेहरिस्त दिखती है। यह दिखाता है कि कैसे राजनय को कुछ उपद्रवियों की मनमानी के स्तर तक गिरा दिया गया है।
यहां राजमार्गों के अगल-बगल बड़ी तादाद में झोपड़-पट्टियां और गर्द में ढंके छोटे-छोटे घर दिखायी देते हैं। अपनी पहचान गुप्त रखते हुए एक स्थानीय हिन्दू ने दर्द व्यक्त किया, 'इस इलाके में पिछली बार विकास के काम मरहूम गनी खान चौधरी के दिनों में ही हुए थे। उसके बाद से यहां तो बस बढ़-चढ़कर राजनीति ही होती रही है।' बहुत से मुस्लिम इस बात पर सहमति जताते हैं। माकपा समर्थक, 40 साल के मोफीदुल हक इस राजनीतिक खेल को और बेहतर तरीके से समझाते हुए कहते हैं, 'पिछले साढ़े चार साल के शासन में ममता बनर्जी नाकाम रही हैं और इसलिए आज राजनीति को लेकर एक उन्माद दिखता है। वे उत्तरी बंगाल को लेकर परेशान हैं क्योंकि सिलिगुड़ी वामपंथियों के पास तकरीबन लौट चुकी है। परंपरागत रूप से मालदा, मुर्शीदाबाद, रायगंज और बरहामपुर इलाकों में कांग्रेस मजबूत रही है।'
मोफीदुल जैसे अन्य लोग भी राजनीतिक अखाड़ेबाजी की बातें करते हैं। मफीजुल नामक के एक अन्य व्यक्ति को एक गोदाम के मालिक लिटोन के साथ देसी बम के कारोबार में शामिल बताया जाता है। स्थानीय लोग कहते हैं,'मफीजुल कभी स्थानीय माकपा के साथ जुड़ा था और काफी प्रभावशाली था। कुछ महीने पहले वह तृणमूल में चला गया था, और उसके बाद जो हुआ, उसे सब जानते हैं।'
राजनीतिक-अपराधी गठजोड़
मफीजुल का राजनीतिक दबदबा इस बात से समझा जा सकता है कि उसे पास के सूजापुर ब्लॉक में तृणमूल अध्यक्ष बनाया गया था। सब जानते थे, सूरजपुर इलाके के पूर्व तृणमूल अध्यक्ष सहारुल बिस्वास के उसके साथ अच्छे संबंध नहीं हैं। बिस्वास आरोप लगाते हैं, 'मफीजुल के तृणमूल में शामिल होने के बाद से हिंसा और राजनीतिक झगड़े आम हो चले हैं।' स्थानीय लोगों के बारे में पुलिस अधिकारी ज्यादा बोलने से कतराते हैं। 28 दिसम्बर के विस्फोटों के बाद उन्होंने अकेले लिटोन की खोज शुरू कर दी। इस जिले के अपराधी तत्वों और राजनीतिक तत्वों द्वारा देसी बम बनाना 'एक सदाबहार और अच्छा कारोबार' माना जाता है। मालदा जिले के तृणमूल प्रमुख मोअज्जम हुसैन ने हालांकि, उन हिंसक घटनाओं में अपनी पार्टी की संलिप्तता से इनकार किया है, जिसमें भीड़ द्वारा कालियाचक पुलिस थाने में तोड़-फोड़ करना भी शामिल है। वे कहते हैं, 'इसमें हमारी पार्टी और मुख्यमंत्री को बदनाम करने की साजिश की जा रही है। हमारा तो शुरू से ही कहना है कि पुलिस को मामले की सही जांच करके उचित कार्यवाही करनी चाहिए। दीदी ने यहां के अपने हर दौरे के बाद स्पष्ट कहा है कि हम कभी इस तरह की गैर कानूनी हरकतों का समर्थन नहीं कर सकते।'
लेकिन तृणमूल नेताओं की बातों को थोड़ा बारीकी से देखने की जरूरत है। माकपा समर्थक और भाजपा तथा कांग्रेस से जुड़े होने का दावा करने वाले लोग इस बात से सहमत नहीं हैं कि तृणमूल कांग्रेस का दामन साफ है। भाजपा नेता शमिक भट्टाचार्य कहते हैं, 'हम इस सब को राज्य विधान सभा चुनावों से पहले की तैयारी के तौर पर देख रहे हैं। ममता बनर्जी अल्पसंख्यक कार्ड का भरपूर इस्तेमाल कर मालदा क्षेत्र को भुनाना चाहती हैं। इसीलिए कानून को अपने हाथ में लेने वाले मुसलमानों को बचाने के भरसक प्रयास किये जा रहे हैं।' 6 जनवरी को भट्टाचार्य को मालदा में इंग्लिश बाजार थाने की पुलिस ने उस वक्त हिरासत में ले लिया जब वे अन्य स्थानीय भाजपा नेताओं के साथ कालियाचक थाने का दौरा करने जा रहे थे। बाद में आरक्षी अधीक्षक प्रसून बनर्जी ने बताया कि कालियाचक इलाके में धारा-144 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसलिए भाजपा प्रतिनिधिमंडल को इलाके में दौरा करने से रोका गया था।
