संस्कृति सत्य - बिशप लिब्बी के आने से तेज होगी चर्च की
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संस्कृति सत्य – बिशप लिब्बी के आने से तेज होगी चर्च की

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Dec 29, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 29 Dec 2014 14:34:28

सत्रह दिसम्बर, 2014 को चर्च ऑफ इंग्लैंड ने लिब्बी लेन नामक महिला की पहली बार बिशप के तौर पर नियुक्ति की है। पहली नजर में यह विषय महिलाओं को अपनी काबिलियत दिखाने का मौका देने जैसा प्रतीत होगा लेकिन पूरी दुनिया में ईसाईकरण का जो नया अतिव्यापक स्वरूप जारी है, उसे इससे नई गति मिलेगी, इसमें संदेह नहीं है। ईसाईकरण में लाई गई यह नई गति केवल पिछली पांच सदियों के सतत प्रयासों का हिस्सा है। जहां जहां इस तेजी से ईसाईकरण करने का मकसद है वहां अनेक संस्थाओं, संगठनों, विश्वविद्यालयों एवं राजनैतिक दलों में भी लंबे समय से जारी काम का यह अगला चरण है। इसलिए इस चलन पर बारीक दृष्टि डालना आवश्यक है।
आज ईसाई जगत पूरी दुनिया में ईसाईकरण में तेजी लाने पर जोर दे रहा है। दुनिया में आज दो अरब ईसाई जनसंख्या है, उसे तीन अरब से अधिक पहंुचाने हेतु वे पूरी ताकत से प्रयास कर रहे हैं। इसमें चीन, भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देशों का भी समावेश है। वहां अगर मकसद 25 करोड़ लोगों का मतांतरण हो तो उस नजर से लिब्बी को बिशप बनाए जाने का काफी महत्व है।
पश्चिमी जगत में इन दिनों औद्योगिकरण और सूचना तकनीक के आधार पर नई जीवनशैली विकसित होने के कारण चर्च के लिए काम करने वालों की संख्या काफी कम हुई है। इस पृष्ठभूमि में महिलाओं को अधिकाधिक जिम्मेदारियों वाले पद देने का विकल्प आना स्वाभाविक था। इसका मतलब यह नहीं कि इससे पहले चर्च संगठनों में महिलाओं की संख्या कम थी। वे पुरुषों की तुलना में अधिक ही थीं, लेकिन किसी बड़ी योजना का नेतृत्व महिलाओं के पास नहीं होता था। अब महिला बिशप यानी डायोसिस प्रमुख के रूप में महिलाओं की नियुक्ति होनी शुरू हुई है।
मतांतरण ऊपरी तौर पर पंथ से जुड़ा विषय प्रतीत हो सकता है, परंतु एशिया, अफ्रीका एवं दक्षिण अमरीका के अनेक देशों की दृष्टि में मतांतरण से राष्ट्रांतरण जैसा असर होता रहा है। इसके अलावा जिन्हें महासत्ताओं का सहयोग प्राप्त है ऐसे यूरोपीय देशों की दृष्टि से मतांतरण किसी अन्य देश पर गुलामी थोपने और उसके आधार पर बेतहाशा लूट मचाने का साधन है। पिछले 500 वर्ष के इतिहास के पन्नों पर इसके प्रमाण देखे जा सकते हैं। ऊपरी तौर पर ऐसा महसूस हो सकता है कि इससे महिलाओं को उनके काम के लिए नया आकाश मिला है। लेकिन उसकी परिणती अगर आक्रामकों की ताकत में बढ़ोतरी में होती हो, तो इस नए निर्णय का असर 'मतांतरण से राष्ट्रांतरण' होने की संभावना वाले देशों में क्या होगा एवं उनमें भी भारत पर क्या होगा, इसकी ओर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। भारत की दृष्टि से यह विषय आज बेहद गंभीर हो चला है।
