शिखर पर साइना
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प्रवीण सिन्हा
राजधानी के 'सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम' में वह बेहद भावुक पल था। स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल विश्व की नंबर एक खिलाड़ी बनने के बाद पहली बार इंडिया ओपन सुपर सीरीज जीत इतिहास रच चुकी थीं। भारतीय खेलप्रेमियों का सीना गर्व से चौड़ा हुए जा रहा था और हर कोई सानिया के शिखर पर पहुंचने की उस ऐतिहासिक घड़ी का गवाह बनने को आतुर था। लेकिन साइना को जल्दी थी। वह विश्व बैडमिंटन के शिखर तक पहुंच चुकी थीं और पहली बार इंडिया ओपन की मलिका बन चुकी थीं, इस बात का अहसास होने के बावजूद उनके पास खुशियां मनाने का वक्त नहीं था। सानिया को और ऊंचाई हासिल करने की जल्दी थी। वह अपनी खुशी का इजहार चंद शब्दों में करते हुए आगे बढ़ रही थीं। शिखर तक की उड़ान (विश्व वरीयता क्रम में नंबर एक) को कायम रखने के लिए सानिया को मलेशिया के लिए उड़ान पकड़ने की जल्दी थी, जहां उन्हें मलेशिया ओपन में भाग लेना था। साइना की खेल के प्रति इसी प्रतिबद्धता, लगाव और अनुशासन ने उन्हें विश्व महिला बैडमिंटन के शिखर तक पहुंंचा दिया।
ज्यादा समय नहीं बीता है जब कभी चोट तो कभी बैडमिंटन की 'पावरहाउस चीन' की खिलाडि़यों से लगातार हारने के कारण साइना इस खेल को अलविदा कहने को सोचने लगी थीं। लेकिन जीत की जिजीविषा ने उन्हें आगे खेलते रहने को प्रेरित किया। पिछले ही साल साइना ने गोपीचंद की अकादमी को छोड़ प्रकाश पादुकोण की बेंगलुरु स्थित अकादमी में प्रशिक्षण लेने का महत्वपूर्ण फैसला किया और नए प्रशिक्षक विमल कुमार की देखरेख में उन्होंने एक के बाद एक सफलताएं हासिल करनी शुरू कर दीं। विमल कुमार ने साइना को ऐसा गुरु मंत्र दिया कि भारत पहली बार उबेर कप का कांस्य पदक जीतने में सफल रहा। इसके बाद साइना ने आस्ट्रेलिया ओपन जीतकर साबित किया कि उनमें अब भी काफी दम बाकी है। उनका यह सिलसिला इंचियोन एशियाई खेलों में भी जारी रहा, जबकि नवंबर 2014 में चाइना ओपन जीत सानिया ने एक तरह से उद्घोषणा कर दी कि उन्हें रोक पाना अब चीनी खिलाडि़यों के लिए भी बहुत आसान नहीं है। साइना की कभी हार न मानने की जिद और जबरदस्त प्रतिभा को देखते हुए उनके कोच विमल कुमार भी मानते हैं कि वह अपने किस्म की अकेली खिलाड़ी है। साइना के आक्रामक खेल, इस खेल के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और एकाग्रता के कायल विमल कुमार ने कहा, हर समय अपने खेल को बेहतर करने की ललक और ज्यादा से ज्यादा सफलताएं हासिल करने की भूख ही साइना को और खिलाडि़यों से अलग करती है। वह लय में हों तो दुनिया की किसी भी खिलाड़ी को हराने की क्षमता रखती हैं।
हालांकि साइना का विश्व की नंबर एक खिलाड़ी बनने का सपना पूरा हो चुका था, लेकिन उनके हाव-भाव से कहीं भी किसी क्रिकेटर की तरह 'स्टारडम' नहीं झलक रहा था। वह खुश तो बहुत थीं, लेकिन घमंड उन्हें लेशमात्र भी नहीं छू पा रहा था। इंडिया ओपन खिताब जीतने के बाद साइना ने कहा, मैं संभवत: अपने कॅरियर के सबसे अच्छे दौर से गुजर रही हूं। मैंने समय-समय पर अपने लक्ष्य निर्धारित किए और एक-एक कर उन्हें हासिल करने की कोशिश की। इस बार का इंडिया ओपन मेरे लिए खास रहा। पहले विश्व की नंबर एक खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल हुआ और उसके बाद मैं पहली बार इस टूनार्मेंट के फाइनल