उल्लेखनीय है कि घटना के पांच दिन बाद उस समय तक भी हालात में कोई सुधार नहीं आया था जब 11 जनवरी को भाजपा का तीन सदस्यीय दल-एस.एस. आहलूवालिया, भूपेन्द्र यादव और रामबिलास वेदान्ती-मालदा में घटना का ब्योरा लेने पहंुचा था। उसे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जांच के लिए भेजा था। लेकिन तीनों भाजपा नेताओं को मालदा रेलवे स्टेशन पर ही रोककर लौटती शताब्दी एक्सप्रेस से कोलकाता वापस भेज दिया गया था।
इस सब में भाजपा को राजनीतिक निहितार्थ दिखायी देते हैं। माकपा को भी ऐसा ही लगता है। जहां प्रकाश कारत और सीताराम येचुरी ने ममता बनर्जी को पूरी प्रशासनिक नाकामी के लिए जिम्मेदार ठहराया, वहीं रायगंज से माकपा सांसद मोहम्मद सलीम ने 11 जनवरी को मालदा जिले के दूसरे सबसे बड़े नगर चंचल का दौरा किया और कहा कि ममता 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' कर रही हैं। भाजपा विधायक शमिक भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि जिला आरक्षी अधीक्षक प्रसून बनर्जी तृणमूल के हस्तक की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'वे तृणमूल के जिला सचिव के के तौर पर काम कर रहे हैं इसलिए उन्हें पद से हटाया जाना चाहिए।' मालदा जिले के एक अन्य भाजपा नेता श्रीरूप मित्र चौधरी ने केन्द्रीय गृहमंत्री से जल्दी ही मालदा और कालियाचक का दौरा करने का अनुरोध किया।
12 जनवरी 2016 को कैलाश विजयवर्गीय की अगुआई में भाजपा का एक प्रतिनिधिमंडल केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिला और उनसे मालदा की परिस्थिति का संज्ञान लेने की विनती की। बाद में गृहमंत्री ने हिंसाग्रस्त जिले का दौरा करने के लिए एक आधिकारिक दल को नियुक्त किया। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ अपनी बैठक में विजयवर्गीय ने यह आरोप भी लगाया कि भीड़ 'पाकिस्तान समर्थक' नारे भी लगा रही थी। गृहमंत्री को सौपे ज्ञापन में प्रतिनिधिमंडल ने अन्य बातों के अलावा मांग की है कि राज्य की तृणमूल सरकार को 'लोगों के मन में सुरक्षा और संतोष की भावना बहाल करने के लिए सकारात्मक कदम उठाये जाने' का निर्देश देना चाहिए। ज्ञापन में कहा गया कि 'भाजपा मांग करती है कि इलाके की संवेदनशीलता को देखते हुए वहां अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती, घुसपैठ, मादक द्रव्यों तथा जाली मुद्रा के लगातार लग रहे आरोपों पर निष्पक्ष कार्रवाई की जानी चाहिए।'
तृणमूल कांग्रेस सुरक्षात्मक मुद्रा में है। लेकिन राजनीति की कला में माहिर होने के चलते ममता और उनकी पार्टी ऐसा माहौल तैयार कर रही है जिनसे वे भाजपा के खिलाफ अपनी लड़ाई में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद जैसे लोगों को साथ ले सकें।
तृणमूल सांसद डेरेक ओ'ब्रियन ने भी पुलिस की भूमिका की तारीफ करते हुए कहा कि उसने परिस्थिति को 'सूझबूझ' से संभाला है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना में केवल एक व्यक्ति घायल हुआ और दस लोगों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन वे इस बात पर सहमत थे कि यह सीमावर्ती इलाका संवेदशील है। डेरेक ने कहा, 'भाजपा नेता आज यहां अफीम और नकली मुद्रा का मुद्दा बता रहे हैं। हम तो हमेशा से यही कहते आ रहे हैं यह एक सीमावर्ती इलाके का संवेदनशील मुद्दा है, न कि सांप्रदायिक मुद्दा।' तो मालदा प्रकरण की पृष्ठभूमि में यही है दीदी के 'पोरिबोतार्ेन' की भूमि।
