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सतीश पेडणेकर
बीसवीं सदी का सबसे जघन्य अपराध था जर्मनी के तानाशाह हिटलर द्वारा साठ लाख यहूदियों का विभिन्न तरीकों से निर्मम नरसंहार, जिसकी बातें सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मानवता शर्मसार हो जाती है। यकीन नहीं होता कि मनुष्य इतना क्रूर भी हो सकता है। लेकिन क्या इस हत्याकांड के लिए केवल हिटलर ही दोषी था? इतिहासकारों का कहना है कि इस नरसंहार के लिए जितना दोषी हिटलर था उतनी ही दोषी ईसाइयत भी थी। यह बात अटपटी लग सकती है, क्योंकि यहूदियों के हत्याकांड को केवल हिटलर की ही करतूत माना जाता है। बात सही भी है, प्रत्यक्ष तौर पर तो हिटलर ने ही यहूदियों का नरसंहार किया था। लेकिन ईसाइयत के दो हजार साल के घोर यहूदी विरोध ने इस हत्याकांड के लिए जमीन तैयार की थी। किसी लेखक ने टिप्पणी की थी कि यहूदियों ने एक ईसा को सूली चढ़ाया था, ईसाइयत ने इसके बदले में दो हजार साल बाद 60 लाख यहूदियों को सूली चढ़ाने का इंतजाम कर दिया। यही है ईसाइयत? प्रेम, शांति, करुणा और सेवा का पंथ?
ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि ईसाइयों का यहूदी विरोध अचानक नहीं फूट पड़ा था। उसका दो हजार साल पुराना इतिहास है। दरअसल ईसाइयत के शुरुआती दिनों से ही उसमें यहूदी विरोधी भावना थी, जो आने वाली शताब्दियों में और बलवती हो गई। ईसाइयों द्वारा की गई यहूदियों के खिलाफ हिंसा और हत्याओं ने आखिरकार नरसंहार का रूप लिया। दो सहस्राब्दियों तक ईसाई शिक्षा, कला और उपदेशात्मक प्रचार में यहूदियों के प्रति तिरस्कार ही होता था या संविधानों में उन्हें अपमानित करने कोशिश होती थी, उससे यहूदी विरोधी भावनाएं मजबूत हुईं।
आधुनिक यहूदी विरोध मुख्य रूप से यहूदी जाति के खिलाफ है, जिसकी जड़ें 18वीं शताब्दी की नस्लीय विचारधारा में हैं, जबकि यहूदीवाद विरोध का मतलब यहूदी मत का विरोध होता है। लेकिन पश्चिमी ईसाइयत में असल में दोनों को मिला दिया जाता है। कई अध्येताओं ने इस बात का उल्लेख किया है कि ईसाइयों के यहूदी विरोधवाद ने नाजी शासन के उदय, दूसरे विश्वयुद्ध और यहूदी नरसंहार में भूमिका निभाई है। यहूदी नरसंहार ने तो कई लोगों को ईसाई पंथशास्त्र के सिद्दांत और व्यवहार तथा यहूदी नरसंहार के बीच संबंध पर विचार करने के लिए मजबूर किया।
दरअसल ईसाइयत और यहूदियों का झगड़ा उतना ही पुराना है जितनी पुरानी ईसाइयत है। कुछ ईसाई मानते थे कि उनकी जड़ें यहूदी मत में ही हैं और ईसाइयत यहूदी मत का ही एक संप्रदाय है। लेकिन बाद में ईसा को मसीहा मानने को लेकर बहस शुरू हो गई। इसके अलावा ईसाइयों की संख्या बढ़ने के बाद यहूदी-ईसाई तनाव पैदा हो गया। सेंट पाल के बाद तो ईसाई मत अलग पंथ के रूप में उभरा। मध्ययुग में ईसाई पादरी खासतौर पर यहूदी विरोधी थे। जो जोर देकर कहते थे कि ईसा की हत्या के लिए यहूदी जिम्मेदार थे। इस कारण मध्ययुग में यहूदियों पर कई तरह की कानूनी पाबंदियां भी लगाई गईं। कई देशों में यहूदी और अन्य अल्पसंख्यक समूहों को देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। मध्ययुग में स्पेन से सबसे बड़े पैमाने पर यहूदियों को देश छोड़ना पड़ा था 1555 में पोप पाल नौवें ने कानून बनाकर यहूदी समुदाय के सारे अधिकारों को खत्म कर दिया था और उन पर पोप शासित देशों में कई पांथिक और आर्थिक पाबंदियां लगाई थीं।
