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पाञ्चजन्य के पन्नों से
वर्ष: 12 अंक: 32
16 फरवरी 1959
कश्मीर दिवस पर प्रो. मधोक की चेतावनी
यदि शीघ्र ही जम्मू-कश्मीर राज्य पर भारतीय सुप्रीम कोर्ट एवं चुनाव आयोग का पूर्ण नियंत्रण स्थापित न किया गया तो कुछ ही समय पश्चात भारतवासी सुनेंगे कि जम्मू-कश्मीर के वे जागरूक भारत समर्थक तत्व, जिनके संघर्ष और बलिदान के कारण ही पं. नेहरू के परम मित्र शेख अब्दुल्ला के झूठे प्रचार का भंडाफोड़ हो सका था और कश्मीर राज्य सदैव के लिए भारत के हाथों से निकलने से रोका जा सका था, धीरे-धीरे बख्शी गुट द्वारा अप्रजातांत्रिक एवं तानाशाही तरीकों द्वारा कुचल डाले गए हैं, अभाव प्रभावहीन कर दिए गए हैं। इन शब्दों में 8 फरवरी को लखनऊ के अमीनुद्दौला पार्क में आयोजित एक विशाल जनसभा में जनसंघ के उत्तरभारत क्षेत्र के मंत्री प्रो. बलराज मधोक ने भारतीय जनता को सामयिक चेतावनी दी। यह सभा भारतीय जनसंघ के द्वारा देश भर में मनाए जाने वाले कश्मीर दिवस के अवसर पर आयोजित की गई थी।
पत्रकारों का दायित्व
प्रो. मधोक ने जो अभी पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति का प्रत्यक्ष अध्ययन करके लौटे हैं, बख्शी गुलाम मोहम्मद के भारत विलयन के झूठे प्रचार को अत्यधिक महत्व देने वाले भारतीय समाचार पत्रों एवं पत्रकारों को सचेत करते हुए कहा कि भारत के हितों के सतर्क प्रहरी होने के नाते उनका यह कर्तव्य है कि वे स्वयं इस झूठे प्रचार का अस्त्र बनाकर भारतीय जनता को भ्रमित करने का पाप न करें और कश्मीर जाकर अपनी आंखों कश्मीर में किस प्रकार निरंकुशता और अनाचार का शासन चल रहा है।
कश्मीर प्रवक्ता को चुनौती
प्रो. मधोक ने, जो वर्षों तक जम्मू-कश्मीर में सक्रिय समाजसेवी रहे हैं और वहां की इंच-इंच भूमि से परिचित हैं, जम्मू कश्मीर राज्य के उस गुमनाम प्रवक्ता को जिसने एक प्रेस वक्तव्य द्वारा जनसंघ के इस कथन का खण्डन किया है कि जम्मू-कश्मीर राज्य में जनाधिकारों का हनन हो रहा है और कहा है कि जनसंघ की यह मनगढ़न्त कल्पना है, चुनौती देते हुए निम्न तथ्य प्रस्तुत किए:
इन तथ्यों का जवाब दो
अधिक विवाद में न पड़ते हुए हम कश्मीर सरकार से केवल इतना कहना चाहते हैं कि क्या वह इस बात से इनकार कर सकती है कि विसना में नेशनल कान्फ्रेंस का हारा हुआ उम्मीदवार प्रजा परिषद के अधिक मत प्राप्त करके जीते हुए उम्मीदवार के स्थान पर विजयी घोषित किया गया ? और जब प्रजा परिषद का उम्मीदवार रिट दाखिल करने के लिए जम्मू आ रहा था तो उसे गिरफ्तार करके हवालात मेें बुरी तरह पीटा गया और क्या श्री बचनसिंह पंछी को, जिन्होंने इस ज्यादती का विरोध किया, जब वह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के मंत्री श्री एन. जी. गोरे से बातें कर रहे थे गिरफ्तार किया गया ?