इदारा-ए-शरिया और मालदा
मालदा के बहुत से लोगों ने शायद कभी बिहार के संगठन इदारा-ए-शरिया का नाम भी नहीं सुना होगा। यह संगठन आमतौर पर बिहार, झारखंड और ओडिशा के कुछ हिस्सों में सक्रिय है। हालांकि बताया जाता है कि ये इधर कुछ समय से पश्चिम बंगाल और असम के कुछ हिस्सों में भी सक्रिय हो रहा है। आमतौर पर संगठन सामाजिक कारणों और इस्लामी मूल्यों तथा नियमों के तहत शरिया कायदे लागू करने से जुड़ा रहा है। इदारा-ए-शरिया नेता गुलाम जरकानी का कहना है, 'हम एक सामाजिक संगठन हैं और आम लोगों, खासकर महिलाओं को तलाक तथा अन्य मामलों में आर्थिक सहायता दिलाते रहे हैं।' वे मानते हैं कि वे 1 जनवरी को कमलेश तिवारी के कथित बयान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन उनके संगठन का बाद में भड़की हिंसा से कोई लेना-देना नहीं था।
विकास की दृष्टि से, जिले में विभिन्न खंडों में असमानता लोगों के सामाजिक-आर्थिक हालात में फर्क से देखी जा सकती है। मानव विकास इंडेक्स और लिंग विकास इंडेक्स के अनुसार, पश्चिम बंगाल का यह जिला दयनीय स्थिति में है जहां मुसलमानों के हितैषी राजनीतिकों ने हमेशा राज किया है। सूत्र बताते हैं कि हरिश्चंद्रपुर-1, चंचल-1, गजोल, बामनगोला, हबीबपुर, ओल्ड मालदा और माणिकचक उच्च सामाजिक विकास दर्शाते हैं जबकि कालियाचक-1 और कालियाचक-3 खंड मोटे तौर पर सामाजिक विकास में पिछड़े हैं। इन खंडों की यह स्थिति यहां प्राथमिक व अन्य विद्यालयों और बुनियादी स्वास्थ्य केन्द्रों के कम होने के चलते है।
बदल रही है जनसांख्यिकी
भारत में साफ तौर पर दिखता है कि जहां जहां भी जनसांख्यिकीय संतुलन गैर हिन्दू समुदायों के पाले में झुकता दिखाई दिया, चाहे वे ईसाई बहुल उत्तर-पूर्वी राज्य हों या मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर, वहां-वहां हिन्दू आबादी खत्म होती गई है। पश्चिम बंगाल उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। 2011 की जनगणना में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी में सबसे तेज बढ़त दर्ज की गई, यह राज्य की कुल आबादी में 27.01 प्रतिशत हो गई है। 2001 की जनसंख्या रपट से उलट राज्य में अलग-अलग स्थानों पर मुस्लिम आबादी में अलग-अलग मात्रा में बढ़त देखी गई है, और यह तेजी से बढ़ते हुए 2,02,40,543 से 2,46,54,825 हो चुकी है।
2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, तीन जिले, जिनमें मुस्लिम हिन्दुओं से ज्यादा हो गए हैं, वे हैं-मुर्शीदाबाद (66.27 प्रतिशत), मालदा (51.27 प्रतिशत) और उत्तरी दिनाजपुर (49.92 प्रतिशत)। 2001 के जनसंख्या सर्वेक्षण की खंडश: रपट बताती है कि बाकी खंडों के मुकाबले मालदा में कालियाचक-1 में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी है। और बारीकी से बताएं तो, कालियाचक-1 में कुुल आबादी में 88.39 प्रतिशत मुस्लिम हैं। ताजा जनसंख्या सर्वेक्षण में, हो सकता है इसमें और बढ़ोतरी हो चुकी हो। आगे रपट मालदा जिले का ब्योरा देती है। मालदा की कुल आबादी 39,88,845 में मुस्लिम और हिन्दू क्रमश: 20,45,151 और 19,14,352 हैं। दिलचस्प बात है कि इस जिले की आबादी तकरीबन लाइबेरिया या अमेरिक के ओरेगन राज्य के बराबर है। 2001 के जनगणना की रपट के अनुसार, खुद मालदा जिले के 12 विधानसभा क्षेत्रों में से 6 क्षेत्रों में बहुत ज्यादा मुस्लिम आबादी है। ये हैं चंचल (65.83 प्रतिशत), हरिश्चंद्रपुर (68.73), मालतीपुर (71.89 प्रतिशत), रातुआ (68.33 प्रतिशत), सुजापुर (88.39 प्रतिशत) और मोठाबाड़ी (71.12 प्रतिशत)। बाकी के छह क्षेत्रों में मुस्लिम समुदाय पलड़ा किसी भी तरफ झुकाने की स्थिति में है।