में पहुंचते हुए खिताब जीतने में सफल रही। निश्चित तौर पर यह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन नंबर एक पर बने रहने के लिए मुझे खिताब जीतने का सिलसिला कायम रखना होगा। विश्व स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए मुझे खुद को फिट रखते हुए निरंतर अच्छा प्रदर्शन करना होगा। हालांकि यह आसान कतई नहीं होगा, लेकिन 'फिटनेस' और अभ्यास में मैं जिस तरह का सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रही हूं उसके परिणाम जल्द ही देखने को मिलेंगे।
साइना की पहचान मूलत: एक आक्रामक खिलाड़ी के तौर पर है। उनका 'कोर्ट कवरेज' भी अच्छा है, लेकिन 'नेट गेम' के मामले में वह अपनी प्रतिद्बंद्बियों से पिछड़ती रही हैं। लेकिन विमल कुमार ने उनके नेट गेम में सुधार करने के अलावा बैकहैंड गेम को भी तराशा, जबकि साइना के विभिन्नता लिए 'क्रॉस कोर्ट शॉट' अब प्रतिद्बंद्बियों के लिए मुसीबत बन गए हैं। जाहिर है, साइना की नई खेल शैली की काट उनकी प्रतिद्वंद्वियों ने ढूंढनी शुरू कर दी होगी। लेकिन साइना इस बात से चिंतित नहीं हैं कि विपक्षी खिलाड़ी क्या कर रही हैं या सोच रही हैं ? उनका ध्यान सिर्फ अपने खेल में निरंतर सुधार करने और शत-प्रतिशत प्रदर्शन करने पर है। इस बारे में बैडमिंटन कोच विमल कुमार ने कहा 'अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि साइना ने पिछले कुछ समय से चीन की शीर्षस्थ खिलाडि़यों को सबसे ज्यादा हराया है। साइना ने चीनी खिलाडि़यों को उनके घर में जाकर मात दी।' इसलिए उनकी तैयारी काफी अच्छी चल रही है। चीनी खिलाड़ी भी आक्रामक खेलती हैं इसलिए उनकी काट साइना ने आक्रामकता में ही ढूंढ ली है। और, फिर विश्व की नंबर एक खिलाड़ी बनने के पीछे कोई भी खिलाड़ी किसी एक विशेषता पर नहीं टिका रहता है। उसे एक संपूर्ण खिलाड़ी बनना ही होता है। साइना आज कमोबेश उसी स्थिति में है। पहले साइना का खेल और उनकी रणनीति विपक्षी खिलाड़ी पहले से ही जानती-बूझती थीं। लेकिन अब साइना के खेल का अंदाजा लगा पाना कतई आसान नहीं है। साइना की सबसे बड़ी ताकत उनकी मानसिक दृढ़ता है। साइना की लंबी-लंबी रैलियां और थर्ड कोर्ट से क्रॉस ड्रॉप शॉट कारगर साबित हो रही हैं। मुझे उम्मीद है कि उनकी सफलता का यह सिलसिला अगले कुछ साल तक जारी रहेगा।
साइना की उपलब्धियां
राजीव गांधी खेल रत्न साइना नेहवाल के साथ एक सुखद संयोग जुड़ा हुआ है कि उन्हें पहली बार भारतीय टीम में उनके कोच विमल कुमार ने ही वर्ष 2००6 राष्ट्रमंडल खेलों में लिया था और आज वह उन्हीं के साथ जुड़ते हुए विश्व महिला बैडमिंटन के शिखर पर हैं। अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित साइना की नजर अब अगले वर्ष में होने वाले रियो ओलंपिक खेलों पर हैं जिसके लिए रैंकिंग अंकों की गणना उनके विश्व नंबर एक खिलाड़ी बनने के साथ ही शुरू हो चुकी है।
2015 इंडिया ओपन सुपर सीरीज, इंडिया ओपन ग्रांप्री (सैयद मोदी आमंत्रण टूनार्मेंट)
2014 इंडिया ओपन ग्रांप्री, आस्ट्रेलियन ओपन, चाइना ओपन सुपर सीरीज, उबेर कप (टीम) में कांस्य पदक, इंचियोन एशियाई खेल (महिला टीम) में कांस्य पदक
2012 लंदन ओलंपिक (महिला एकल) में कांस्य पदक, इंडोनेशिया सुपर सीरीज, डेनमार्क ओपन सुपर सीरीज, स्विस ओपन ग्रांप्री, थाईलैंड ओपन ग्रांप्री
2011 स्विस ओपन ग्रांप्री