क्या कठुआ में प्रजा परिषद् के उम्मीदवारों का अपहरण नहीं किया गया और उनमें से एक से जिला मजिस्ट्रेट ने पिस्तौल की नोक पर चुनाव से नाम वापसी के फार्म पर हस्ताक्षर नहीं कराए?
हिन्दुस्तान टाइम्स का मत
श्रीमती गांधी के द्वारा ही कांग्रेस टूटेगी
(निम्नलिखित अंश दिल्ली के प्रसिद्ध दैनिक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के सम्पादक श्री एस. मुलगांवकर द्वारा लिखे गए लेख से लिए
गए हैं-सं.)
श्रीमती गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कैसी रहेंगी? इस प्रश्न का सबसे अच्छा उत्तर रहेगा कि आप दूसरा प्रश्न पूछें-इन्दिरा गांधी अन्य भू. पू. अध्यक्षों से किन मायनों में भिन्न हैं? श्रीमती गांधी उन अध्यक्षों से इस मायने में सर्वथा भिन्न हैं कि उन्हें केन्द्रीय कार्यकारिणी से नीचे के संगठनात्मक पहलू का रंचमात्र अनुभव नहीं है। यदि उनका कभी सम्बन्ध आया भी है तो केवल प्रदर्शनात्मक कार्यों में। संगठनात्मक कार्य में कभी उनका प्रवेश नहीं रहा और इसका एक ही स्पष्टीकरण हो सकता है कि प्रकटतया ही उनकी इसमें रुचि नहीं थी। राज्यों के स्तर पर संगठन के यन्त्र से वे परिचित नहीं हैं। और वे शायद यह तो और भी कम जानती होंगी कि कैसे व्यक्तियों को जोड़-तोड़कर प्रदेश की कमेटियां काम चलाती हैं। इसमें भी पर्याप्त सन्देह है कि दिल्ली और उ.प्र. के बाहर अन्य प्रदेशों के उच्च कांग्रेसी नेतृत्व से भी उनका परिचय नहीं से कुछ ही ज्यादा है।
क्या करना चाहती हैं ?
अध्यक्षा बनने के उपरान्त श्रीमती गांधी निश्चय ही कांग्रेस की वर्तमान अवस्था में परिवर्तन करना चाहेंगी। उन्होंने स्वयं कहा है, 'वे कांग्रेस संगठन को एक जाग्रत रचानात्मक संगठन में परिणत करना चाहेंगी, ताकि उसके आधार पर हमारे द्वारा पारित प्रस्ताव कार्यान्वित हों, न कि जैसे अक्सर होता है बड़े-बड़े प्रस्तावों की हवा बांध कर उन्हें दफना दिया जाता है।'
दिशाबोध – राजनीतिक बल एक माध्यम
लोकतंत्र में सरकार चलाने के एक साधन के रूप में राजनीतिक दलों का महत्व होता है। जनमत को प्रकट रूप से संगठित करना, लोगों के अधिकार पर अतिक्रमण होता तो उसका प्रतिकार करना और लोगों के दु:खों एवं शिकायतों को सरकार के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए उनका निवारण करना आदि सारे काम राजनीतिक दलों को करने होते हैं। भारतीय राजनीतिक दल केवल सत्ता प्राप्त करने, सत्ता जीतने, उसे भोगने तथा बनाए रखने में ही निमग्न रहते हैं। कांग्रेस का विरोध करते समय पुनर्रचना का लक्ष्य भी महत्वपूर्ण है। भारत में एकदलीय जनतंत्र के बाद द्विदलीय लोकतंत्र नहीं आएगा। अत: बहुदलीय लोकतंत्र एक अटल व्यवस्था है इस मूलतत्व का भान सदैव रखना चाहिए। किन्तु राजनीतिक दलों को आपस में सौहार्द के संबंध भी रखने चाहिए। और देखना चाहिए कि लोकसेवा के माध्यम के नाते ही राजनीतिक दलों का संगठन किया जाता है। -पं. दीनदयाल उपाध्याय विचार-दर्शन, खण्ड-3, पृष्ठ संख्या-98