अब तक हुई जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 1951 में, मुस्लिम आबादी राज्य की कुल आबादी में 19.85 प्रतिशत थी। 2001 में दर्ज 25.25 प्रतिशत बढ़त के आधार पर, आकलन किया गया है कि 2041 तक राज्य में मुस्लिम आबादी 39.39 हो जाएगी। लेकिन रिपोर्ट का यह आकलन कमतर आंका गया क्योंकि 2011 में वास्तविक आबादी 27.01 प्रतिशत दर्ज की गई। 2001 की जनगणना में अंदाज लगाया था कि 2011 में मुस्लिम आबादी 26.86 तक पहुंच सकती है। हालांकि यह आंकड़ा छोटा दिखता है लेकिन संख्या में देखें तो ये करीब 10 लाख यानी 9,23,036 बैठती है। पश्चिम बंगाल की 9,12,76,115 आबादी में, हिन्दू 6,43,85,546 यानी 70.53 प्रतिशत हैं। 2001 में बंगाल में हिन्दू आबादी 5.8 करोड़ थी और मुस्लिम आबादी 2 करोड़।
– गणेश राधाकृष्णन
कालियाचक (मालदा) घटना पर ममता से भाजपा के पांच सवाल
1. ममता सरकार मालदा में उन्मादी पर्चे और प्रचार सामग्री बांटे जाने को चुपचाप क्यों देखती रही?
2. उ.प्र. के किसी तिवारी के भर्त्सना योग्य सांप्रदायिक बयान के 30 दिन बाद मालदा में एक हिंसक प्रतिक्रिया कैसे उपज सकती है?
3. अगर यह स्थानीय लोगों की बीएसफ के साथ झड़प थी तो सांप्रदायिक भीड़ ने पुलिस थाने पर हमला क्यों किया? भीड़ बीएसएफ के बैरक पर क्यों नहीं टूटी?
4. क्या यह सच नहीं है कि कालियाचक पुलिसथाने पर हुआ हमला पूर्वनियोजित था,जिसका लक्ष्य मालदा में नकली मुद्रा के ताने-बाने के सबूतों की फाइलें मिटाना था?
5. ममता प्रशासन मालदा के आस-पास बड़े पैमाने पर गैरकानूनी अफीम की खेती और मादक पदार्थों की तस्करी के ताने-बाने को रोकने के उपाय क्यों नहीं कर रहा है?
क्या उत्तर बंगाल से चुनाव लड़ेंगी ममता?
माना जाता है कि कोई भी मुख्यमंत्री यह आरोप स्वीकार नहीं करना चाहता कि उसकी सरकार ने अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की। जो भी हुआ, मालदा प्रकरण निश्चित रूप से ममता बनर्जी के लिए शर्मनाक स्थिति जरूर पैदा करता है। वे आने वाले विधानसभा चुनावों की तरफ आत्मविश्वास के साथ बढ़ने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं और तृणमूल के लिए राजनीतिक पहल करने को उतावली हैं। चूंकि यह इलाका कांग्रेस का गढ़ रहा है इसलिए दीदी का उतावलापन समझा जा सकता है। फारवर्ड ब्लॉक का एक नेता हाल में उनकी पार्टी से जुड़ा भी है। साफ है कि इन दिनों मालदा में ममता के प्रति सहानुभूति रखने वाले अनेक लोग हैं या उस लिहाज से उत्तर बंगाल के मालदा-सिलिगुड़ी-जलपाईगुड़ी पट्टी में भी ऐसा दिखता है। लेकिन उनकी बाध्यताएं क्या हैं? राज्य के इस हिस्से में,माना जा रहा है कि दीदी शायद लहर को अपनी पार्टी के पक्ष में मोड़ने के लिए 'सुरक्षित स्थानों' में से एक से चुनाव लड़ सकती हैं। अध्यापक अजय बनर्जी का कहना है, 'राजनीति सब कुछ समझकर उसे प्रभावी तौर पर लागू करने का नाम है। जैसे कि नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी से खड़े होकर लहर बदली थी, उसी तरह ममता प्रधानमंत्री के उस कदम से सबक लेने की कोशिश करेंगी।' इलाके के कई अन्य लोग भी इस राजनीतिक 'दांव' से प्रभावित हैं और कहते हैं कि अगर दीदी की चले तो वे मुस्लिम मजहबियत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा कर ही दम लेंगी। —नीरेन्द्र देव
