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मोरेश्वर जोशी
इस बार हम शुरुआत पिछले दिनों मैसूर में हुए विश्व की प्राचीन सभ्यताओं के पांचवें सम्मेलन से करते हैं। उसकी विशेषता यह थी कि अनेक सभ्यताओं के प्रतिनिधियों द्वारा उसमें खुद को 'इंडियन' कहलवाने का आग्रह किया गया था। उनमें अमरीका की 'लकोटा' सभ्यता भी थी। रीति-रिवाज भिन्न, भाषा भिन्न, जीवनशैली भिन्न होने के बाद भी उसके प्रतिनिधियों का यह विश्वास था कि 'हमारी सभ्यता में पूरी दुनिया की समस्याएं झेलने की ताकत है'। यह उनकी प्रदीर्घ परंपराओं का परिचायक था। मैसूर सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी यज्ञ परंपराओं के उदाहरण प्रस्तुत किए। हर एक सभ्यता की अपनी अलग पहचान थी़, फिर भी विश्व के आरंभ में किए गए प्रयत्न एवं उससे विकसित हुआ अध्यात्म उनकी तपश्चर्या के स्तर का परिचय प्रदान कर रहे थे। अमरीका के ये 'इंडियन' प्रतिनिधि इस खोज में थे कि क्या उनका अध्यात्म, उपासना पद्धति एवं कर्मकांड भारत एवं विश्व की अन्य सभ्यताओं की पद्धतियों से मेल खाता है कि नहीं।
पिछली दो सदियों में विश्व का बहुतांश ज्ञान विश्व के अग्रणी ज्ञानकोश के आधार पर व्यक्त होता दिखता है। उनकी नजर से देखा जाए तो अमरीका की 'इंडियन' कहलाने वाली इन सभ्यताओं और भारत का कोई संबंध नहीं है। उनका कहना है कि जब क्रिस्टोफर कोलंबस सन् 1492 में अमरीका पहुंचा तब उसे लगा था कि वह भारत पहुंच गया है। इसलिए उसने वहां के लोगों को 'इंडियन' नाम दिया। 'इंडियन' शब्द शायद 'इंडिजिनस' शब्द के विकल्प के रूप में प्रयुक्त होता हो, फिर भी अमरीका के 'इंडियन' नामक समुदाय का कहना है कि किसी शब्द के लिए दूसरे शब्द का प्रयोग करना एक सीमा तक ठीक है, लेकिन हमारे पुरखों ने अगर 500 वर्र्ष से गर्वपूर्वक हमें 'भारतीय' माना है तो फिर यह निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी क्यों की जाती है कि 'इंडियन' शब्द भूलवश आया है। वहां की सभी सभ्यताओं के प्रतिनिधियों का यही कहना है। दूसरे यह कि अंग्रेजी का 'इंडिजिनस' शब्द भी 'इंडियन' से लिया है, यह अनेक जानकारों का कहना है। पिछले 50 -60 वर्र्ष में भारतीय और अमरीकी सभ्यताओं में आपसी व्यवहार के सबूत देने वाले अनेक पहलू सामनेे आए हैं।
अमरीका के हर प्रांत की सभ्यता एवं उनका भारतीय सभ्यताओं से संबंध, इस विषय पर आज तक अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। जिस तरह कोलंबस को अमरीका की खोज करते समय 'इंडिया' की लगन थी, उसी तरह उस समय के एवं बाद के 200-300 वषोंर् में अलग-अलग साहस करने वालों में एवं विज्ञान का अध्ययन करने वालों में भी 'इंडिया' को लेकर उत्सुकता थी। इसी से 18वीं एवं 19वीं सदी में यूरोप का ज्ञान और विज्ञान प्रवाह 'इंडिया' से शुरू होता है। यह समझ आने के बाद 'इंडिया' को आधारभूत मानने पर अघोषित पाबंदी लगाई गई। पिछले 200 वर्ष तक विश्व पर यूरोपीय देशों का साम्राज्य था एवं उन्होंने यूरोप के वर्चस्व वाले सभी देशों पर यही दृष्टिकोण थोपा कि विश्व का इतिहास यूरोप से शुरू हुआ है। अमरीका और यूरोप के इसी सूची में होने के कारण यही माना गया कि 'कोलंबस के अमरीका में पहुंचने से पहले वहां केवल नरभक्षी समूह रहा करते थे। लेकिन अब अनेक नए पहलू सामने आ रहे हैं।
