| दिंनाक: 29 Dec 2014 14:40:57 |
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जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव परिणामों ने राज्य और देश दोनों के सामने एक नई शुरुआत का अवसर पेश किया है। केवल परिणाम ही नहीं बल्कि पूरी चुनाव प्रक्रिया कई सुखद आश्चयार्ें से भरी रही। पूरा देश इस बात से उत्साहित है कि कड़ाके की ठंड और आतंकवादियों की धमकियों की परवाह किए बिना इस राज्य की जनता रिकार्डतोड़ संख्या में मतदान केंद्रों की कतारों में आ खड़ी हुई। 65 साल के चुनाव इतिहास में यह पहला मौका था जब जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में आम भारतीय ने उतनी ही रुचि ली जैसी वह दिल्ली, बिहार और महाराष्ट्र के चुनावों में लेता है। लेकिन दुर्भाग्य से हर बार की तरह इस बार भी इस राज्य के वे लगभग 15 लाख लोग देश की नजरों से ओझल रहे जिन्हें राज्य की पेचीदा राजनीतिक व्यवस्था ने कभी भी यहां के चुनावों और लोकतांत्रिक जिंदगी का हिस्सा नहीं बनने दिया।
इनमें से दस लाख से ज्यादा लोग पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के वे शरणार्थी हैं जिन्हें 1947 के बाद राज्य सरकार की उपेक्षा भरी नीतियों के कारण राज्य से बाहर चले जाने और शेष भारत में बसने को मजबूर होना पड़ा था। पीओके के लगभग इतने ही शरणार्थी राज्य के भीतर रह रहे हैं। हालांकि 'पीओके की भारत वापसी' के नाम पर 111 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में 24 सीटों को स्थायी रूप से खाली रखा जाता है। लेकिन राज्य सरकार ने बाहर बसे पीओके समाज के सदस्यों की तीन पीढि़यों को न तो आज तक राज्य में वापस आकर बसने की अनुमति दी है और न यहां के चुनावों में भाग लेने की।
शेष बची 87 सीटों में से कश्मीर घाटी को 46, जम्मू को 37 और लद्दाख को 4 सीटें दी गई हैं। कश्मीर के स्वर्गीय नेता और पंडित नेहरू द्वारा मनोनीत वहां के 'वज़ीरे आज़म' शेख अब्दुल्ला की निजी पहल पर बनाए गए इस फार्मूले ने पूरे राज्य को स्थायी रूप से कश्मीर घाटी के राजनेताओं के रहमो-करम पर छोड़ दिया है। यह इसके बावजूद है कि भारत के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर में कश्मीर घाटी का क्षेत्रफल मात्र 5 प्रतिशत है जबकि जम्मू का 22 प्रतिशत और लद्दाख का 73 प्रतिशत है। कोढ़ पर खाज यह है कि राज्य के तीनों क्षेत्रों के बीच भाषा, संस्कृति, खानपान और भूगोल के स्तर पर कुछ भी साझा नहीं है। यही कारण है कि राज्य के इन तीनों क्षेत्रों के बीच अविश्वास और टकराव स्थायी रूप ले चुके हैं।
लेकिन पीओके से भी ज्यादा दुखद स्थिति उन परिवारों की है जो भारत विभाजन की हिंसा से बचने के लिए जम्मू से लगने वाले पाकिस्तानी पंजाब से भागकर जम्मू में आ बसे थे। राज्य सरकार इस समाज को तब से आज तक 'पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजी' (डब्ल्यूूपीआर) श्रेणी मे रखे हुए हैं। वह इन्हें 'भारतीय नागरिक' तो मानती है पर इनकी तीन पीढि़यां बीतने के बावजूद इन लोगों को 'स्टेट सब्जेक्ट' यानी राज्य के नागरिक का दर्जा नहीं दिया है।
1947 में इन शरणार्थियों की संख्या तकरीबन 80 हजार थी। आज इनकी संख्या लगभग चार लाख है। इनमें से कई लोग राज्य सरकार की नीतियों से तंग आकर भारत के दूसरे राज्यों में जा बसे हैं। पर आज भी इनमें से अधिकांश जम्मू के पुराने शरणार्थी शिविरों और 'कस्टोडियन' घरों में रह रहे हैं। जम्मू-कश्मीर का 'स्टेट-सब्जेक्ट' न होने के बावजूद ये लोग लोकसभा के चुनावों में तो भाग ले सकते हैं पर इन्हंे न तो विधानसभा चुनावों में वोट देने का हक है और न चुनाव में खड़े होने का। यहां तक कि इस समाज के सदस्य पंचायत या कोआपरेटिव सोसायटी के चुनाव में भी भाग नहीं ले सकते। पिछले लोकसभा में इस समाज के मतदाताओं की कुल संख्या डेढ़ लाख से ऊपर थी। विधानसभा के हिसाब से यह संख्या कश्मीर घाटी की चार सीटों-गुरेज़, करनाह, खनयार और हब्बाकदल के कुल वोटों से भी ज्यादा बनती है।
