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सोनिया-राहुल और उनकी मंडली ने नेशनल हेराल्ड की सम्पत्ति में लगभग 5000 करोड़रुपये का घोटाला किया। डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने उस घोटाले के तथ्य इकट्ठे करके सोनिया के विरुद्ध पटियाला हाउस न्यायालय में याचिका दायर की। सोनिया ने दिल्ली उच्च न्यायालय में मामले में पेश होने से छूट देने का आग्रह किया। न्यायालय ने सोनिया की याचिका को खारिज करते हुए 19 दिसम्बर को न्यायालय में हाजिर होने का आदेश दिया। इस सामान्य न्यायिक प्रक्रिया का आदर न करके सोनिया और उनकी कांग्रेस ने इसे केन्द्र सरकार द्वारा बदले की कार्रवाई का रंग दे दिया। यद्यपि सरकार की ओर से अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद आदि मंत्रियों ने बार-बार दोहराया कि यह सामान्य न्यायिक प्रक्रिया है, जिसका केन्द्र सरकार से कुछ लेना-देना नहीं है, सोनिया को न्यायालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। किंतु सोनिया अपने को कानून से ऊपर समझती हैं। न्यायालय की लड़ाई संसद में पहुंचा दी। संसद के दोनों सदनों में जमकर हंगामा कराया। सबसे मजेदार बात यह है कि कानून से भागने वाली सोनिया ने स्वयं को वीर सिद्ध करने के लिए गर्वोक्ति की कि 'मैं किसी से डरती नहीं हूं, मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं।'
इंदिरा गांधी के नाम लेने के पीछे उनका क्या उद्देश्य हो सकता है? इंदिरा गांधी का कौन सा गुण उनमें है? यह सत्य है कि इंदिरा गांधी निरंकुश सत्ता के लोभ में इमरजेंसी के रास्ते पर बढ़ गयींं। पर वे प्रखर देशभक्त थीं। सिक्किम का विलीनीकरण एवं बंगलादेश का मुक्ति संग्राम इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। बंगलादेश में 90000 पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण कोई सामान्य घटना नहीं थी। इंदिरा गांधी चाहतीं तो उसका लाभ उठाकर पाकिस्तान को हमेशा के लिए नतमस्तक कर सकती थीं। कश्मीर का पाकिस्तानी कब्जे वाला क्षेत्र वापस ले सकती थीं। किंतु यहां वे जुल्फिकार भुट्टो के झांसे में आ गयीं। भुट्टो ने चापलूसी और अनुनय-विनय करके उनके क्षमाभाव को जाग्रत कर दिया। इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान पर कोई शर्त लगाए बिना उसके नब्बे हजार सैनिकों को वापस कर दिया। किंतु जब सोनिया अपनी वीरता की डींग हांकने के लिए इंदिरा गांधी की बहू होने की बात कहती हैं तो वे इंदिरा की राष्ट्रभक्ति से प्रेरित साहसी कार्यों की ओर नहीं बल्कि विपक्ष और देश को डराने के लिए इमरजेंसी के काले दिनों की याद दिलाना चाहती हैं। इससे सोनिया की अपनी मानसिकता खुलकर सामने आ जाती है।
यह स्मरण कराना आवश्यक है कि इंदिरा पुत्र राजीव गांधी को अपने प्रेमपाश में बांधकर सोनिया 1968 में जबसे इंदिरा गांधी के राजमहल में घुसीं तबसे उन्होंने आज तक राष्ट्रहित में कोई काम नहीं किया है। वे हमेशा सत्ता को कब्जाने के षड्यंत्र रचती रहीं। 1977 में जब गृहमंत्री चौ. चरण सिंह के आग्रह पर इंदिरा गांधी को इमरजेंसी के पापों के लिए दंडित करने की प्रक्रिया आरंभ हुई तब सोनिया इंदिरा गांधी के साथ खड़ी रहने के बजाय अपने दोनों बच्चों और राजीव को लेकर इटली के दूतावास में जा छिपीं। 1994 में भाजपा की पराजय और कांग्रेस की विजय के बाद सोनिया ने स्वयं को कांग्रेस दल का नेता चुनवाकर तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन के सामने 272 सांसदों की सूची पेश करके स्वयं को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की, किंतु उस समय मुलायम सिंह यादव ने उस सूची में छेद करके सोनिया की योजना को विफल कर दिया।
