| दिंनाक: 27 Jan 2015 12:09:15 |
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मध्य प्रदेश के टिमरनी (हरदा) में 20 जनवरी को भाऊ साहब भुस्कुटे की स्मृति में आयोजित व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा कि पारदर्शिता, प्रामाणिकता व अध्ययनशीलता भाऊ साहब की विशेषता थी। ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी के साथ सत्यनिष्ठा को जीवन आधार बनाकर लोक सेवा को समर्पित उनका जीवन एक प्रकाशपुंज था। उन्होंने कहा कि सामान्यत: धर्म का अर्थ कर्तव्य पालन को माना जाता है। माता-पिता की सेवा करना हमारा कर्तव्य है, प्रजा का पालन करना राजा का कर्तव्य है, पढ़ाई करना छात्र का धर्म है। अत: परम्परा से स्वभाव व कर्तव्य को धर्म माना जाता है, वह भी गलत नहीं हो सकता। शास्त्र जो कहते हैं, वह भी सत्य ही है। इहलोक और परलोक में सबको उन्नति और सुख मिले, उस हेतु कर्तव्य पालन धर्म है। पूजा-पद्धति से धर्म को कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। हिन्दू धर्म की बात करें तो यहां कोई एक देवता, एक ऋषि या संत नहीं है।
स्वामी विवेकानंद ने तो यहां तक कहा, 'जो भगवान पर विश्वास नहीं करता, मेरी दृष्टि में वह भी नास्तिक नहीं है।' श्री भागवत ने कहा कि जिसका खुद पर भरोसा नहीं वह नास्तिक है। तुुलसीदास जी ने लिखा 'परहित सरिस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।' यहां पूजा-पद्धति का तो कोई उल्लेख भी नहीं है। भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त दूसरी किसी भाषा में धर्म की परिकल्पना का कोई दूसरा शब्द नहीं है। यहां तो पशु-पक्षी का भी धर्म है। अंग्रेजी के 'रिलीजन' शब्द से इसके भाव की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। धर्म वह जिससे सुख प्राप्त हो और वह सुख सारी दुनिया को चाहिए। स्वभाव के विरुद्ध सुख नहीं होता। सारी दुनिया मन के अनुकूल की भावना को सुख तथा प्रतिकूल वेदना को दु:ख मानती है। सुख खोजने पर मिल भी जाता है, किन्तु मिला- मिला कहते-कहते वह खो भी जाता है।
उन्होंने भारतीय जीवन पद्धति के सन्दर्भ में कहा कि अर्थ, काम, मोक्ष तीनों की साधना करने वाले तुम अमरत्व के पुत्र हो। इस शाश्वत सत्य को जान लेने वाले ही शाश्वत सुख पाते हैं। अमर शाश्वत आत्मा ही विश्वात्मा परमात्मा है। उस एक से सब निकले हैं। अत: उस एक को जानो। उस एक को नहीं जानोगे तो सबको सुख कैसे मिलेगा? फिर तो बलशाली सुखी और निर्बल सदा दु:खी रहेगा। उन्होंने कहा कि जहां लड़ाई-झगड़े होते रहंेगे, वहां कोई सुखी नहीं रह सकता। युद्ध में क्या सैनिक ही मरते हैं? ऐसा नहीं है, प्रजा भी शिकार बनती है। हारने वाला तो हारता ही है, जीतने वाले की भी हालत खराब हो जाती है। ब्रिटेन के विषय में कहा जाता था कि उसके साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता। किन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इंग्लैण्ड इतना कमजोर हो गया कि उसके सारे उपनिवेश एक-एक कर स्वतंत्र हो गए। इतना ही नहीं आज वह स्वयं अमरीका की दया पर आश्रित है।
वर्तमान पश्चिमी विकास प्रतिमानों के विषय पर उन्होंने कहा कि दुनिया में विकास बहुत हुआ, पर उसने पर्यावरण को बिगाड़ दिया। हम ही रहें, शेष कोई न रहे, हम सबसे बड़े हो जाएं, हमारी दया पर सब आश्रित हों, अगर यही सोच रही तो सारी सृष्टि और जीवन समाप्त हो जाएगा। ऋषियों ने कहा सबमें एक ही तत्व है। विविधता से सजी यह पृथ्वी एक का ही रूप है। उसे जानो। दुनिया में अन्यत्र मान्यता है 'अधिक से अधिक लोगांे का अधिक से अधिक भला।' हमारे यहां कहा गया है, 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' और हम संघर्ष नहीं, समन्वय की बात करते हैं।
सरसंघचालक ने कहा कि अपनी जरूरतें कम करने से ही दूसरों की जरूरतें पूरी होंगी। यही शाश्वत धर्म है। विविधता में एकता देखना, सबको साथ चलाना, सबके साथ चलना, त्याग और संयम को सीखना, इसे ही युग धर्म कहते हैं। यही युग धर्म भारत में पहचाना गया। धर्म पहले से था, इसलिए यह शाश्वत है। इसे हमारा यहां पहचाना गया। मानव के आचरण को परिभाषित करने वाले मानव धर्म को ही हम हिन्दू धर्म कहते हैं। यह नियम केवल भारत में ही नहीं, वरन् पूरे विश्व पर लागू होता है, अत: यह विश्व धर्म है।
कार्यक्रम में श्री भागवत ने भाऊ साहब द्वारा लिखित पुस्तक 'हिन्दू धर्म-मानव धमंर्' पुस्तक के तीसरे संस्करण का लोकार्पण भी किया। पुस्तक का परिचय देते हुए प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक श्री सदानंद सप्रे ने बताया कि इस पुस्तक में भाऊ साहब के विचार एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रंगाहरि जी के लेखों को समाहित किया गया है।
इस अवसर पर मध्य क्षेत्र के संघचालक श्री अशोक सोहणी, क्षेत्र प्रचारक श्री रामदत्त चक्रधर, क्षेत्र कार्यवाह श्री माधव सहित अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित थे। ल्ल प्रतिनिधि