प्रोटेस्टेंट समुदाय के संस्थापक मार्टिन लूथर का यहूदी विरोध चरम पर था। पहले उन्होंने यहूदियों को अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की थी। उन्हें लगता था कि यहूदी शायद कैथोलिक ईसाइयत में शामिल नहीं होना चाहते थे। लेकिन जब यहूदियों ने प्रोटेस्टेंट ईसाई बनने से इनकार कर दिया तो लूथर उनके खिलाफ हो गया। उन्हें 'जहरीला जानवर', 'घटिया कचरा', 'साक्षात् शैतान' आदि कहा। फिर उसने उनके हत्याकांड की विस्तृत रूपरेखा पेश की, इसे आधुनिक यहूदी विरोधवाद का पहला दस्तावेज कहा जा सकता है। यह यहूदियों के नरसंहार की दिशा में बहुत बड़ा कदम था। लूथर ने यहूदियों के खिलाफ एक पुस्तक लिखी-'ऑन द ज्यू एंड देअर लाईज'। यहूदी विरोधवाद उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान तो रोमन कैथोलिक चर्च का सैद्धांतिक हिस्सा था। बार-बार यह कहने के बावजूद कि यहूदी मतवाद और यहूदी विरोध, दो अलग अलग चीजें हैं, पोप पाल 12वें ने रोम में यहूदी 'घेटो' (अलग बस्ती) की दीवारें फिर से बनवाई थीं। 1890 में पोप के राज्यों में यहूदियों को केवल 'घेटोज' (उनके लिए बनी अलग बस्तियों) में ही रहने दिया जाता था। बीसवीं सदी में 26 अप्रैल, 1933 को हिटलर ने रोमन कैथोलिक बिशप विल्हैम बनिंर्ग के साथ बैठक के बाद यहूदी समस्या के बारे में घोषणा की, 'मैं जिस तरह यहूदी समस्या से निपट रहा हूं उसके लिए मेरी निंदा की जाती है। कैथोलिक चर्च पंद्रह सौ वषोंर् से यहूदियों को घातक महामारी मानता है। उन्हें अलग बस्तियों में रखता है।…..मैं उस समय में जा रहा हूं जहां पंद्रह सौ साल पुरानी परंपरा पर अमल किया जाए। मैं देश को पंथ के ऊपर नहीं रख रहा। लेकिन मैं मानता हूं कि इस जाति के प्रतिनिधि राज्य और चर्च के लिए घातक हैं। और शायद मैं उन्हें स्कूलों और सार्वजनिक कार्यक्रमों से बाहर करके ईसाइयत की महान सेवा कर रहा हूं।'
नाजियों ने अपनी विचारधारा को सही साबित करने के लिए प्रोटेस्टेंट संप्रदाय के संस्थापक मार्टिन लूथर की पुस्तक-'ऑन ज्यू एंड देअर लाइज'-का प्रयोग किया। लूथर तो इतना आगे चला गया था कि वह मतांतरित होने से इनकार करने वाले यहूदियों की हत्या की वकालत करता था। वह लिखता है, 'हम उनकी हत्या नहीं करते, यह गलती करते हैं।' आर्चबिशप रूंसी कहते हैं, 'सदियों से जारी ईसाई यहूदी विरोध के बगैर हिटलर की भावनात्मक नफरत की ऐसी तेज प्रतिध्वनि कभी नहीं सुनाई देती।…क्योंकि सदियों से ईसाई यहूदियों को सामूहिक तौर पर ईसा की हत्या के लिए जिम्मेदार मानते रहे हैं।' सदियों तक ईसाई मानस में जहर भरे बगैर नरसंहार के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। असंतुष्ट ईसाई पादरी हैंस कुंग ने लिखा, 'नाजी यहूदी विरोधवाद ईश्वरहीन और ईसाई विरोधियों का काम था। लेकिन यह लगभग दो सहस्राब्दियों की ईसाई-यहूदी विरोधी भावना के बगैर संभव नहीं था।' वर्ष 2000 में यहूदी मत की सभी शाखाओं के 220 राबियों द्वारा रचे डेब्रू इमेट दस्तावेज के अनुसार, नाजीवाद ईसाई परिघटना नहीं थी। लेकिन ईसाइयत के यहूदी मत विरोध और यहूदियों के खिलाफ ईसाई हिंसा के लंबे इतिहास के बगैर न नाजी विचारधारा जडे़ं जमा सकती थी, न ही उस पर अमल हो सकता था। नाजियों द्वारा यहूदियों के खिलाफ किए गए अत्याचारों में कई ईसाइयों ने भाग लिया या उनके प्रति सहानुभूति दिखाई थी।