जर्जर आर्थिक हालात के मायने हैं नियोजित अपराध
बंगलादेश सीमा के निकट मालदा और उसके आसपास के इलाके में जाली मुद्रा का संजाल हमेशा से गहन चिंता का विषय बना हुआ है। हैरानी बात है कि मालदा अपने आमों के लिए मशहूर है और कुछ दशकों पहले तक सिल्क के शानदार कपड़ों के लिए जाना जाता था, वही शहर आज जाली मुद्रा और अफीम की खेती के लिए सुर्खियों में छाया हुआ है।
इतिहास के छात्र इस बात को स्वीकारेंगे कि अठारहवीं सदी के दौरान यह सूती और सिल्क उद्योग के लिए जाना जाता था और 20वीं सदी में भी मालदा जिला जूट और गेहूं का अहम वितरण केन्द्र था। लेकिन गैर कानूनी जाली मुद्रा और मादक पदार्थों की तस्करी का फलता-फूलता कारोबार निश्चित रूप से नियोजित अपराध से जुड़ता है। सुरक्षा एजेंसियां इसे हथियारों की तस्करी से भी जोड़ती हैं। ज्यादा पुरानी बात नहीं है, जब ऐसी गुप्तचर सूचनाओं थीं कि पूर्वोत्तर के कुछ उग्रवादी गुटों ने इस 'प्रभावशाली सूत्र' का इस्तेमाल किया था। कुछ समय से, खास जानकारियों पर काम करते हुए बीएसफ ने सख्ती दिखाई और अपराध की दर को कम करना शुरू किया था। सूत्रों के अनुसार, स्थानीय माफिया इससे काफी दिनों से परेशान था और ऐसी परिस्थिति बनाना चाहता था जिसमें वह बीएसएफ तथा जिला पुलिस से भी किसी बहाने भिड़ सके।
भाजपा का आरोप है कि कालियाचक पुलिस थाना सिर्फ गैर कानूनी गतिविधियों में लिप्त स्थानीय अपराधियों के रिकॉर्ड 'तबाह' करने के लिए जलाया गया था।
ल्ल स्थानीय निवासी ऐसी घटनाओं का उल्लेख करते हैं जिनमें पुलिस द्वारा जैसे ही नोटों के बंडलों के साथ अपराधी तत्वों को पकड़ा गया तो फौरन ही उन्हें छुड़ाने के लिए 'प्रभावशाली' लोगों के फोन पहुंच गए। पुलिस सूत्रों का अंदाजा है कि एक किलो अफीम लेटेक्स 60 हजार रुपयों में बिकती है जबकि अफीम के एक फूल से 30-40 ग्राम लेटेक्स मिलती है।
हैरान और परेशान करने वाली बात तो यह है कि अफीम की खेती बढ़ती जा रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इसके पीछे मुख्य वजह तो वे नौजवान हैं जो किसी भी तरह से रोजगार के मौके तलाशते रहते हैं। यह चीज शासन से जुड़े बुनियादी मुद्दे को उभारती है। यह बात मार्क्सवादियों के शासन में जितनी चुभती थी, वैसे ही आज दीदी के शासन में कांटा बनी हुई है। मालदा के एक 68 वर्षीय दुकानदार का कहना है, 'आर्थिक कारणों से गांव वाले अफीम की खेती की तरफ जाते हैं। मालदा मुस्लिम बहुल जिला है और यहां आधुनिक पढ़ाई-लिखाई तथा रोजगार के पर्याप्त अवसर कभी हासिल नहीं हुए।'
मादक पदार्थों के अध्ययन और अन्वेषण में लगा संस्थान भी स्पष्ट करता है कि अफीम की खेती और उसका सेवन पूर्वी भारत में चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। मालदा तो गढ़ है ही, साथ ही अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के कुछ इलाके भी इसमें शामिल हैं।
मालदा के तृणमूल प्रमुख मोअज्जम हुसैन कहते हैं, 'हमारी पार्टी और मुख्यमंत्री को बदनाम करने की साजिश की जा रही है। हमारा तो शुरू से ही कहना है कि पुलिस को मामले की सही जांच करके उचित कार्यवाही करनी चाहिए। दीदी ने स्पष्ट कहा है कि हम कभी इस तरह की गैर कानूनी हरकतों का समर्थन नहीं कर सकते।'
