मीडिया की ‘असहिष्णुुता’
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मीडिया की ‘असहिष्णुुता’

Written byArchiveArchive
Nov 9, 2015, 12:00 am IST
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दिंनाक: 09 Nov 2015 16:43:10

त्योहारों का मौसम है। आम तौर पर यह वक्त खुशियों का होता है। लेकिन अगर आप कोई न्यूज चैनल देखने बैठ जाएं तो घबरा जाएंगे। टीवी के आगे ऐसा लग रहा है मानो देश पर कोई विपत्ति टूट पड़ी हो। समाज में अचानक सहिष्णुता कम हो गई है। हर जगह मार-काट मची हुई है। देश में गृहयुद्घ जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है। बीते बिहार चुनाव से पहले देश में जो माहौल बनाया गया है उसे देखकर किसी को भी ऐसा लग सकता है।

एनडीटीवी इंडिया ने ‘कलाकार से इतिहासकार तक बागी’ नाम से बहस में बताया कि कैसे यह ‘बगावत’ सभी क्षेत्रों में फैल चुकी है। इस बहस में रा. स्व. संघ का पक्ष रख रहे राकेश सिन्हा के तर्कों के आगे एंकर बार-बार तिलमिला जाता है। वह एक वामपंथी पत्रकार और पुरस्कार लौटाने वाला एक वैज्ञानिक, सभी एक ही पक्ष की दलीलें देते हैं। आम तौर पर ऐसी स्थिति में पत्रकार की भूमिका तटस्थ की होनी चाहिए, लेकिन एंकर का सारा जोर ऊंची आवाज में यह दोहराने पर है कि देश में माहौल ठीक नहीं है, लोगों की बोलने की आजादी छीनी जा रही है और विरोध करने वालों की हत्या हो रही है। यह वही एंकर है जिसके ‘पारिवारिक हित’ बिहार चुनाव से जुड़े हुए हैं। बेहतर होता कि एक ‘डिस्क्लेमर’ की तरह दर्शक को यह बात बताई जाती।

सहनशीलता को लेकर चल रही ‘राष्टÑीय बहस’ के बीच कुछ अति-सेकुलरवादी पत्रकारों ने हिंदुओं की परंपराओं को अपमानित करना जारी रखा है। बीते हफ्ते करवाचौथ का पर्व मनाया गया। ट्विटर से लेकर अखबारों के स्तंभों तक बाकायदा लेख लिखकर बताया गया कि कैसे करवा चौथ का व्रत दकियानूसी सोच वाला त्यौहार है।

दिल्ली के केरल भवन की कैंटीन में ‘बीफ’ को लेकर एक विवाद हुआ। बुलाने पर वहां पुलिस गई और मामला शांत करवा दिया। लेकिन देश का मीडिया कहां चुप बैठने वाला था। यह ‘अतिसक्रिय’ लेकिन पक्षपाती मीडिया का एक और चेहरा है। शाम होते-होते तमाम अंग्रेजी, हिंदी चैनलों पर बहस हो रही थी कि पुलिस ने शिकायत मिलने पर केरल भवन पहुंचकर कितना बड़ा पाप कर दिया। मीडिया बड़ी ही चालाकी से इस तथ्य को छिपाता रहा कि अगर केरल भवन में कोई गड़बड़ी हो जाती तो क्या पुलिस की जवाबदेही नहीं बनती। केरल भवन दिल्ली पुलिस के ही अधिकार क्षेत्र में आता है, वह किसी दूसरे देश का दूतावास नहीं है।

इसी मुद्दे पर सीएनएन-आईबीएन पर बहस में तटस्थ पक्ष रखने के लिए बुलाई गई महिला पत्रकार अचानक कांग्रेस की प्रवक्ता बन गर्इं। उन्होंने कहा कि ‘देश की जनता को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि उन्होंने भाजपा को वोट देकर कितनी बड़ी भूल की है’। यह हालत है देश के तथाकथित निष्पक्ष मीडिया की। तथ्यों और नियमों की अनदेखी करके अब भारत की जनता को कोसा जा रहा है कि उसने भाजपा को क्यों चुना, कांग्रेस को       क्यों नहीं।

उत्तर प्रदेश में कब्र खोदकर एक मृत महिला के शव से दुष्कर्म की खबर आई। एक मनोरोग के कारण होने वाला यह अपराध विदेशों में आम है। वैसे तो यह मामला यूपी पुलिस का है, लेकिन इंडिया टुडे टीवी की एक पत्रकार ने मामले को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से जोड़ दिया। उस पत्रकार ने ट्वीट करके इस घटना के लिए भी मोदी सरकार को दोषी ठहरा दिया।