अमरीकी इतिहासकार लूसी डाविडोविच के मुताबिक, ईसाइयत में यहूदी विरोधवाद का इतिहास बहुत लंबा है। यह लूथर के 'ऑन द ज्यू एंड देअर लाईज' से हिटलर के -'ईजी टू ड्रा'-तक जाता है। अपनी पुस्तक 'वार अगेंस्ट ज्यू- 1933-1995' में वे कहती हैं-लूथर और हिटलर यहूदियों की दुनिया को 'डेमोनाइज' कर रहे थे। लूथर के यहूदी विरोध और आधुनिक यहूदी विरोधवाद में समानता केवल संयोग मात्र नहीं है। हालांकि आधुनिक जर्मन यहूदी विरोधवाद की जड़ें जर्मन राष्ट्रवाद और 1848 की लिबरल क्रांति में हैं। ईसाई-यहूदी विरोधवाद वह नींव है जो रोमन कैथोलिक चर्च ने डाली और जिस पर लूथर ने भवन बनाया।
'जीसस क्राइस्ट-एन आर्टीफाइस फॉर एग्रेशन' के लेखक सीताराम गोयल यहूदियों के नरसंहार को सीधे ईसा से प्रेरित बताते हैं। वे लिखते हैं-गोस्पेल के ईसा ने यहूदियों की 'सांप', 'सांपों का बिल', 'शैतान की संतान', 'मसीहाओं के हत्यारे' कहकर निंदा की, क्योंकि उन्होंने ईसा को मसीहा मानने से इनकार कर दिया था। बाद के ईसाई पंथशास्त्र ने उनको 'ईसा के हत्यारे' के तौर पर स्थायी अपराध भाव से भर दिया। यहूदियों को सारे यूरोप में सदियों तक गैर नागरिक ब्का दर्जा दिया गया, उनको लगातार हत्याकांडों का शिकार बनाया गया। बाद में मोहम्मद ने भी यहूदियों के साथ वही किया जब उन्होंने मोहम्मद को पैगंबर मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने मदीना में यहूदियों का हत्याकांड किया। बाद में उनके अनुयायियों ने, जहां वे सत्ता में रहे, वहां पैगंबर का ही अनुकरण किया। लेकिन हिटलर के उदय से पहले कोई गोस्पेल के संदेश को इतने सुव्यवस्थित तरीके से लागू नहीं कर पाया था। न 'फाइनल सोल्यूशन' का खाका बना पाया था। संक्षेप में हिटलर के अलावा कोई गोस्पेल के जीसस द्वारा यहूदियों के बारे में दिए गए फैसले को समझ नहीं पाया था। आश्चर्य नहीं कि पश्चिमी देशों के गंभीर चिंतक गोस्पेल को पहला यहूदी विरोधी 'मेनीफैस्टो' मानते हैं।
वैसे बहुत सारे इतिहासकार गोस्पेल को ईसाइयों के यहूदी विरोध की एक महत्वपूर्ण वजह मानते हैं। एक यहूदी राबी ने कहा था, 'जब तक ईसाई ईसा मसीह को ईश्वर मानते रहेंगे वे यहूदी विरोधी सोच से ग्रस्त रहेंगे।' इस आस्था का मतलब यह है कि जो ईसा को नकारते हैं वे ईश्वर को नकारते हैं। यहूदियों को शैतान बनाने की प्रक्रिया ऐसे ही शुरू होती है। यह विश्वास ही 1500 साल लंबे यहूदी विरोधवाद का कारण है, जो नरसंहार का कारण बना। ईसाई इतिहासकार इस कोशिश में लगे हैं कि गोस्पेल के ईसा ने जो इतिहास बनाया है उससे उसे मुक्त किया जाए। वे ईसाई चर्च और मिशनों द्वारा की गई क्रूरताओं के लिए गैर ईसाई तत्वों और शक्तियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं और ईसा को विनम्रता, करुणा, शांति के प्रतीक के तौर पर पेश कर रहे हैं। वे कहते हैं कि पश्चिमी साम्राज्यवाद और ईसाइयत का एक ही समय प्रसार केवल संयोग भर है। दोनों के मकसद अलग अलग थे। लेकिन कई गंभीर इतिहासकार ईसा को इससे अलग करने की बात को नहीं मानते, उनमें ज्यादातर के लिए पश्चिमी साम्राज्यवाद द्वारा ईसाई मिशनों के साथ किए अपराध गोस्पेल के जीसस से प्रेरित हैं। जेम्स मॉरिस बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि साम्राज्य का हर आयाम ईसा का आयाम है।