कोलंबस से पहले 500 वर्ष मध्य-पूर्व के उग्रवादियों द्वारा भारत को लूटा गया था और उनकी सत्ता भी काबिज हो गई थी। फिर भी यूरोप में भारत एक तरफ ज्ञान प्राप्ति के स्थान के रूप में दिख रहा था, तो दूसरी तरफ भारत लूट के योग्य स्थान के रूप में दिख रहा था। यह स्पष्ट होने के बाद कि पृथ्वी गोल है, उस समय के साहसी लोगों को लगने लगा कि वे चाहे किसी भी दिशा में जाएं, कभी न कभी भारत जरूर मिलेगा। अमरीका की खोज होने से पहले कोलंबस ने स्पेन के राजा और तत्कालीन पोप से लूट के बंटवारे का जो अनुबंध किया था, वह मुख्यत: भारत से लाई हुई लूट के बंटवारे को लेकर ही था। 15वीं सदी में एक तरफ दक्षिणपूर्व एशिया, चीन, जापान, मंगोलिया भारत से आए हुए दर्शन से मुग्ध थे तो वहीं यूरोप में युवा पीढ़ी को 'इंडिया' यानी 'इंडिजिनस' प्रतीत होने लगा था। उस समय के विज्ञान के सभी आविष्कारों का उपयोग भारत की खोज के लिए हुआ। उसी से यह स्पष्ट होता है कि इसमें लूट के अलावा और भी काफी कुछ संभव था। भारत का विज्ञान और विविध शाखाओं के विकास के प्रमाण देने के लिए यूरोपीय शोधकर्ताओं की आवश्यकता नहीं है। हाल ही में सूर्य सिद्धांत नामक एक ग्रंथ दिखा, इसमें पृथ्वी का वर्णन करते हुए अमरीका के 'इन्का' साम्राज्य का वर्णन भी आया है। आज भी इस साम्राज्य की भाषा में करीब 2000 शब्द भारतीय भाषाओं के निकट हैं।
उत्तरी अमरीका के 'लकोटा' समुदाय की विशेषता यह है कि पिछले 500 वषोंर् से वह समुदाय अपने आप को गर्व से 'इंडियन' कहता है। दूसरे, यूरोपीय लोगों के अमरीका में आने के बाद जिन्होंने उनका जीवटता से प्रतिकार किया उनमें भी इस समुदाय का प्रमुख रूप से उल्लेख किया जाता है। भारतीय लोगों को सुखद लगने वाली बात है कि वे 'अग्नी' के उपासक हैं। इस पूरी पृष्ठभूमि पर गौर करते समय एक बात ध्यान रखनी होगी कि अमरीका के 'इंडियन' कहलाने वाले 250 समुदायों पर बिना किसी अध्ययन के भारतीय होने की मुहर नहीं लगाई जा सकती। आगामी समय की कसौटी पर जो खरे उतर सकें, ऐसे शोधकार्य का उसे आधार देना होगा।
भारत के बारे में सचाई यह है कि यहां पर पिछले 1000 वर्ष विदेशी सत्ता के होने के कारण लाखों ग्रंथ जलाए गए। अमरीका में जो नए नए मुद्दे सामने आ रहे हंै उनके आधार पर एक बात स्पष्ट होती है कि केवल शब्दों की समानता अथवा कुछ बातें समान होने भर से इन दोनों सभ्यताओं का संबंध नहीं जोड़ा जा सकता। समय की कसौटी पर खरी उतरने वाली पद्धति से ही इन सारी बातों की प्रस्तुति करनी होगी। सन् 1050 में लिखित 'समरांगण सूत्रधार' ग्रंथ में भारत मे प्राचीनकाल में विमानशास्त्र होने के बारे में कुछ शास्त्रीय संदर्भ भी हैं। फिर भी आज उस तरह के ग्रंथों के उल्लेख से काम नहीं चलेगा। उसके आधार पर प्रत्यक्ष स्पर्धात्मक विश्व में उतरना होगा। विमानशास्त्र तो केवल एक उदाहरण है। इतिहास से लेकर विमानशास्त्र तक अनेक संदभोंर् में पुन: नए सिरे से प्रस्तुति करने के लिए अनेक भारतीय युवाओं ने ये सारे विषय फिर से हाथ में लिए हैं। उनके निष्कर्ष आने तक प्रतीक्षा करनी होगी। लेकिन दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस क्षेत्र में जितने युवा शास्त्रीय दृष्टिकोण के साथ कार्यरत हैं उससे कहीं अधिक युवाओं को इस प्रयास में आगे आने की आवश्यकता है।