2004 में सोनिया पुन: अपना दावा लेकर तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के दरबार में पहुंचीं। वे शपथ ग्रहण की पूरी तैयारी से गयी थीं। किंतु राष्ट्रपति भवन में क्या-क्या हुआ, यह अब तक एक रहस्य ही है, पर उन्हें शपथ लिये बिना लौटना पड़ा और अगले दिन प्रात: मनमोहन सिंह को कांग्रेसी सांसदों का नेता चुनवाया गया। कहते हैं कि इस योजना के पीछे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हरकिशन सुरजीत का दिमाग काम कर रहा था। मनमोहन सिंह को ही क्यों चुना गया, यह प्रधानमंत्री के नाते उनके दस साल के रिकार्ड से सबके सामने है। प्रधानमंत्री कार्यालय और केन्द्र सरकार का अंग रहे कई महत्वपूर्ण लोगोें ने उस काल के अपने संस्मरण प्रकाशित किये हैं। इन संस्मरणों में एक बात सबने कही है कि मनमोहन सिंह केवल दिखावटी प्रधानमंत्री थे, प्रधानमंत्री कार्यालय से सब फाइलें सोनिया के पास अर्थात 10, जनपथ को भेजी जाती थीं और वास्तविक निर्णय वहीं लिया जाता था। इसका अर्थ हुआ कि सोनिया पर्दे के पीछे रहकर सत्ता का संचालन कर रही थीं। 'इंदिरा गांधी की बहू हंू' की धमकी के पीछे काम कर रही उनकी मानसिकता बहुत स्पष्ट है। नि:संदेह सोनिया इंदिरा द्वारा आरोपित इमरजेंसी के काले दिनों की याद दिलाकर विपक्ष और देशवासियों को डराना चाहती हैं।
सोनिया की मानसिकता से अधिक महत्वपूर्ण उस टोली का व्यवहार है, जिसे 'कांग्रेस' कहा जाता है, जो लम्बे समय से वंशवादी वातावरण में पली-बढ़ी है क्या उसे सोनिया की वंशवादी राजनीति से ऊपर उठकर न्यायिक प्रक्रिया का आदर नहीं करना चाहिए? किंतु वे इमरजेंसी काल के कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ की मानसिकता में ही जी रहे हैं। आपको स्मरण होगा बरुआ का वह कुख्यात वाक्य कि 'इंदिरा ही भारत है'।
आज के नकली वंशवादी कांग्रेसी भी सोनिया को ही भारत समझकर उनकी व्यक्तिगत राजनैतिक लड़ाई में शामिल हो गये हैं और उनके इशारे पर संसद में हंगामा करके, संसद की कार्रवाई बाधित करने के साथ-साथ सड़कों पर प्रदर्शन करके अपनी सोनिया भक्ति का भौंडा प्रदर्शन कर रहे हैं। संसद में संविधान पर लम्बी बहस सुनने के बाद भी क्या उन्होंने यह नहीं सीखा कि भारत की वर्तमान व्यवस्था में संविधान अर्थात कानून का राज्य सर्वोपरि है और कोई भी, चाहे वह इंदिरा गांधी की बहू होने का दंभ करने वाली सोनिया ही क्यों न हों, कानून से ऊपर नहीं है। यदि लोकतंत्र में उनकी सच्ची निष्ठा है तो उन्हें समझना चाहिए कि कानून के सामने सब बराबर हैं-सोनिया से लेकर मामूली गरीब ग्रामीण तक। कांग्रेसी सोनिया को कानून की प्रक्रिया से बचाने के लिए अपनी व्यक्तिगत लड़ाई को केन्द्र विरोधी राजनीतिक रंग देकर भारतीय लोकतंत्र की पीठ में छुरा घोंपने का पाप कर रहे हैं।
देवेन्द्र स्वरूप