कुछ चुनिंदा बड़े देशों द्वारा दूसरे देशों की समस्याएं खोजकर उन पर हमला बोलते हुए वहां मतांतरण और उससे राष्ट्रांतरण करने की प्रक्रिया जारी रही है। भारत में पहले कुछ वर्ष 'वंचित समस्या' और 'द्रविड समस्या' को लेकर उन्होंने मतांतरण के लिए जाल बिछाया था। उसके पीछे कारण था हमारे यहां लंबे समय तक वंचितों पर अन्याय होना। लेकिन इन आक्रामकों का उद्देश्य कभी उस समस्या को सुलझाना नहीं रहा बल्कि उसका आधार लेकर राष्ट्रांतरण करवाना रहा। पिछली कुछ सदियों के अनुभव से उनका यह मकसद स्पष्ट होता है। ईसाई मिशनरियों ने पहले वंचित एवं द्रविड विषय ही उठाए। पिछले 300 वर्ष में अनेक बार नए बिन्दु उसमें जोड़े गए हैं। ऐसी चीजों को उभारने और उसके जरिए राष्ट्रांतरण के लिए उन्होंने जिहादियों की मदद ली। बाद में कुछ वर्ष खालिस्तान का मुद्दा उठाया। अगर उसमें कुछ हासिल नहीं हुआ तो और नए नए विवाद खड़े करके उनके आधार पर उन देशों को सतत समस्याग्रस्त और छिन्न-विछिन्न करने के प्रयास अनेक सदियों से जारी हैं। भारत जैसे विशाल उप महाद्वीप पर उस प्रयास का बड़े पैमाने पर होना स्वाभाविक ही था। लेकिन यह प्रश्न केवल भारत तक सीमित नहीं है। यूरोपीय देशों ने पिछली 4-5 सदियों में लूट के लिए जिन-जिन देशों पर राज किया वे देश आज उनके नियंत्रण में हांे या न हों, वहां यही प्रक्रिया जारी है। यूरोपीय देशों की यह लूट, मतांतरण और राष्ट्रांतरण का इतिहास ही विश्व का इतिहास है। यही आज की वस्तुस्थिति है।
ब्रिटेन जैसे यूरोप के एक सिरे पर स्थित देश में लिब्बी को बिशप पद देना एक छोटी सी घटना लग सकती है। वास्तव में चर्च ऑफ इंग्लैंड उस देश तक सीमित चर्च है। यद्यपि वह प्रोटेस्टेंट पंथ का प्रमुख स्थान है, लेकिन वह मुख्यालय है या नहीं इसको लेकर अनेक मत हैं। कैथोलिक पंथ की वस्तुस्थिति यह है कि रोम उसका मुख्यालय है, वर्तमान पोप फ्रांसिस उसके प्रमुख हैं। दो अरब ईसाई आबादी में से एक अरब 20 करोड़ कैथोलिक ही हैं। लेकिन प्रोटेस्टें पंथ की एक अरब से थोड़ी कम आबादी का पोप की तरह एकछत्र सर्वेसर्वा नहीं है। उनमें एंग्लिकन, बैप्टिस्ट, पेंटाकोस्टल, मेथॉडिस्ट जैसे 8-10 बड़े पंथ हैं। ये पंथ अनेक देशों में अपने-अपने अनुयायियों तक सीमित लगते हैं। उनकी निर्णय करने की पद्धति, नियंत्रण पद्धति, स्थानीय पद्धति में कुछ भिन्नताएं रहती हैं, लेकिन किसी साम्राज्य का निर्माण जितना सुगठित होता है, उसी तरह बल्कि यह उससे भी अधिक सुगठित है। भारत में तमिलनाडु एवं नागालैंड में बैप्टिस्ट मिशन का काम है। बैप्टिस्ट मत का मुख्यालय अमरीका में है, लेकिन तमिलनाडु के काम हेतु उन्होंने यूरोप के अनेक देशों एवं कैथोलिकों की भी जिस तरह मदद ली है, उसे देखते हुए यह किसी पंथ का काम न लगकर किसी साम्राज्य के विस्तार का काम अधिक लगता है। ऐसा नहीं है कि नागालैंड में विस्तार हेतु उन्होंने केवल चीन का सहयोग लिया, बल्कि उस उपलक्ष्य में विश्व में उनके दुश्मन के तौर पर कार्यरत उग्रवादी संगठनों को भी जोड़ा। उनमें जिहादी भी अपवाद नहीं हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उनके मुख्यालयों का काम भी संगठित तरीके से होता है। उग्रवादी संगठन मुख्यत: भूमिगत रहकर काम करते हैं। इसलिए स्वाभाविक रूप से उनकी सीमाएं होती हैं। दूसरे यह कि उनकी समस्याओं ऐसी होती हैं जिनका आकलन दूसरे भूमिगत संगठनों को देखकर किया जा सकता है। 'ब्रेकिंग इंडिया' पुस्तक के लेखक-शोधकर्ताओं के अनुसार परस्पर विरोधी उद्देश्य वाले भूमिगत संगठनों द्वारा मिलकर काम करने की शुरुआत नागालैंड में बैप्टिस्ट एवं माओवादियों के एकजुट होने से हुई थी। 60 वर्ष पूर्व वह एक प्रयोग मात्र था, लेकिन उसको सफलता मिलने के बाद पिछले 25 वषार्ें में जिहादियों का उसके लिए सहयोग प्राप्त किया गया। भारत में एक तरफ पूवार्ेत्तर से तो दूसरी तरफ दक्षिण से मध्य भारत की ओर पहुंचने के ये प्रयोग जारी हैं।
