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जी हां, बात ज्येष्ठा लक्ष्मी पूजा की ही है। लक्ष्मी-पूजा से भला कौन परिचित न होगा? परन्तु ज्येष्ठा लक्ष्मी पूजा की जानकारी कम ही लोगों को होगी। कार्तिक मास की अमावस्या की घनी अंधेरी रात में जगमगाते दीपकों के बीच विघ्नहर्ता गणेश के साथ सुख-समृद्धि की प्रदाता मां लक्ष्मी का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि इस ज्योति पर्व पर मां लक्ष्मी के साथ ज्येष्ठा लक्ष्मी देवी की भी पूजा की जाती है! पद्म पुराण, अग्नि पुराण, भविष्य पुराण व कई अन्य पौराणिक ग्रंथों में ज्येष्ठा लक्ष्मी पूजा के कई साक्ष्य उपलब्ध हैं। मूर्ति शिल्प के अन्तरराष्टÑीय ख्यातिप्राप्त विद्वान डा़ ए़ एल. श्रीवास्तव ने इस रोचक विषय पर चर्चा के दौरान तमाम ज्ञानवर्धक जानकारियां दीं।
हम सभी जानते हैं कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से लेकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक पांच दिवसीय दीपपर्व में त्रयोदशी को धनतेरस (धन्वंतरि जयंती), चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली), अमावस्या को गणेश-लक्ष्मी पूजन, प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा व द्वितीया को भाईदूज का त्योहार देशभर में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व के दूसरे दिन पड़ने वाली नरक चतुर्दशी का मूल संदर्भ यूं तो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध से जुड़ा है किन्तु विशेष अर्थ में नरक चतुर्दशी की पूजा ही वस्तुत: लक्ष्मी पूजन से पूर्व ज्येष्ठा लक्ष्मी-पूजा की है। इस दिन सायंकाल घर के बाहर वाली नाली पर जो दीपक जलाया जाता है वह ज्येष्ठा या ‘अलक्ष्मी’ देवी के लिए ही होता है। आज भी कई घरों में, जहां प्राचीन परम्पराएं जीवित हैं, वहां की बड़ी-बूढ़ी महिलाएं नरक चतुर्दशी के अगले दिन तड़के उठकर सूप फटक-फटक कर ‘इस्सर आवें दरिद्दर जावें’ की पौराणिक कहावत कहते हुए घर में ईश्वर के आने और दुख-दरिद्रता जाने की प्रार्थना करती हैं। इस संदर्भ में इस्सर (ईश्वर) का तात्पर्य लक्ष्मी से और दरिद्दर (दरिद्रता) का तात्पर्य ‘अलक्ष्मी’ देवी से है। शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार लक्ष्मी-पूजा से पहले ज्येष्ठा या ‘अलक्ष्मी’ को विदाई देने का विधान है, क्योंकि जब तक घर से ‘अलक्ष्मी’ नहीं जाएंगी तब तक घर में लक्ष्मी नहीं पधारेंगी। ‘अलक्ष्मी’ लक्ष्मी की बड़ी बहन हैं, इसीलिए ज्येष्ठा कहलाती हैं। किन्तु बहनें होते भी दोनों विपरीत रूप-गुण की हैं। इस कारण जहां लक्ष्मी होंगी वहां ‘अलक्ष्मी’ और जहां अलक्ष्मी होंगी वहां लक्ष्मी का रहना संभव नहीं है।
ऋग्वेद के श्रीसूक्त के अनुसार देवताओं व दैत्यों के बीच हुए सागर-मंथन में लक्ष्मी से पहले ‘अलक्ष्मी’ निकली थीं इसीलिए उन्हें ज्येष्ठा कहा गया। इस सूक्त में ‘श्री’ यानी लक्ष्मी की कृपा पाने की प्रार्थना और ‘अलक्ष्मी’ के विदा होने की कामना की गयी है-
तां पद्मिनां शरणं प्रपद्ये लक्ष्मीर्मे नाश्यतां त्वां वृणे।