भाजपा नेता शमिक भट्टाचार्य कहते हैं, 'हम इस सब को राज्य विधान सभा चुनावों से पहले की तैयारी के तौर पर देख रहे हैं। ममता बनर्जी अल्पसंख्यक कार्ड का भरपूर इस्तेमाल कर मालदा क्षेत्र को भुनाना चाहती हैं। इसीलिए कानून को अपने हाथ में लेने वाले मुसलमानों को बचाने के भरसक प्रयास किये जा रहे हैं।'
'बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक को पुन: परिभाषित करना होगा'
हिन्दू संहति के अध्यक्ष श्री तपन घोष पश्चिम बंगाल में मुस्लिम कट्टरपंथ के विरुद्ध वषां से लड़ाई लड़ रहे हैं। वे मालदा हिंसा के पीछे सुनियोजित षड्यंत्र बताते हैं। उनका कहना है कि कुछ जिहादी तत्व भारत को 'इस्लामिक स्टेट' बनाना चाहते हैं। मालदा में हुई हिंसा को आपराधिक घटना की संज्ञा देने की मीडिया और कुछ राजनेताओं की दलील से वे सहमत नहीं हैं। अनियंत्रित मुस्लिम आबादी को वे 'जनसांख्यिकीय टाइम बम' मानते हैं। वे कहते हैं कि यदि इस खतरे की घंटी को जानबूझकर अनसुना किया गया तो पूरे देश को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। सहयोगी साप्ताहिक 'ऑर्गनाइजर' के वरिष्ठ संवाददाता प्रमोद कुमार से दूरभाष पर कोलकाता से हुई बातचीत में उन्होंने 'बहुसंख्यक' और 'अल्पसंख्यक' शब्दावलि को पुन: परिभाषित करने की जरूरत पर बल दिया।
आप मालदा में हुई घटना को किस तरह से देखते हैं?
इस घटना के दो पहलू हैं। पहला यह कि मालदा हिंसा पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की अनियंत्रित जनसंख्या बढ़ने और क्षेत्र में उसके बढ़ते प्रभाव का ही स्वाभाविक परिणाम है। ऐसे में यह होना ही था। आज जो घटना मालदा में घटी, वह कल देश के किसी दूसरे हिस्से में घट सकती है। इस घटना का दूसरा पहलू यह है कि ममता बनर्जी सरकार मुसलमानों की सही या गलत, हर एक मांग के आगे झुकने को लाचार दिख रही है। यह स्थिति मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए एक चुनौती बन चुकी है।
आप इसे अकेली घटना मात्र मानते हैं या फिर इसके पीछे कोई सोचा-समझा लक्ष्य है?
निश्चित रूप से इसके पीछे एक सोचा-समझा लक्ष्य है, लेकिन दुर्भाग्य से मीडिया और राजनेता इसे गलत तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। यह इस्लामी कट्टरपंथ के नाम पर सोची-समझी साजिश है जिसमें हिन्दुओं का दमन, जिहाद, भारत के लिए घृणा, अलगाववादी मनोवृत्ति और अपराधियों का समर्थन जैसे कई लक्ष्य शामिल हैं। जो लोग इसे मात्र एक आपराधिक घटना बता रहे हैं, उन लोगों से मैं पूछना चाहता हूं कि क्या केवल अपराधियों के आह्वान पर लाखों लोग सड़कों पर इकट्ठा हो सकते हैं? ऐसा तभी होता है जब मजहब के नाम पर लोगों से इकट्ठा होने की अपील की जाती है। इस घटना की जडे़ं मजहब में हैं और उसकी ताकत के प्रदर्शन में हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मालदा की हिंसा को केवल सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और स्थानीय जनता के बीच का विवाद बताया है। आप इस पर क्या कहेंगे?
इसे साधारण घटना बताना वर्तमान सरकार की विवशता है। आखिर सरकार इस घटना को साम्प्रदायिक घटना के रूप में कैसे स्वीकार कर सकती है? लेकिन मुझे उससे भी अधिक पीड़ा यह देखकर होती है कि राज्य के विपक्षी दल भी यही भाषा बोल रहे हैं। जो ममता ने कहा, वही बात माकपा और दूसरे राजनीतिक दलों ने भी दोहराई। यहां तक कि मीडिया ने भी वही भाषा बोली, केवल एक राष्ट्रीय अंग्रेजी न्यूज चैनल ने ही इस घटना को साम्प्रदायिक बताने का साहस दिखाया।
क्या पश्चिम बंगाल में जनसांख्यिक ीय असंतुलन ने आग में घी डालने का काम किया है?