51 वर्षीय लाभा राम 'वैस्ट पाकिस्तान रिफ्यूजी कमेटी' के माध्यम से इन शरणार्थियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसलिए अपने समाज की समस्याओं की ओर देश का ध्यान खींचने के लिए उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। पिछले प्रधानमंत्री डा़ मनमोहन सिंह भी विभाजन के समय उसी इलाके से भारत आए थे जहां लाभा राम का गांव था। उनका जिक्र करते हुए वह कहते हैं, 'अगर हमारे माता-पिता की तरह वह भी जम्मू में शरण लेते तो देश का प्रधानमंत्री बनने के बजाए यहां अपनी पहचान खोकर हम लोगों की तरह धक्के खा रहे होते।'
बात अगर केवल चुनावों से बेदखल किए जाने तक सीमित होती तो भी गनीमत रहती। लेकिन राज्य सरकार द्वारा उनके समाज को 'स्टेट सब्जेक्ट' न मानने की वजह से उनके वे मूलभूत अधिकार भी उनसे छिन चुके हैं जो आजाद हिंदुस्थान के सबसे गरीब नागरिक को भी हासिल हैं। उदाहरण के लिए, राज्य के कानून में इन लोगों को न तो अपना घर खरीदने का अधिकार है, न रहने का मकान। 'बाहरी' होने के कारण इनके बच्चों को राज्य सरकार के उच्च शिक्षा संस्थानों और प्रोफेशनल ट्रेनिंग संस्थानों में भी प्रवेश लेने पर पाबंदी है। वे किसी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन देने के भी हकदार नहीं हैं। यही कारण है कि इनमें से अधिकांश गरीबी रेखा से भी नीचे हैं।
राज्य का नागरिक न होने के कारण वे अपना कामधंधा शुरू करने के लिए राज्य सरकार के किसी बैंक या कोआपरेटिव से उधार भी नहीं ले सकते। हालांकि इस समाज के लगभग 75 प्रतिशत लोग अनुसूचित जातियों के हैं, लेकिन राज्य के अलग संविधान के कारण उन्हें केंद्र सरकार की इंदिरा आवास योजना और बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधाएं पाने का भी अधिकार नहीं है।
इस समाज की इस दयनीय हालत और उनके मूलभूत मानवाधिकारों के इस हनन पर सर्वोच्च न्यायालय 1987 में और भारत सरकार की जी.डी. वाधवा कमेटी 2007 में जम्मू-कश्मीर सरकार से इन अमानवीय नियमों को बदलने की बात कह चुकी हैं। लेकिन राज्य सरकार धारा-370 और राज्य के 'विशेषाधिकारों' का हवाला देते हुए इन पर अमल करने से मना करती आ रही है।
मगर इसी राज्य सरकार ने इन विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए उन मुस्लिम शरणार्थियों को राज्य का 'स्टेट सब्जेक्ट' बना दिया जो तिब्बत और शिंजियांग पर चीनी कब्जे के बाद वहां से आकर कश्मीर घाटी में बस गए थे। इतना ही नहीं, 1982 में फारुख अब्दुल्ला सरकार ने घाटी के बूते पर अपने बहुमत का इस्तेमाल करते हुए विधानसभा में यह कानून पास कर दिया कि 1947 से 1953 के बीच जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान जा बसे नागरिकों को वापस आने पर 'स्टेट सब्जेक्ट' के पूरे नागरिक अधिकार दिए जाएंगे और उनकी पुश्तैनी जमीन-जायदाद पर कब्जा भी दिलाया जाएगा।
दुर्भाग्य से भारत में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की लंबी-चौड़ी बातें करने वाले संगठनों ने आज तक कश्मीरी लोकतंत्र के इन 'सौतेले बच्चों' पर कभी ध्यान नहीं दिया। इन्हें उम्मीद है कि इतिहास के नए शुरू होने वाले अध्याय में उन्हें भी उचित स्थान मिलेगा। ल्ल
(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और सेंटर फॉर हिमालयन एशिया स्टडीज़ एंड एंगेजमेंट के चेयरमैन हैं।) -विजय क्रान्ति