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाश्याम्यहम्
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्गुुद मे गृहात॥8॥
अथर्ववेद में भी ‘अलक्ष्मी’ का वर्णन है। अथर्ववेद (7,115,3-4) में लक्ष्मी के एक सौ एक स्वरूपों का वर्णन किया गया है। इनमें से कुछ शुभ हैं और कुछ नकारात्मकता का भाव लिए हैं।-
एकशतं लक्ष्म्यो मर्तस्य साकं़.़.़.़.़॥3॥
रमन्तां पुण्यालक्ष्मीर्या:
पापीस्ता अनीनशम्॥4॥
ज्येष्ठा और ‘अलक्ष्मी’ का उल्लेख जातक कथाओं में भी मिलता है। इनमें लक्ष्मी को सिरिं (श्री) और ‘अलक्ष्मी’ को ‘कालकण्णि’ कहा गया है। ‘अलक्ष्मी’ अथवा ज्येष्ठा शब्द के उल्लेख शब्द कल्पद्रुम, हेमाद्रि की चतुर्वर्ग चिन्तामणि, अग्निपुराण, पद्मपुराण आदि अनेक ग्रंथों में मिले हैं। पद्मपुराण में ज्येष्ठा का विवाह कलि से होने का वर्णन मिलता है।
‘शब्द कल्पद्रुम’ ग्रंथ में ‘अलक्ष्मी’ के स्वरूप और गुणों का विस्तृत विवरण है। ज्येष्ठा अथवा ‘अलक्ष्मी’ को कुरूप, काली, लोहे के आभूषणों वाली, झाड़ू लिए, दरिद्र, कलहप्रिया आदि बताकर उसके शत्रु के निवास में स्थिर होकर रहने की प्रार्थना की गयी है-
अलक्ष्मीस्त्वं कुरुपासि
कुत्सितस्थान वासिनी॥
दरिद्र कलहप्रिये देवि त्वं धननाशिनी।
याहि शत्रोर्गृहे नित्यंस्थिरा तत्र भविष्यसि॥
मातृशक्ति की पूजा-आराधना के लिए विशेष रूप से विख्यात बंगभूमि में ज्येष्ठा लक्ष्मी-पूजा का विधान अधिक स्पष्ट और लोकप्रिय है। यहां कार्तिक अमावस्या यानी दीपावली के दिन ही सायंकाल ‘अलक्ष्मी’ पूजा की जाती है। गौरतलब है कि बंगाल में कार्तिक अमावस को नहीं वरन् शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी पूजा की जाती है। मुख्य दीपावली की रात जब देशभर में सुख-सौभाग्य प्रदान करने वाली मां लक्ष्मी व विघ्नहर्ता गणेश की पूजा की जाती है, तब बंगाल में पूरे विधि-विधान से ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा मां काली की विधिपूर्वक आराधना की जाती है जो रात्रि के प्रथम प्रहर से प्रारंभ होकर अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त तक चलती है। बंग समाज में इस काली-पूजा से पूर्व सायंकाल को ज्येष्ठा लक्ष्मीपूजा की जाती है। इसके लिए गाय के गोबर से ‘अलक्ष्मी’ देवी की मूर्ति बनाकर उसे घर के द्वार पर घर की ओर पीठ करके स्थापित किया जाता है। सूर्यास्त के समय ब्राह्मण पुरोहित अलक्ष्मी की पूजा अपने बाएं हाथ से करते हैं। पूजा सम्पन्न होने के तत्काल बाद उस मूर्ति को किसी जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है। ज्येष्ठा या अलक्ष्मी-पूजा तथा उसके विसर्जन के उपरान्त दीपक जलाये जाते हैं और काली-पूजा की तैयारी की जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना के पहले गणपति आदि देवताओं के साथ दुष्टों, अधर्मियों और असज्जनों के भी प्रसन्न होने की प्रार्थना की है जो बिना किसी कारण सद्कार्य में विघ्न डालने के लिए तैयार रहते हैं।