जहां अमरीका की 'लकोटा' जनजाति जैसी सैकड़ांे जनजातियों को दासता का सामना करना पड़ा वहीं भारत की स्थिति भी कुछ अलग नहीं थी। अनेक सदियों से योद्धा परंपरा का रहा यह समुदाय आज अलग ही मुश्किल में फंसा है। समुदाय में 12 से 20 वर्ष की आयु के लड़के-लड़कियों में आत्महत्या का अनुपात बढ़ रहा है। इस बस्ती में पिछले 10 वर्ष में एक हजार युवाओं द्वारा आत्महत्या करने या उसका प्रयास करने के मामले दर्ज हुए हैं। लकोटा जनजाति ने अनेक नरसंहार झेले हैं। अनेक युद्धों में हिस्सा लेकर सफलता तो कभी असफलता का सामना किया है। लेकिन सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह थी कि वे कई महामारियों के शिकार हुए। सन् 1772-1780 के दौरान उनकी तीन चौथाई जनसंख्या चेचक की महामारी की चपेट में आ गई थी। क्रिस्टोफर कोलंबस के आने के बाद का कोई वर्ष उनके लिए स्थिरता लेकर नहीं आया। लकोटा उत्तरी अमरीका के पहले 'अब्रोजिनल इंडियन' माने जाते हैं। वे मुख्यत: कनाडा से सटे डकोटा प्रांत में रहते हैं। उनका विस्तार आस-पास के तीन-चार प्रांतों में दिखता है, पर मुख्यत: डकोटा प्रांत के निवासी ही माने जाते हैं। लकोटा, डकोटा और नकोटा उत्तरी अमरीका की पुरानी भाषाएं मानी जाती हैं। आज भी मूल 'इंडियन' ये ही भाषाएं बोलते हैं। पिछले कुछ वषोंर् में उनके संयुक्त साहित्य सम्मेलन भी हुए हैं। लेकिन उन साहित्य सम्मेलनों में चर्चा उनके राजनैतिक अस्तित्व को लेकर ही हुई है। पूरे उत्तरी अमरीका में फैले ये लकोटा लोग यूरोपीय लोगों द्वारा एक एक प्रदेश पर कब्जा करते जाने के साथ उत्तर में खिसकते गए। आज माना जाता है कि उनकी संख्या एक लाख से भी कम होगी।
यूरोपीय लोगों का विस्तार पूरे अमरीका में होने के बाद उत्तर डकोटा एवं दक्षिण डकोटा प्रांत में कुछ क्षेत्र उनके लिए तय कर दिए गए। वहीं उनकी बस्तियां नियंत्रित की गईं। उनकी कुछ बस्तियां कनाडा के मोन्टाना इलाके में भी हैं। उनकी बस्ती में उनके अपने कायदे चलते हैं। पुलिस भी उनकी होती है और न्यायालय भी उनके ही होते हैं। उनकी अपनी समृद्ध पांथिक एवं आध्यात्मिक परंपरा है। वे अपना वर्णन करते हुए कहते हैं, 'हम भगवान के लोग हैं।' अमरीका में ब्रिटिशों का वर्चस्व होने से पूर्व स्पेन के लोगों का राज था। उनकी भाषा में तो 'इंडियन' का अर्थ ईश्वर के लोग ही है। आज कई स्तरों पर आग्रह किया जाता है कि 'इंडियन' का अर्थ भारतीय नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी अमरीका के 250 समुदाय आज भी कहते हैं-'वी द इंडियन्स'। पिछले 500 वषोंर् पर गौर किया जाए तो उन पर आज तक कम से कम 10 युद्ध थोपे गए। हर युद्ध में अस्तित्व का मुद्दा आता रहा है। इस समुदाय के अनेक लोग अब शहरों में आम जीवन बसर कर रहे हैं, शिक्षा का अनुपात भी बढ़ रहा है, लेकिन कुल अमरीकी समाज की तुलना में वह मामूली है।
मैसूर सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों ने लकोटा सभ्यता का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया। उनके मत में खुद को 'भगवान के लोग' मानने वाला यह समुदाय पूरे विश्व की अनेक सभ्यताओं से मित्रता का इच्छुक है। अनेक युवाओं को आज भारत में आकर अपने 'इंडियन' होने पर शोधकार्य करना है, लेकिन इसके लिए अनुकूल राजनैतिक वातावरण वहां नहीं है। मैसूर सम्मेलन उनकी दृष्टि में एक नए युग का आरंभ करने वाला रहा था।