मीडिया और कुछ खास तरह के पत्रकार ऐसी पक्षपाती बातें भूलवश कर रहे हों, ऐसा कतई नहीं लगता। मशहूर शायर मुनव्वर राना के पुरस्कार लौटाने पर खुशी से फूले न समा रहे तथाकथित प्रगतिशीलों ने अब उनको गालियां देनी शुरू कर दी हैं। नाराजगी इस बात से है कि वे प्रधानमंत्री मोदी के बुलावे पर उनसे मिलने को क्यों तैयार हो गए। मुनव्वर राणा को ‘बिका हुआ’ और ‘दलाल’ साबित किया जा रहा है। इस असहिष्णुता पर प्रगतिशील मीडिया मौन है।

सरकार को लेकर वैज्ञानिक पुष्प मित्र भार्गव की टिप्पणियों को सभी चैनलों ने दिखाया, लेकिन उसी समय दूसरा पक्ष रख रहे देश के सबसे बड़े अंतरिक्ष वैज्ञानिक जी. माधवन नायर की बात अनसुनी कर दी गई।

फिलहाल निर्माता-निर्देशक का चेहरा सामने आ जाने के बाद भी पुरस्कार वापसी का नाटक जारी है। हर दिन एक कलाकार अवार्ड वापस करता है और मीडिया ताली बजाता है। मुनव्वर राणा के मामले में मुंह की खाने के बाद अब गुलजार और दूसरे कई फिल्मवालों को आगे किया गया। लगभग सभी चैनलों ने इसे खूब दिखाया। बस किसी ने यह नहीं बताया कि गुलजार मोदी के खिलाफ प्रचार करने बनारस भी गए थे। अब जब बिहार चुनाव अहम दौर में है, उनका पटना जाना क्या कुछ संदेह पैदा नहीं करता? दर्शकों को यह जानने का हक नहीं है कि उनका पसंदीदा गीतकार एक राजनीतिक निष्ठा भी रखता है। जिस दिन गुलजार मोदी सरकार को कोस रहे थे और बिहार में भ्रष्टाचारी गठबंधन को वोट देने की अपील कर रहे थे, उसी दिन दिल्ली में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिए गए। देश और दुनिया में धाक रखने वाले इन कलाकारों ने शाम को प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की। सभी कलाकारों का कहना था कि देश में डर या बंदिश का कोई माहौल नहीं है। मुख्यधारा मीडिया को इससे शायद मिर्ची लग गई और सबने इस खबर को सिरे से नजरअंदाज     कर दिया।

पुरस्कार वापसी की इसी होड़ में नए-नवेले फिल्म निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने तो वह राष्टÑीय पुरस्कार वापस कर दिया, जो उन्हें कभी मिला ही नहीं। पुरस्कार वापस करने के उनके ऐलान को मीडिया ने खूब जगह दी। लेकिन बाद में जब फिल्म ‘खोसला का घोसला’ की निर्माता सविता राज हीरेमत ने सामने आकर सच्चाई खोल दी तो मीडिया ने चुप्पी साध ली। हालांकि सोशल मीडिया लगातार ऐसी ‘जालसाजियों’ की पोल खोलने में जुटा हुआ है।

समाचार चैनलों पर बयानों को बदलने और उन्हें दूसरा रंग देने का खेल जारी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने टीवी टुडे से इंटरव्यू में कहा कि ‘हर मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री से जवाब मांगने की परंपरा गलत है। उनके बाद मैं हूं। करना है तो पहले मुझे टारगेट करें।‘ इस बात को समूह के दोनों बड़े चैनलों ने इस तरह दिखाया- ‘राजनाथ सिंह ने कहा है कि प्रधानमंत्री के बाद मैं नंबर-2 हूं।‘

भारत के बारे में आर्थिक संस्था मूडीज की रिपोर्ट को खूब दिखाया गया, क्योंकि इसमें भारत में ‘धार्मिक सहिष्णुता’ पर टीका-टिप्पणी की गई थी। सोशल मीडिया ने इस रपट का सच सामने ला दिया कि कैसे यह रपट एक प्रशिक्षु स्तर के व्यक्ति ने बनाई है और रपट में उसके अपने पूर्वाग्रह झलक रहे हैं। ऐसे समाचारों में देश का मुख्यधारा मीडिया अपनी अपरिपक्वता जता देता है, जबकि सोशल मीडिया सच्चाई के ज्यादा करीब दिखाई     देता है।

उधर, फरीदाबाद में वंचित परिवार के घर में आग की फोरेंसिक रपट सामने आई है। इससे इशारा मिलता है कि शायद आग बाहर से नहीं, बल्कि घर के अंदर से ही लगी है। सीधे हरियाणा की भाजपा सरकार को दोषी ठहराने वाले मीडिया ने इस समाचार पर चुप्पी साध ली। इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर को किसी ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। अगर यह रपट साबित हो गई तो क्या इस बेहद

