| दिंनाक: 22 Jan 2015 11:19:31 |
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भूगोल किसी भी देश की आर्थिक समृद्धि और विदेशनीति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि भारतीय सागर क्षेत्र में होने वाले भू रणनीतिक परिवर्तन पिछले दो दशकों से आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण हो गए है। ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय सागर क्षेत्र (आईओआर) हमेशा से ही वैश्विक गतिविधियों का केन्द्र रहा है और 21वीं शताब्दी में सही रूप में यह 'सामुद्रिक राजमार्ग' बन गया है। अब वैश्विक शक्ति के खेल में एशिया प्रशान्त क्षेत्र में यह नाटकीय रूप से बदल गया है। आईओआर के इस महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र में भारत एक भूरणनीतिक आर्थिक ऊर्जा नेटवर्क के साथ महत्वपूर्ण भूमिका में आ गया है जो इस क्षेत्र में सामरिक रणनीति के पर्यावरण को आकार देता हुआ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस सबके साथ अंदमान और निकोबार द्वीप समूह की सुरक्षा और विकास एक अनिवार्य और पहला कदम होना चाहिए। जो कि हमारी इस नीति को 'देखो और करो' की रणनीति के रूप में करें।
21वीं शताब्दी की भूराजनीतिक परिस्थितियों में विशेष रूप से आईओआर में आये बदलाव को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। चीन, भारत, जापान, कोरिया, अमरीका और कई अन्य देशों को जो रणनीतिक प्रतियोगिता के साथ ऊर्जा पर जोर देने में लगे हुए हैं। इन देशों के बीच में आर्थिक वृद्धि की भी प्रतियोगिता है। चीनी अर्थव्यवस्था के अपेक्षा से अधिक वैश्वीकरण और संसाधनों को पानी की उसकी भूख ने उसे समुद्र में सक्रिय रहने के लिए विवश कर दिया। 2020 में यह अनुमान है कि आईओआर के एसएलओसी 8 बिलियन से भी ज्यादा बिलियन तेल के परिवहन टैंकर मलक्का के आस-पास गुजरते देखेंगे। वैकल्पिक बन्दरगाहों के विकास के बहाने पाईपलाइन तथा चीनी राष्ट्रपति द्वारा झण्डारोहण मलक्का स्ट्रेट पर यह दिखाता है कि चीन मलक्का स्ट्रेट को विकल्प बनाने की आकांक्षा पाले हुए है। इसलिए आईओआर क्षेत्र में चीन के सुरक्षाबलों का जमावड़ा बढ़ रहा है। अंदमान-निकोबार क्षेत्र में ऐसे संकेत मिले हैं कि खाड़ी देशों द्वारा निगरानी और इस क्षेत्र में उनके नाविकों की बढ़ती आवाजाही भारतीय मुख्य भूमि के लिए एक चिन्ता का विषय बन चुका है। सिट्टवी बन्दरगाह पर जो अभियान चला वह भी पूर्वी क्षेत्र से आने वाले समुद्री जहाजों के आवागमन को बढ़ा रहा है। इसी प्रकार क्यावूक फ्यूल और दावेल बन्दरगाह में अन्तरराष्ट्रीय और चीनी यातायात बढ़ रहा है। यह पश्चिम में बंगाल की खाड़ी और अंदमान समुद्र से पूर्व की ओर सुरक्षा वातावरण को प्रभावित कर रहा है।