पिछली सदियों के दौरान यूरोप की पूरी दुनिया में महासत्ता कायम थी, जिसके मुख्यालय लंदन, लिस्बन या रोम में थे, इसे लेकर भले अलग-अलग मत हों, वे मुख्यालय आज वाशिंग्टन कब पहुंचे और उसके कुछ कार्यालय जिनिवा में कहां हैं, इस बारे में भी अलग अलग मत हो सकते हैं, लेकिन एक बात निश्चित है कि सारे यूरोपीय देश, उनके चर्च संगठन, वहां के विश्वविद्यालय और उस हिस्से में मुख्यालय वाले कुछ वैश्विक स्तर के संगठन इस काम में स्वतंत्र एवं आपस में मिलकर काम कर रहे हैं। भारत के संदर्भ में आश्चर्य की बात यह है कि यहां की वामपंथी विचारों वाली अनेक संस्थाएं एवं व्यक्ति उन्हीं के सहयोग से काम कर रहे हैं। अनेक विश्वविद्यालयों एवं अनेक तथाकथित विचारकों के साथ ही उनके समान पसंद के एवं नापसंद विषयों के आधार पर वामपंथी विचारों वाली ये संस्थाएं भी यूरोपीय साम्राज्य की विस्तारक बनी हैं। भारत के अनेक विश्वविद्यालयों को वित्तीय सहायता की आवश्यकता होती है। वहीं यूरोपीय-अमरीकी संस्थाओं से 'टाई अप' करना भी उनके लिए उपयुक्त होता है। इसलिए यूरोपीय संस्थाओं के एजेंडों पर यहां 'शोध एवं विकास' उनका मकसद बनता है। अनेक विश्वविद्यालय तो अनजाने ही उनके एजेंडे पर अमल करते हैं। इसमें मीडिया भी अछूता नहीं है। भारत का 70 प्रतिशत मीडिया यूरोपीय चर्च संगठनों के निवेश पर ही चलता है, यह बात आम लोगों को पता ही नहीं होती। चर्च संगठन इन विश्वविद्यालयों के विचारकों में इतनी रुचि क्यों लेते हैं और मीडिया पर नियंत्रण रखने से उन्हें क्या फायदा होता है, इस बारे में किसी भी आम भारतीय को किसी तरह का संदेह तक नहीं होता। तमिलनाडु में तो इसके साथ ही भाषा अध्ययन, वहां के लोकगीतों, बच्चों को सुनाने वाली लोरियों, कहावतों, चुटकुलों आदि के आधार पर यह दिखाने का प्रयास किया गया कि तमिल भाषा यूरोप से आई है। यह उत्तर भारत से दक्षिण भारत को अलग करने के षड्यंत्र का ही हिस्सा था।़ वास्तव में दक्षिण भारत में संगम वाङमय नामक साहित्य का एक ऐसा विशाल भंडार है कि दक्षिण का साहित्य वाङमय उत्तर के साहित्य से अधिक समृद्ध हुआ है और दक्षिण के शंकराचार्य के कारण उत्तर की सांस्कृतिक जीवनशैली अनुशासित हुई है। ब्रिटेन में चर्च में कल तक पुरुषवादी संस्कृति का प्रभाव था, अब उसमें एक उच्च शिक्षित महिला जुड़ी है, इस वजह से ये विषय नहीं लिया गया है कि इससे पूरे विश्व की समस्याएं बढ़ गई हों, बल्कि इस नजरिए से लिया गया है कि पिछले 500 वर्ष से पूरी दुनिया में फैलती जा रही महासत्ता को एक नई ताकत का साथ मिलना शुरू हुआ है। ऐसे में विश्व के सामने ईसाईकरण का आक्रमण और आक्रामक हो जाए तो उससे आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जिन देशों को अपनी ताकत के बूते खड़ा रहना है उन्हें इस तरह की बातों पर गंभीरता से गौर करना ही होगा। ल्ल
विरोध के बावजूद बनाया बिशप
बिशप पद पर किसी महिला की नियुक्ति करने को लेकर ब्रिटेन में पिछले 20 वर्ष से चर्चा चल रही थी। राजनीतिकों और ईसाई मिशनरियों का मत 'महिला बिशप' नियुक्त करने के पक्ष में था लेकिन वहां की आम जनता ने उसका विरोध किया था। अभी पिछले वर्ष ही यह प्रस्ताव नकारे जाने और पुन: पांच वर्र्ष तक उसे न लाने का संविधान में प्रावधान होते हुए भी कुछ कारणों से उसे पुन: लाया गया। हाऊस ऑफ लॉर्ड्स में भी इस पर मतदान होने वाला है। पहली बार बिशप पद पर नियुक्त होने वाली लिब्बी लेन विवाहित हैं एवं उनके पति भी चर्च में एक अधिकारी हैं।
-मोरेश्वर जोशी

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