| दिंनाक: 06 Jun 2015 14:24:52 |
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सात साल का मेरा पौत्र रोज रात में मुझसे कहानियां सुने बिना सोने के लिए राजी नहीं होता। जाने कितनी कहानियां सुना चुका हूं उसे, पर क्या गजब की स्मरण शक्ति है उसकी। बासी हो चुकी कोई कहानी उसे सुनाता हूं तो पकड़ा जाता हूं। रामायण, महाभारत के लम्बे लम्बे आख्यान, महाराणा प्रताप और शिवाजी की वीरता की गाथाओं से लेकर अलिफ लैला के किस्सों तक सबमें उसकी रुचि है। भारतीय परिवेश और पृष्ठभूमि की कहानियां सुनाकर थक जाता हूं तो फिर सिंडरेला और थ्री लिटिल बियर्स वाली कहानियों पर आ जाता हूं। इस चक्कर में मुझे नित नयी कहानियां पढ़नी पड़ती हैं इसी तलाश में कल मैंने कई वर्षों पहले पढ़ा हुआ मिगुएल डी सर्वंतीज का लिखा प्रसिद्ध उपन्यास 'डॉन क्विक्जोट' फिर से उठा लिया।
यह भी एक बहुत मजेदार आख्यान है। इसका नायक है मध्यकालीन स्पेन का एक छोटा मोटा सामंत 'अलोंसो क्विक्सानो।' अत्यंत अव्यावहारिक और थोड़े 'खिसके हुए' क्विकसानो को पुस्तकें पढने का बहुत शौक है। सामंतवादी परम्परा की शौर्य गाथाओं को पढ़कर क्विक्सोनो को भी जोश आ आता है। श्वेत जिरहबख्तर पहन कर, अपने रणबांकुरे घोड़े पर सवार होकर, तलवार हवा में घुमाते हुए दुश्मनों को ललकारता हुआ वह भी निकले और किसी नृशंस शत्रु को एक रोमांचकारी मुठभेड़ में परास्त करके उसके चंगुल में फंसी किसी लावण्यमयी ललना को अभयदान दे सके, बस यही उसकी अभिलाषा है। इसी लालसा से 'क्विक्सानो' अपनी जमीन-जायदाद बेचकर 'रोसिनान्ते' नामक अपने साधारण से घोड़े पर निकल पड़ता है। साथ में उसके भृत्य के रूप में 'सांचो पंाजा' नामक एक स्थानीय मेहनतकश मजदूर है जिसे 'क्विक्सानो' ने अपनी विजययात्रा की समाप्ति पर एक द्वीप का जागीरदार बना देने का स्वर्णिम सपना दिखाकर साथ चलने को राजी कर लिया है। 'क्विक्सानो' अब अपने जीवन की एकमात्र अभिलाषा पूरी करने के लिए 'डॉन क्विक्जोट' का नया नाम धारण करके निकल पड़ता है।
महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए आयोजित इन अभियानों में रोमांचकारी करतब दिखाने के चक्कर में 'डॉन क्विकजोट' जो हास्यास्पद हरकतें करता है उनके वर्णन 'सेर्वेंतीज' के उसी नाम के उपन्यास में पढ़कर हंसते-हंसते पाठकों के पेट में बल पड़ जाते हैं। इन अभियानों में सबसे मुश्किल काम है किसी ऐसे क्रूर और नृशंस शत्रु और प्रतिद्वंद्वी की तलाश करना जो किसी निर्बल असहाय का उत्पीड़न कर रहा हो। अगला काम है इस अत्याचारी से सनसनीखेज द्वंद्व करके उस असहाय शिकार को मुक्त कराना। 'डॉन क्विक्जोट' इस अनदेखे अनजाने शत्रु को कहां नहीं तलाशता। सावन के अंधे को हर जगह जैसे हरा हरा ही दीखता है वैसे ही परोपकार अभियान पर निकले हुए 'डॉन क्विक्जोट' को हर जगह शत्रु ही दिखते हैं। फिर तो उसका तेवर इतना आक्रामक हो जाता है कि पवनचक्की के विशाल पंखों को दैत्याकार दानव समझकर वह उनके ऊपर हमला करने से भी बाज नहीं आता है।
उस दिन अपने पौत्र को 'डॉन क्विक्जोट' की कहानी सुनाते-सुनाते स्वयं मुझे नींद आ गई थी। मैं सपनों की दुनिया में विचरण करते करते जाने कैसे दिल्ली की सड़कों पर आ गया। अचानक मेरे पीछे सरपट भागते घोड़ों की टाप सुनाई दी। मुड़कर देखा तो बड़ा भयानक दृश्य था। 'डॉन क्विकजोट' और हर समय परछाई की तरह साथ रहने वाला उसका भृत्य 'सांचो पांजा' अपने भालों की नोक पर खून से लथपथ नरमुंड टांगे घोड़ों को एड़ लगाते, सरपट भगाते आ रहे थे। उनकी तेज गति के कारण मैं पहचान तो नहीं पाया कि वे नरमुंड किसके थे पर ऐसा आभास हुआ कि उनकी शक्ल समाचारपत्रों में देखे हुए दिल्ली सरकार के कुछ उच्चाधिकारियों से मिलती जुलती थी।
मुझे लगा कि वे निदार्ेष बेवजह ही चपेट में आ गए थे। 'डॉन क्विक्जोट' और 'सांचो पांजा' के घोड़े सरपट संसद भवन की दिशा में भाग रहे थे। सपनों की इस दुनिया में संसद भवन के ऊपर का गोल गुम्बज किसी पवनचक्की के पंखों जैसे लग रहे थे। उन विशाल पंखों के पीछे एक गौरवमय व्यक्तित्व दिखाई पड़ रहा था जो पवनचक्की के पंखों को दैत्य समझकर आक्रमण करते हुए 'डॉन क्विक्जोट' की बचकानी हरकत को देखकर मुस्करा रहा था। तभी मेरी नींद टूट गयी। देखा पत्नी मेरे चेहरे को ध्यान से देख रही थी। उसने पूछा 'बहुत परेशान लग रहे हो। लगता है कोई बुरा सपना देखा हैं। मैंने उसे अपना सपना सुना डाला। उसने तसल्ली देते हुए कहा 'चलो, सपने का अंत तो बुरा नहीं था। तुम्हारा 'डॉन क्विक्जोट' पवनचक्की पर हमले के बाद चेत जाएगा और काल्पनिक शत्रुओं के पीछे भागना बंद कर देगा। मैंने कहा 'असली दिक्कत तो ये है कि सच सपने से भी अधिक भयानक है। वह कोई न कोई बहाना लेकर काल्पनिक शत्रुओं पर हमले करता ही रहेगा। एक समस्या सुलझ जायेगी तो दूसरी पैदा करेगा। तुम्हें वह शेर याद है-
अगर हल हो गयी मुश्किल तो आसानी नहीं जाती, बहरसूरत मेरे दिल की परेशानी नहीं जाती।' ल्ल