निश्चित रूप से इसमें जनसंख्या के असंतुलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार मालदा मुस्लिम बहुल जिला बन चुका है। सच तो यह है कि मालदा 2001 की जनगणना में ही मुस्लिम बहुल बन चुका था, लेकिन उस समय सरकार चला रहे वाम मोर्चा ने बड़ी चालाकी से मुसलमानों की संख्या मात्र 49 फीसद बताई। इस इलाके में एक ब्लॉक में 70 फीसद से अधिक मुस्लिम आबादी है। मालदा के निकटतम क्षेत्र भी तेजी से मुस्लिम बहुल होते जा रहे हैं। इस इलाके में एक 'जनसांख्यिकीयटाइम बम' टिक-टिक कर रहा है। लेकिन लोग जानबूझकर इस खतरे को अनदेखा कर रहे हैं।
इस क्षेत्र से बडे़ पैमाने पर मादक पदाथार्ें की तस्करी की खबरें हैं, इस पर आपका क्या कहना है?
हां, इस तथ्य ने भी भूमिका निभाई है, लेकिन बड़ी भूमिका उसकी नहीं है। सचाई यह है कि पुलिस स्टेशन को जला दिया गया और अपराधियों ने इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश की। मूल कारण तो मजहबी उन्माद है।
आपने इस क्षेत्र में बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या की बात की है। क्या आपको नहीं लगता है कि समय आ गया है कि देश में अल्पसंख्यक शब्द की परिभाषा नये सिरे से तय की जाए?
निश्चित ही। मैं लंबे समय से यह बात कहता आ रहा हूं। देश की 15 फीसद आबादी को अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता। यह तो दूसरे क्रम के बहुसंख्यक हैं। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की जनसंख्या 30 फीसद है। कुछ क्षेत्रांे में जहां उनकी आबादी 70 फीसद तक पहुंच गई है, इसके बावजूद वे अल्पसंख्यकों को मिलने वाले लाभ प्राप्त कर रहे हैं और असली अल्पसंख्यक वहां हिन्दू हैं जिनके जीवन की सुरक्षा की भी कोई गारंटी नहीं है। यह सब बंद होना चाहिए। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का मानदंड ब्लॉक स्तर पर निर्धारित करना चाहिए, न कि राष्ट्रीय स्तर पर।
मालदा की हिंसा के विषय में आप कोई और तथ्य प्रकाश में लाना चाहेंगे?
इस क्षेत्र में राजनीतिक दल मालदा को मुस्लिम वोट बैंक के रूप में देख रहे हैं। उनके राजनीतिक हित राष्ट्र हित पर हावी हो गए हैं। ये राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए अपराधियों का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं।
इसलिए राज्य सरकार और प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि अपराधियों के साथ सख्ती से पेश आए। ममता सरकार ने विकास के मोर्चे पर हो सकता है कुछ अच्छे परिणाम दिखाए हों, लेकिन कानून एवं व्यवस्था और इस्लामी कट्टरवाद की रोकथाम में राज्य सरकार पूर तरह से असफल रही है। यह सरकार मुस्लिम बहुल इलाकों में हिन्दुओं को सुरक्षा प्रदान करने में भी असफल रही है।
'असामाजिक तत्वों से मिलीभगत है ममता की '
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और पश्चिम बंगाल इकाई के प्रभारी सिद्धार्थनाथ सिंह का मानना है कि मालदा की घटना सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती है। उनको लगता है कि केन्द्र सरकार को इस मामले में जल्दी ही हस्तक्षेप करना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि राज्य सरकार राष्ट्र-विरोधी तत्वों के हाथों में खेल रही है और उसका उनके विरुद्ध कार्रवाई करने का कोई इरादा नहीं है। ऑर्गनाइजर के वरिष्ठ संवाददाता प्रमोद कुमार की उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं-
ल्ल मालदा घटना के संदर्भ में आखिर भाजपा को केन्द्र में अपने ही नेतृत्व वाली सरकार के सामने मांग रखने की जरूरत क्यों पड़ी?
3 जनवरी को मालदा के कालियाचक में 1.53 लाख मुसलमानों की भीड़ जमा हो गई थी। इस भीड़ को इदारा-ए-शरिया, जो कि एक कट्टरवादी संगठन है, ने उत्तर प्रदेश के एक मामले के विरोध में जुटाया था। पर वे लोग वास्तव में कालियाचक थाने पर रखे गए अफीम की तस्करी, मादक पदार्थों और जाली मुद्रा से जुड़े दस्तावेजों को नष्ट करना चाहते थे। कहा जाता है कि इदारा-ए-शरिया के सम्बंध बंगलादेश के प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों से हैं। इससे कालियाचक मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ता है। हमने यही विषय केन्द्रीय गृहमंत्री के सामने उठाया।
केन्द्र सरकार कोई कार्रवाई करती तो दिख नहीं रही है?