कोकोद्वीप में भी, जो कि उत्तरी अंदमान से 20 एनएम उत्तर में है, अब रूचि बढ़ती हुई दिखाई दे रही है, जहां रनवे की लम्बाई कई वषोंर् में बहुत कम हुई है। इस क्षेत्र में चीन तेजी से सबसे बड़ा खिलाड़ी उभरकर सामने आ रहा है। चीन की नौसेना के आधुनिकीकरण की योजना इसमें परिलक्षित हो रही है, जिसकी प्राथमिकता भारतीय महासागर में नियंत्रण करने की है। एशिया की भू राजनीति अब एक समस्या बन रही है क्योंकि इसमें अन्य क्षेत्रीय और अतिरिक्त क्षेत्रीय शक्तियां-दक्षिण कोरिया, वियतनाम, इण्डोनेशिया, जापान और अमरीका इसमें शामिल हैं। इसमें चीन का आर्थिक और नौ सेना का विकास तथा दक्षिण और पूर्वी चीन समुद्र में तथा एसएलओसी के लिए यह एक चुनौती है। दूसरी ओर चीन का यह मत है कि अमरीका इसको घेरते हुए पुन: सन्तुलन का प्रयास कर रहा है। इसलिए अन्तिम विश्लेषण में यह कहा जा सकता है कि आईओआर में भू राजनीति का भविष्य चीन भारत और अमरीका के परस्पर संबंधों को तय करेगा। आईओआर में चीन की बढ़ते गतिविधियों को भारत को ध्यान से देखना होगा और उसका मोतियों का हार सैनिकों का रूप धारण कर रहा है। अंदमान और निकोबार द्वीपों की श्रृंखला हमें दक्षिण पूर्वी एशिया में गतिविधियों के अवसर और बढ़ा देगी।
भारत की मुख्य भूमि से 1200 किमी. पूर्व में स्थित अंदमान निकोबार द्वीप समूह में एक प्रतिशत से भी कम भू क्षेत्र है लेकिन 30 प्रतिशत से भी ज्यादा ईईजैड के लिए इसके सामुद्रिक संसाधन 30 प्रतिशत से भी ज्यादा वजन रखते हैं। ये द्वीप आस-पास के कई देशों से एकदम सटे नजर आते हैं- (इण्डोनेशिया से 160 किमी., थाईलैण्ड से 450 किमी. और मलेशिया एवं म्यांमार से 600 किमी.) दूर हैं। वे बैठे-बैठे समुद्री मार्ग में सबसे ज्यादा मलक्का स्ट्रेट पर कई जहाजों को आते-जाते देखते हैं। ये भारत की रणनीतिक व्यूह रचना की याद दिलाते हुए खाड़ी और मलक्का स्ट्रेट के बीच दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों चीन, जापान और कोरिया इत्यादि द्वारा सामुद्रिक यातायात के माध्यम से लगभग 1700 मिलियन टन तेल प्रत्येक दिन (300 समुद्री जहाज प्रतिदिन) देखते हैं।
ढांचागत विकास के पहलू
अंदमान-निकोबार द्वीप समूह में कुल 572 द्वीप समूहों की श्रृंखला है। जिनमें केवल 37 पर आबादी रहती है। 720 किमी. लम्बाई वाली एक विशाल तट रेखा में 1920 किमी. में है एक ईईजैड़ जिनमें इसलिए वे हमारी आर्थिक और रणनीतिक जरूरत के लिए आवश्यक बन गई है। दो बड़े उपविभागों में-उत्तरी द्वीप समूह (एनजीआई) और दक्षिणी द्वीप समूह (एसजीआई) हैं। ये दोनों लगभग 190 एनएम और 165 एनएम क्षेत्र में फैले हैं। ये दोनों आपस में 10 डिग्री. चैनल से अलग होते हैं। जो कि स्वयं 80 एनएम चौड़ाई वाला है। राजधानी पोर्ट ब्लेयर दिगलीपुर कस्बे को उत्तर में एकतरफा सीएल 9 रोड से जोड़ती है जिसे अंदमान ट्रंक रोड कहते हैं। उत्तरी द्वीप समूह की सारी गतिविधियां पूर्वी तट में ही होती है। दक्षिणी द्वीप समूह अपनी भौगोलिक जटिलता के कारण अविकसित बना हुआ है। जिसके माध्यम से हमें हमेशा चुनौतियों का भय बना रहता है। छोटा अंदमान एक छोटा सा द्वीप समूह है।
दक्षिण द्वीप समूह तीन प्रमुख भागों में है- कार्निक, नानकोवेरी और ग्रेट निकोबार द्वीप। कार-निकोबार में ही एयरफोर्स स्टेशन और कार्निकोबार नाम से प्रसिद्ध हवाई अड्डा है। इस पर मुख्य भूमि से एक हवाई सेतु बना है। जो कि वायुसेना दूसरी सबसे बड़ी वायु संपदा है। हालांकि आजकल इसको केवल सेना की जरूरतों के चलते बाकी लोगों के लिए निषिद्ध कर दिया है। इसी वायु क्षेत्र में हाल ही में सप्ताह में एक बार नागरिक वायु उड़ान का संचालन किया गया था। कार्निक में स्थित मसजेटी में नागरिक/ नौसैनिक जहाजों के लिए बहुत ही सीमित क्षमता है। नैनकोवरी द्वीप समूह में लगभग 10 द्वीप है। जिनमें कुछ नौ सैनिकों और तटरक्षकों के निवास है। दक्षिणी द्वीप समूहों में जीएनआई सबसे बड़ा द्वीप है। इसमें अनुमानत: 1000 मी. लम्बा मार्ग है जिसको चरणबद्ध तरीके से बड़ा करने की योजना है यह देश के दक्षिणी हिस्से का वायु क्षेत्र है।