2010 इंडोनेशिया सुपर सीरीज, सिंगापुर ओपन सुपर सीरीज, हांगकांग सुपर सीरीज, इंडिया ओपन ग्रांप्री, दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल महिला एकल में स्वर्ण, टीम स्पर्धा में रजत, एशियाई चैंपियनशिप महिला एकल में कांस्य
2009 इंडोनेशिया सुपर सीरीज, इंडियन ओपन ग्रांप्री
2006 मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेल टीम स्पर्द्धा में कांस्य
साइना नेहवाल वैसे तो पिछले सप्ताह ही इंडिया ओपन के दौरान ही विश्व की नंबर एक खिलाड़ी बन गई थीं, लेकिन बैडमिंटन विश्व वरीयता क्रम में पहली बार गुरुवार (2 अप्रैल, 2015) को आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि हुई। बैडमिंटन इतिहास में साइना और भारत का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज होने के बाद साइना के पिता हरवीर सिंह की पहली प्रतिक्रिया थी – मैं और मेरा पूरा परिवार बेहद खुश है। हम सभी गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। साइना ने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की है। मेरी बेटी ने देश का नाम रोशन किया है। इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है। प्रस्तुत हैं साइना के गौरवशाली पिता हरवीर सिंह से बातचीत का कुछ अंश-
क्या आप जब साइना को पहली बार बैडमिंटन कोर्ट पर लेकर गए थे तो इस बात का आभास था कि इतिहास रचने की दिशा में आप पहला कदम बढ़ा रहे हैं?
नहीं। कतई नहीं। शुरू में जब मैं कोई 3० किलोमीटर दूर बैडमिंटन अकादमी में स्कूटर पर साइना को लेकर गया था तो शौकिया तौर पर बेटी को एक खेल से जोड़ना चाहता था। लेकिन साइना की प्रतिभा, खेल के प्रति समर्पण और उसकी कड़ी मेहनत जल्द ही रंग लाने लगी। उसे बैडमिंटन से काफी लगाव होने लगा तब मुझे लगा कि वह पढ़ाई-लिखाई छोड़ इस खेल को अपना कॅरियर बना सकती है। पिछले कुछ वर्षों से उसने जब चीनी खिलाडि़यों को हराना शुरू किया तो एक विश्वास जगने लगा था कि एक दिन वह शिखर पर पहुंच सकती है।
साइना में ऐसी क्या खासियत है जो उन्हें अन्य खिलाडि़यों से अलग करती है?
एक मेधावी छात्रा होने के बावजूद मैंने उसे बैडमिंटन में इसलिए डाला क्योंकि उसमें खेल के प्रति एक विशेष लगाव था। जिस तरह से वह पढ़ाई में अव्वल रहती थी, खेल के प्रति भी उसका यही नजरिया था। वह हर दिन कुछ नया सीखना चाहती थी। उसे कहीं न कहीं इस बात का आभास था कि मां-बाप की इज्जत दांव पर लगी है इसलिए उसने बैडमिंटन को ही अपना जीवन या यूं कहें कि कॅरियर बना लिया। आज भी विश्व की नंबर एक खिलाड़ी बनने के बावजूद वह आगे के लिए ही सोचती है। उसका 'फोकस सिर्फ' और सिर्फ बैडमिंटन है।
अपनी बेटी से कोई ऐसा सपना देखा है जो अब तक पूरा नहीं हो सका है?
मैं बेहिचक मानता हंू कि साइना की वजह से आज मैं एक गौरवशाली पिता हूं। उसने खेल में कई ऐसी सफलताएं अर्जित कीं जिसका कोई सपना देखता है। साइना की प्रतिभा, लगन, मेहनत, खेल के प्रति प्रतिबद्धता और हमेशा आगे बढ़ने की चाहत ने उसे शिखर पर पहुंचा दिया है। मुझे अपनी बेटी की सफलता पर जब देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और तमाम विशिष्ट हस्तियों की ओर से सम्मान या प्यार मिलता है तो आभास होता है कि साइना ने कितना कुछ हासिल कर लिया है। इससे ज्यादा अपनी औलाद से उम्मीद नहीं की जा सकती है। हां, खेल के क्षेत्र में मैं चाहता हूं कि विश्व कप और ओलंपिक खेलों में भी साइना नंबर एक स्थान हासिल कर ले तो उसके कॅरियर में चार चांद लग जाएंगे।