दक्षिण भारत में भी ज्येष्ठा की पूजा दुर्भिक्ष, आपदा, विपत्ति आदि को दूर करने के लिए की जाती थी। इस पूजा से भक्ति (भोग) तथा मुदित (मोह), दोनों प्राप्त होने का विश्वास था। वहां ज्येष्ठा के मन्दिर बस्ती से बाहर निर्जन स्थान में अथवा नदी किनारे बनाये जाते थे।
जिस प्रकार दिन का महत्व रात से, प्रकाश का अंधकार से, सम्पन्नता का विपन्नता से, सुख का दुख से, सौभाग्य का दुर्भाग्य से और भलाई का बुराई से है, ठीक इसी प्रकार लक्ष्मी का महत्व ‘अलक्ष्मी’ से है। रात कभी न आए तो दिन का क्या महत्व रह जायेगा, वैसे ही दुख, दुर्भाग्य और दरिद्रता के आने पर ही गुण, सौभाग्य और समृद्धि की विशिष्टता ध्यान आती है। शायद इसीलिए लक्ष्मी के साथ ‘अलक्ष्मी’ का अस्तित्व है। लक्ष्मी वहीं रहती हैं जहां स्वच्छता हो, स्वच्छता केवल घर ही नहीं, तन-मन की भी। जिसका घर गन्दा होगा, तन और मन गंदा होगा वहां लक्ष्मी नहीं, ‘अलक्ष्मी’ आएंगी। इसीलिए दीपावली के अवसर पर सभी लोग अपने-अपने घरों को साफ-सुथरा बनाते हैं ताकि उनके घर लक्ष्मी पधारें। इसके लिए झाड़ू व सूप आदि से घर व अन्न की साफ-सफाई की परम्परा है। कारण यह है कि सूप से अन्न फटकने पर कूड़ा-कंकड़ बाहर गिर जाता है और सूप में अन्न के साफ दाने बचे रहते हैं।
ज्येष्ठा अर्थात ‘अलक्ष्मी’ का मूर्तांकन
दक्षिण भारत में सर्वप्रथम 7वीं-8वीं शती ई़ में पल्लव गुहा-वास्तु में प्राय: प्रवेशद्वार के पार्श्व मन्दिर में ज्येष्ठा की मूर्ति का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ था। इसके प्राचीनतम उदाहरण तिरुप्परनकुनरन (मदुरै) तथा मलयादिकुहच्चि (तिरुनेतवेली) के गुहा-वास्तु में हैं। इसके अतिरिक्त चिंगलपुट के निकट वल्लम, अलंकरप्पेरि (तिरुनेलवेली) के गुहा-वास्तु में भी ज्येष्ठा प्रतिमा के अंकन हैं। इन दोनों स्थानों पर ज्येष्ठा के साथ गणेश का भी मूर्तांकन है। मदुरै के निकट सुब्रह्मण्यम मंदिर में मिले एक पाण्ड्य मंत्री के अभिलेख के अनुसार उस मंदिर में भी ज्येष्ठा की एक मूर्ति है। कैलाशनाथ मंदिर, मुवरकोइल मंदिर (कोदुम्बलुरु) के अतिरिक्त तंजौर जनपद में तिरुक्कोडिक्कावल, तिरुचेरै, कुंभकोणम, तिरुवेंगइवसल से प्राप्त 19वीं शती की ज्येष्ठा की मूर्तियां व पुटुकोट्टई संग्रहालय में प्रदर्शित ज्येष्ठा की मूर्तियां भी उल्लेखनीय हैं।
उपयुक्त स्थानों से मिली मूर्तियों में ज्येष्ठा का मध्य में, उनके पुत्र वृषभमुख वृषभांक का उनके दायें पार्श्व में तथा पुत्री अग्निमथा का बाएं पार्श्व में अंकन किया गया है। मुवरकोइल से मिली ज्येष्ठा प्रतिमा में दोनों ऊपर उठे हाथों में सनाल कमल कलिका है। इस प्रतिमा में वृषभांक तथा अग्निमथा ललितासन और सव्य ललितासन में हैं। एक-दो प्रतिमाओं में अग्निमथा एवं वृषभांक ने अपना एक पैर उठाकर आसन पर टिका रखा है। कैलाशनाथ में मिली ज्येष्ठा की एक मूर्ति के दाएं पार्श्व में काकध्वज दृष्टव्य है। तिरुवेल्लवइल के प्राप्त मूर्तिफलक में ज्येष्ठा में दोनों पार्श्वों में पीछे काकध्वज बनाया गया है। इस फलक में देवी के पैरों के दोनों ओर खड़ी एक-एक नारी सेविका भी अंकित है। पूनम नेगी