कैंपबेल बे जेटी की भी सीमित क्षमता है। यहां से 6 डिग्री सागर में पर इन्द्रा प्वाइंट दिखाई देता है। इसे सभी प्रकार के सामुद्रिक हब के रूप में देखना चाहिए, इसलिए इसकी महत्ता बहुत अधिक है और वह ग्रेट निकोबार द्वीप को और समृद्ध करता है। इसका अपना महत्व है और एक बड़े विस्तृत क्षेत्र में होने के कारण इस द्वीप से काफी खतरे हैं। यहां किसी भी प्रकार के माल की आवाजाही समुद्री जहाज अथवा हवाई जहाज से ही सम्भव है।
स्वावलम्बन का पहलू
अंदमान निकोबार द्वीप समूह से पूरी तरह मुख्य भूमि पर निर्भर है। पूर्वी तट पर सारे अनुबंध एवं गतिविधियां केन्द्रित रहती हैं जबकि भौगोलिक जटिलता के कारण पश्चिमी तट आज भी अल्पविकसित है और इससे दोनों ही प्रकार के खतरों की आशंका बनी रहती है। सुविधा विहीन समुद्री समृद्धि और जंगल एवं इसके साथ इन द्वीप समुहों के बीच दूरी यह सुनिश्चित करती है कि अब हमें थल सेना नौ सेना, नौ वायु सेना के साथ तटरक्षकों, सशस्त्र सैन्यबलों के बीच नजदीकी समन्वय स्थापित करने की ठोस योजना बनानी होगी। पोर्ट ब्लेयर ही पूरे द्वीप समूह में ऐसा बन्दरगाह है जहां पर्याप्त रूप से सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन ये भी नागरिक और सैन्य जहाजों दोनों के लिए अपर्याप्त हैं। अन्य बन्दरगाहों के विकास को मंजूरी मिलने और उनके कार्यान्वित होने में कई वर्ष लगेंगे। पोर्ट ब्लेयर के बाहर केवल कार्निक ही एकमात्र रनवे हैं जहां हवाई जहाज की आवाजाही होती है। दो अन्य छोटे रनवे कैंपबेल बे और शिवपुर हैं जिनकी लम्बाई मात्र 1000 मीटर है। 2004 में आईं सुनामी के विध्वंस के कारण कारण जीएनआई का उत्तर-दक्षिण मार्ग आज भी कटा हुआ है। इस मार्ग के पुनर्निर्माण के कार्य के पूरे होने पर ही जीएनआई से इंदिरा प्वाइंट तक के क्षेत्र में विकास संभव हो पाएगा। इसलिए यह आवश्यक है कि अंदमान-निकोबार द्वीप समूह में ढांचागत बुनियादी सुविधाओं को लम्बी अवधि और त्वरित कार्यान्वयन की दूर दृष्टिपूर्ण योजना के साथ पूरा करना होगा।
अंदमान- निकोबार कमाण्ड (एएनसी)
कारगिल युद्ध के पश्चात भारत सरकार ने अंदमान-निकोबार द्वीप समूह में सैन्य दृष्टि से भूरणनीतिक महत्व के अध्ययन साथ ठोस मूल्यांकन किया है। इसके बाद भारत सरकार ने अंदमान-निकोबार द्वीप समूह के इस क्षेत्र में सामरिक गतिविधियों के महत्व पर विशेष ध्यान देते हुए ठोस रणनीतिक कार्यवाई करने की सोची। आज भी हमें सैन्य सुविधाओं को हासिल करने के लिए बहुत आगे जाना है। ऐसी सुविधाएं जुटाने से इस द्वीप में न केवल रक्षा और सामरिक लाभ प्राप्त होगा बल्कि इसके साथ ही यह भी संदेश देगा कि भारत इस क्षेत्र में शांति और समरसता का पक्षधर है। एएनसी रक्षा कूटनीति को बढ़ाने के लिए अपना सहयोग कर रही है। वह अपने 3 पड़ोसियों और मिलान श्रृंखला में लगातार आवाजाही रखे हुए है। एक समूचे परिप्रेक्ष्य में यह द्वीप हमें दक्षिण पूर्व एशिया में और अधिक गतिविधियों के अवसर उपलब्ध कराता है।
