| दिंनाक: 06 Jun 2015 15:14:24 |
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वाराणसी के लंका स्थित विश्व संवाद केन्द्र में 31 मई को 'चेतना प्रवाह' के पर्यावरण विशेषांक का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि विकास के साथ-साथ आज प्रकृति का पूरी तरह दोहन हो रहा है। पृथ्वी पर प्रदूषण प्रसार के लिए मनुष्य ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। वेदों और प्राचीन ग्रंथों में भी पर्यावरण सम्बन्धी चेतना व अनुशासन की चर्चा है। जब तक मन और विचार के स्तर पर हमारे अन्दर शुचिता नहीं आएगी तब तक पर्यावरण प्रदूषण कायम रहेगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और 'पाञ्चजन्य' साप्ताहिक के सम्पादक श्री हितेश शंकर ने कहा कि आज मानवता विकास के उस मोड़ पर है, जहां विकास करते हुए जीवन को भी सफल बनाना है। विकास के साथ ही चुनौतियां भी बढ़ती हैं। हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटकर ही आसन्न चुनौतियों का मुकाबला कर सकते हैं। जीवनदायी प्रकृति के प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए और उसके संरक्षण के लिए यथेष्ठ प्रयास जरूरी है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री प्रियरंजन शर्मा ने कहा कि एक वृक्ष मानव जाति ही नहीं, अपितु समस्त चराचर के लिए उपयोगी है। शुद्ध हवा और पानी जीवन की सबसे बड़ी अनिवार्यता है तथा वायु ही प्राण शक्ति है। मुख्य वक्ता इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. बालमुकुन्द ने कहा कि प्राकृतिक संतुलन और पर्यावरण के महत्व को समझने और समझाने की जरूरत है। पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में वनस्पतियों की अहम भूमिका है। पर्यावरण के घटक अपने दिव्य गुणों के दान से पर्यावरण को शुद्ध और स्वस्थ रखते हैं। विषय स्थापना करते हुए महामना मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान काशी विद्यापीठ के निदेशक प्रो़ ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि शुद्ध पर्यावरण जीवन का विस्तार है। जिस सृष्टि का निर्माण त्रिदेवों यथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने किया। आज उसी सृष्टि पर मानवीय गलतियों और लोभभाव के चलते खतरा खड़ा हो गया है। स्वागत भाषण विश्व संवाद केन्द्र के प्रमुख नागेन्द्र ने दिया। संचालन विशेषांक के सम्पादक डॉ. अत्रि भारद्वाज ने और धन्यवाद ज्ञापन ड़ॉ. हंस नारायण सिंह 'राही' ने किया।
ल्ल प्रतिनिधि