यह सही नहीं है। नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (एन.आई.ए.) पहले से ही मालदा में जाली मुद्रा के संजाल पर काम कर रही है और इस सम्बंध में 15 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। दिसम्बर 2015 में एन.आई.ए. ने पश्चिम बंगाल के गृह सचिव से इस मुद्दे पर बातचीत भी की है। दरअसल, यह एन. आई.ए. का दबाव ही था, जिसकी वजह से इन लोगों ने 3 जनवरी को साम्प्रदायिक उन्माद भड़काकर हिन्दू परिवारों को आतंकित करने की चाल चली थी। गृह मंत्री से हमारी बैठक के बाद, गुप्तचर ब्यूरो जदयू सांसद गुलाम रसूल से पूछताछ कर रहा है। बी.एस. एफ. ने भी स्थानीय प्रशासन पर दबाव डाला है और वह अब अफीम की गैर-कानूनी खेती के संजाल को ध्वस्त करने में सहयोग दे रहा है।
क्या यह अपने आप में एक अकेली घटना थी या इसके पीछे किसी तरह का कोई चलन दिखता है?
यह निश्चित रूप से अपने आप में कोई अकेली घटना नहीं थी। इसके पीछे एक मिशन है। वोट बैंक राजनीति के चलते तृणमूल कांग्रेस सीमावर्ती जिलों के आसपास गैर-कानूनी गतिविधियां होने की छूट दे रही है।
इसमें घुसपैठ भी जुड़ी है और घुसपैठियों को तृणमूल कांग्रेस प्रशासन की सरपरस्ती मिली हुई है। हमने नदिया, हुगली और उत्तर 24 परगना जिलों में इसी तरह की घटनाएं देखी हैं। गांवों में अपने अभियान के अन्तर्गत वे हिन्दू परिवारों में भय पैदा करके उन्हें आतंकित करते हैं और प्रशासन पर हमला करते हैं, खासकर पुलिस बल पर। राज्य सरकार इस सबको होने दे रही है और उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जाती।
लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे महज बी.एस.एफ. और स्थानीय लोगों के बीच झड़प बताती हैं?
ममता बनर्जी ध्यान बंटाने की कोशिश कर रही हैं। अगर यह बी.एस. एफ. और स्थानीय लोगों के बीच झड़प ही होती तो पहला तार्किक सवाल यही उभरता है कि आखिर भीड़ बी.एस.एफ. की बैरकों पर जाने की बजाय कालियाचक पुलिस थाने क्यों गई? यह तो मुख्यमंत्री की ध्यान भटकाने की चाल है।
कुछ लोग इसे साम्प्रदायिक घटना बताते हैं, जबकि कुछ इसे आपराधिक घटना कहते हैं। आप इसे किस दृष्टि से देखते हैं?
मैं तो कहूंगा कि इसमें साम्प्रदायिक रंग घुला हुआ था। लेकिन इस साम्प्रदायिक रंग के पीछे की कार्रवाई उन दस्तावेजों और रिकॉर्ड को मिटा देने के लिए की गई थी जो भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़े थे। इस तरह यह आपराधिक गतिविधि हो जाती है। तो यह प्रकरण दोनों तरह का था।
अब आप राज्य सरकार से क्या अपेक्षा करते हैं?
हम राज्य सरकार से कोई अपेक्षा नहीं करते, क्योंकि वह तो असामाजिक तत्वों के साथ साठगांठ किए हुए है। हमें लगता है कि केन्द्र सरकार को राज्य सरकार से सख्ती से पेश आना चाहिए और भारत विरोधी गतिविधियों को उजागर करना चाहिए।
लेकिन केन्द्र सरकार तो कोई सख्त कदम उठाती नहीं दिख रही है। राज्यपाल से रपट तक तलब नहीं की गई?
नहीं, यह सही नहीं है। केन्द्र सरकार ने तुरन्त राज्यपाल से रपट मांगी थी। हमें उम्मीद है कि सरकार आगे भी पूरी जानकारी लेती रहेगी।
क्या आपको लगता है कि पिछले कई दशकों के दौरान इस इलाके में पैदा किए गए जनसांख्यिक असन्तुलन की इस घटना में कोई भूमिका हो सकती है?
चूंकि यह सीमान्त जिला है, इससे जनसांख्यिक आयाम तो जुड़ता ही है। चाहे पहले माकपा का शासन रहा हो या अब तृणमूल का, दोनों ने घुसपैठ को पूरी छूट दी है। उनको लगता है कि घुसपैठियों के वोट स्थानीय लोगों के वोटों से ज्यादा अहम हैं। इसकी वजह से गैर-कानूनी गतिविधियां बेलगाम चलती हैं। यह सब रुकना चाहिए।