कुछ अंग्रेजी अखबार और एबीपी न्यूज छोटा राजन को ‘हिंदू डॉन’ लिख रहे हैं। इनके संपादक फेसबुक पर दलीलें दे रहे हैं कि छोटा राजन को हिंदू डॉन लिखने में क्यों कुछ भी गलत नहीं है। ये वही लोग हैं जिन्होंने ‘हिंदू आतंकवाद’ की कहानी गढ़ी थी। अगर इनकी दलील से ही चलें तो क्या दाऊद इब्राहिम को ‘मुसलमान डॉन’ और कश्मीर में दहशत फैला रहे भाड़े के लोगों को ‘मुसलमान डॉन ही   कहा जाय? बिहार चुनाव की कवरेज में मुख्यधारा मीडिया और इसके कुछ संपादकों ने खुलकर अपनी लाइन ले रखी है। प्रधानमंत्री मोदी ने जब संसद में दिए एक भाषण के हवाले से बताया कि कैसे वंचितों, पिछड़ी जातियों के आरक्षण में बंटवारा करने का नीतीश कुमार ने सुझाव दिया था, तो इसे पंथ के आधार पर ध्रुवीकरण बताया गया। लेकिन जब लालू यादव ने कहा कि चुनाव ‘बैकवर्ड और फारवर्ड की लड़ाई’ है तो एक जाने-माने पक्षपाती संपादक ने इसे ‘लालू का मास्टरस्ट्रोक’ करार दिया। जब अपने चैनल पर यह बात कहने से पेट नहीं भरा तो हिंदुस्तान टाइम्स में संपादकीय लिखकर यह बात लिखी।

बिहार चुनाव पर मीडिया में एक और खेल भी चल रहा है। 31 अक्तूबर को राजस्थान पत्रिका ने समाचार छापा कि ‘आईबी की मानें तो राजग को बस 75 सीट’। इस अखबार के संपादक से कौन पूछेगा कि क्या आईबी चुनाव सर्वे करने वाली संस्था है? क्या उन्हें आईबी के काम करने के तरीके के बारे में कुछ पता भी है? झूठ फैलाने के लिए एक जिम्मेदार संस्था के नाम का इस्तेमाल कहां तक सही है? इस खबर को सुनियोजित ढंग से सोशल मीडिया पर फैलाया गया। फैलाने वालों में कई ऐसे संपादक भी थे, जो अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर दुबले हुए जा रहे हैं।

एक तांत्रिक के साथ नीतीश कुमार का वीडियो सामने आने के बाद समाचार चैनलों को भी अंधविश्वास फैलाने वाले प्रोग्राम दिखाने का मौका मिल गया। आजतक ने भूतों के अस्तित्व पर अपनी ‘विशेष पड़ताल’ की। बाकी चैनलों ने भी इसी बहाने टीआरपी के परनाले में डुबकी लगाने का मौका नहीं छोड़ा। किसी खबर का समाज पर क्या फर्क पड़ता है, इसकी चिंता न्यूज चैनलों को वैसे भी कभी नहीं रही है। मोहर्रम के मौके पर यूपी के कई शहरों में दंगों की घटनाएं हुईं। इन सभी में राज्य सरकार के प्रश्रय में पल रहे मुस्लमान बलवाइयों का हाथ था। कुछ में राज्य सरकार के मंत्रियों के भी नाम हैं। लगभग सभी चैनलों और अखबारों ने इन दंगों की खबर नहीं दिखाई। यह अच्छी बात है कि दंगों और हिंसा की खबरों को दिखाने से बचना चाहिए, लेकिन सोचिए अगर यूपी में भाजपा की सरकार होती तो भी क्या ऐसा ही होता।

उधर, एनडीटीवी कांग्रेस के आधिकारिक चैनल की भूमिका बखूबी निभा रहा है। संजीव भट्ट को सर्वोच्च न्यायालय की फटकार लगी, कथित ताबूत घोटाले के आरोपों की पोल खुली, नेशनल हेराल्ड घोटाले में गांधी परिवार पर शिकंजा कसा, लेकिन ये और ऐसी तमाम खबरें एनडीटीवी पर पूरी तरह गायब रहीं। वैसे भी चैनल के संवाददाता इन दिनों बिहार में घूम-घूमकर वहां पर नीतीश कुमार के ‘अदृश्य विकास’ की गाथा सुनाने में जुटे हैं। अच्छी बात है कि दर्शक अब ऐसी धांधलियों को समझने लगे हैं और इन पर अपनी नाराजगी सोशल मीडिया पर दर्ज कराना नहीं भूलते। नारद

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