आगे का रास्ता
आज के वैश्विक जगत में जब आर्थिक समृद्धि और सुरक्षा एक-दूसरे से नजदीक से जुड़े हुए हैं ऐसे में कहा जा सकता है कि विकास के साथ-साथ अंदमान और निकोबार द्वीप समूह के विकास के साथ आगे बढ़ने चाहिए। पूर्व विदेश सचिव श्री श्याम शरण के शब्दों में हमें इन द्वीपों की सुरक्षा के बारे में खुले दिमाग से सोचना चाहिए। इनमें न्यूनतम व्यापार की अनुमति के साथ-साथ नौ सेना और अन्य सैनिक सम्पत्तियों की सुरक्षा को भी बारीक नजर से देखना होगा।
इसलिए देश को सुरक्षा के ढांचागत विकास के साथ-साथ इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण व्यापार, जहाजरानी और पर्यटन स्थल के विकास को भी ध्यान देना होगा। और राष्ट्रीय स्तर पर इसे विकास की मुख्यधारा से जोड़ना होगा। आर्थिक एकीकरण तंत्र को प्राप्त करने के लिए इस द्वीप में सकारात्मक प्रभावों के अन्तर्गत आपस में इनको जोड़ना बहुत आवश्यक है। इसके साथ ही इनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास, स्वास्थ्य चिंता, शिक्षा, बाजार और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की ठोस कार्ययोजना होनी चाहिए।
भारत को अपने ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में आन्तरिक सम्पर्क जोड़ने की आवश्यकता है। मुख्य भूमि और द्वीप के बीच में और साथ ही पड़ोसी देशों के साथ विश्वस्तरीय जहाजरानी और हवाई सम्पर्क से जोड़ना होगा। यह प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वीपों की श्रृंखला में बंदरगाहों और हवाई अड्डों के विकास की मांग करेगा।
अंदमान-निकोबार द्वीप समुह में समुद्र मार्ग से सामरिक दृष्टि से भारत के लिए कई प्रकार की चुनौतियां है। यहां छोटे-छोटे प्रशासनिक प्रखण्ड होंगे। जिनसे आपस में नागरिक प्रशासन में संवाद स्थापित हो और लोगों को भावनात्मक एवं सभी प्रकार से इस क्षेत्र में लगाव बढ़े। हमें रडार स्थापित करने होंगे जैसा कि हांगकांग में कुछ स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा अभियान छेड़ा गया।
भविष्य की रणनीति
हमें एशियाई क्षेत्र साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में भी विविध स्तरों पर व्यापक निवेश को आकर्षित करना होगा। आप वहां केवल एक पर्यटक की तरह मत जाइए बल्कि इसे व्यापार,जहाजरानी एवं टांजिट हब के रूप में इसका विकास कीजिए। 400 किमी. दूर स्थित यांगून और 900 किमी. दूर सिंगापुर से आर्थिक एवं व्यावसायिक रिश्ते बढ़ाइये। सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखकर हम अंदमान-निकोबार क्षेत्र के लिए प्रस्तावित रक्षा सुधारों के साथ आगे एक सकारात्मक दिशा में बढ़ सकते हैं। जहां तक सुधारों की बात है ये सार्थक तभी कहे जाएंगे जब हम संसद के पटल पर रक्षा विषयक श्वेत पत्र प्रस्तुत करेंगे और रक्षा मंत्रालय उन सबकी पुन: रचनाकर कुछ ठोस नई नीतियां बनाएगा। हमें अपने देश के इस महत्वपूर्ण हिस्से पर गौर करना ही होगा और इसे हर तरह से सुरक्षित रखना होगा।
(लेखक अंदमान-निकोबार द्वीप समूह के कमांडर इन-चीफ रहे हैं)