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शार्ली एब्दो फ्रांसीसी पत्रिका है। वामपंथी रुझान रखने वाला ऐसा प्रकाशन जो मजहबी उन्माद और आतंकवाद के विरुद्ध लगातार लिखता रहा। पिछले दिनों 'जिहादी-शैतानों' ने इसके पेरिस स्थित कार्यालय पर हमला बोला और 12 पत्रकारों की जान ले ली।
घटना यूरोप की है, मगर इसके आयाम वैश्विक
हैं। जहां फ्रांस में इस हमले के बाद पत्रिका की रिकार्ड बिक्री हुई, वहीं भारत के सेकुलर बुद्धिजीवी बुक्कल मारकर बैठ गए।
कोई चर्चा, कोई सेमिनार, मोमबत्ती ब्रिगेड का कोई प्रदर्शन, कुछ नहीं!! बौद्धिकता की वाम, या कहें सेकुलर धारा भारत में उलटी बहती है।
इसलिए भारत में नंदिता हक्सर के लेखन पर सवाल नहीं उठते। सवाल उठते हैं शीरीन दलवी के अखबार पर।
सेकुलर बिरादरी की आंदोलनकारी नंदिता हक्सर वह महिला हैं जिन्होंने अपने लेख में 'जिहादी-शैतानों' द्वारा शार्ली एब्दो के पत्रकारों की हत्या को अपने तौर (संदर्भ : पंजाब केसरी12/02/15 पृष्ठ-) सही ठहराया है।
शीरीन दलवी मुम्बई अवधनामा की संपादक (अब पूर्व) हैं और वह महिला हैं जिन्होंने शार्ली एब्दो के मुखपृष्ठ को अपने अखबार में जगह दी।
नंदिता का विचार सेकुलर बिरादरी को अस्वीकार्य हो, ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। दूसरी ओर, कठमुल्लों को खलने वाला शीरीन का पत्रकारीय प्रयास सेकुलर बिरादरी को ठीक लगा हो, ऐसी भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। शार्ली एब्दो और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विपरीत ध्रुव छूते इन दोनों भारतीय संदर्भों पर वामपंथ का पाला खाली है। मुद्दों से कन्नी काटने वाले सेकुलर विचारक आखिर गए कहां? वे तीसरी तरफ निकल गए।
एक तीसरी महिला और हैं। नाम है तीस्ता सीतलवाड़।
तीस्ता और उनके पति पर गुजरात दंगा पीडि़तों के नाम पर जुटाए करोड़ों के चंदे में गबन का गंभीर आरोप है। सेकुलर टोलियां गबन के दागियों को बचाने निकली हैं।
भारत में इंसाफ, अक्ल और बराबरी का ढोल पीटने वाली सेकुलर बिरादरी का यही सच है। यहां, सेकुलर यानी वाम। वाम यानी नाम। नाम यानी प्रोजेक्ट। प्रोजेक्ट यानी दाम।
तीस्ता को कहां से चंदा मिला, कितना पैसा जुटाया, कितना डकारा, इन सब सवालों से सेकुलर गिरोहों को कोई मतलब नहीं। यह विशिष्ट भारतीय वाम है जहां निजी पूंजी और अपनों की तिजोरी पर सवाल नहीं उठते।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के हक की बात करने वाली टोलियां शीरीन दलवी की पत्रकारिता और अभिव्यक्ति के पक्ष में नहीं हैं। एक मुस्लिम बेवा की नौकरी जाने पर उनकी अल्पसंख्य रग दुखती नहीं हैं। वे शीरीन के निर्वासन पर मौन हैं। शीरीन के गुनहगार अपने-अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल और फोरम पर 'मैं तीस्ता हूं' की डीपी और पोस्टर अपलोड करने में व्यस्त हैं।
भारतीय सेकुलर बिरादरी की योग्यता पर शक मत कीजिए। यह नीयत है, जो खोटी है। अबूझमाड़ में महुआ बीनते वनवासी से चीनी वेस्टलेक चाय तक, हर मुद्दे पर बात करने वाले 'योग्य' लोग यहां मौजूद हैं। नोबल पुरस्कार प्राप्त वामपंथी लेखक ओरहान पामुक के उपन्यास 'स्नो' की तारीफ में कसीदे काढ़ने वाले सेकुलर उस जिहादी उन्माद के बारे में बात नहीं करना चाहते जो ओरहान की सबसे बड़ी चिंताओं में है।
वे गंगा-जमुनी तहजीब और साझा संस्कृति की बात तो चाव से करते हैं, लेकिन जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के मुफ्ती मोहम्मद इलियास का खुद को हिन्दू और साझा संस्कृति का वारिस बताना उनका जायका खराब कर जाता है। वे मो. इलियास जैसे उदार मुस्लिमों का उभार नहीं देखना चाहते। राजनेताओं के सिर काटकर लाने पर ईनाम की घोषणा करने वाले बर्बर कठमुल्लों को नाथना नहीं चाहते। वे इस्लामी आतंक के वैश्विक कोढ़ को बढ़ाना चाहते हैं। वे शीरीन और अवधनामा की यंत्रणा पर चुप ही नहीं हैं बल्कि शार्ली एब्दो के हत्यारों के समर्थन में भी हैं।
शीरीन के विरोधी गिरोह तीस्ता के साथ हैं।
कई बार घटनाओं की कौंध दर्पण साबित होती है। सब दिखने लगता है। शार्ली और शीरीन से जुड़ी घटनाएं ऐसी ही हैं। समय के दर्पण में भारतीय सेकुलर गिरोहबंदी का विद्रूप चेहरा दिख रहा है। यह वक्त विचारों की उदारता को बंधक बनाने वालों से छुटकारा पाने का भी है। नाम और दाम पर लुढ़कते सेकुलर वाम की राय से बहकने की बजाय एक लोकतांत्रिक देश की स्वतंत्र पहचान कायम करने का वक्त है। ऐसी पहचान जो इस देश की संस्कृति के अनुरूप हो, अन्याय के विरुद्ध हो। कठमुल्लों का दबाव और शीरीन का निर्वासन, ऐसी बातें अरब देशों में हो सकती हैं। भारत में न इस जंगली सोच के लिए जगह है, न उसे पोसने वाले सेकुलरों की जरूरत।











