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राष्ट्रजीवन की चेतना को मन्त्र-स्वर देने वाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त सच्चे अथार्ें में राष्ट्रभर के कवि थे। उन्हांेनेंे आम-जन के बीच प्रचलित देशी भाषा को मांजकर जनता के मन की बात, जनता के लिये, जनता की भाषा में कही इसीलिये राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें राष्ट्रकवि का सम्मान देते हुये कहा था, ''मंै तो मैथिलीशरण जी को इसलिये बड़ा मानता हूं कि वे हम लोगों के कवि हैं और राष्ट्रभर की आवश्यकता को समझकर लिखने की कोशिश कर रहे हैं।'' कालान्तर में उनकी भाषा से हिन्दी की साहित्यिक भाषा का विकास हुआ। उन्होंने पराधीनता काल में मुंह खोलने का साहस न करने वाली जनता का नैराश्य-निवारण करके आत्मविश्वास भरी ऊर्जामयी वाणी दी, इससे 'भारत-भारती' जन-जन का कण्ठहार बन गयी थी। इस कृति ने स्वाधीनता के लिये जन-जागरण किया। इसी कारण गुप्त जी को अपना काव्यगुरु मानने वाले कविवर अज्ञेय जी, 15 अगस्त 1947 को आजादी का जश्न मनाने, दिल्ली छोड़कर गुप्त जी के गृहनगर चिरगांव (झांसी) गये थे।
गुप्त जी ने हिन्दी कविता को रीतिकालीन श्रंृंगार-परम्परा से निकालकर तथा राष्ट्रीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संजीवनी से अभिसंचित करके लगभग छह दशक तक हिन्दी काव्यधारा का नेतृत्व किया। ऋग्वेद के मन्त्र 'आ नो भद्रा: क्रातवो यन्तु विश्वत:' (श्रेष्ठ विचार हर ओर से हमारे पास आवें) को हृदयंगम करके राम, कृष्ण, बुद्घ, महावीर, कौटिल्य, गुरुवाणी, ईसा तथा मार्क्स के विचार-सार को गहकर, बिना अंग्रेजी पढ़े लिखे, बुन्देलखण्ड के पारम्परिक गृहस्थ जीवन मे सुने आख्यानों को सुन-समझकर स्वाध्यायपूर्वक लोकमंगलमय साहित्य रचा। वाचिक परम्परा के सामीप्य से वे लोकचित्त के मर्मज्ञ बने, इससे उनके काव्य में लोक संवेदना, लोक चेतना तथा लोक प्रेरणा की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है। अस्मिता बोध की आधारशिला पर युगानुरूप भावपक्ष पर रचना-प्रवृत्तियों के वैविध्य से उनका रचना संसार लोकप्रिय हुआ। उनका साहित्य गांव-गली तक आमजन की समझ में आने वाला है साथ ही मनीषियों के लिये अनुशीलन, शोध तथा पुन:शोध का विषय है। वे परम्परावादी होते हुए भी 'अलीकवादी' थे तथा शास्त्रों की व्याख्या युग की परिस्थितियों के अनुरूप करने के पक्षधर थे। प्रकृति तथा सौन्दर्य का कवि न होते हुये भी प्रसंगानुकूल रागात्मकता उनके काव्य का महत्वपूर्ण पक्ष है।
विगत कुछ शताब्दियों में वैश्विक पटल पर हुई क्रान्तियों से धार्मिक आस्था, देशानुराग तथा राष्ट्रीयता के अनेक परिप्रेक्ष्य सामने आये। इनकी दृढ़ता के कारण जापान बार-बार मिटकर अग्रपंक्ति में खड़ा हो सका, इजरायल ने सर्वाधिक नोबेल पुरस्कार प्राप्त किए तथा चीन विश्व की महाशक्तियों को टक्कर दे रहा है। कभी भारत 'विश्वगुरु' तथा 'सोने की चिडि़या' के रूप में विदेशियों की रुचि तथा ललक का केन्द्र बना रहा। विदेशियों ने यहां से बहुत कुछ ले जाने का उपक्रम किया, किन्तु 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।' आज भारत की ज्ञान-सम्पदा नयी तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक-स्पर्धा का विषय है। लड़खड़ाते वैश्विक आर्थिक संकट में भारत की स्थिति भी बेहतर है। नयी सदी के इस परिदृश्य में, नयी पीढ़ी को देश के नवनिर्माण के सापेक्ष अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी है।
जब तक नैराश्य से निकलकर आशा और उल्लास की किरण देखने का मन है, आतंकवाद के मुकाबले के लिये निर्भय होकर अडिग मार्ग चुनना है, कृषकों-श्रमिकों सहित सर्वसमाज के समन्वय से देश को वैभव के शिखर पर प्रतिष्ठित करने का स्वप्न है, तब तक गुप्त जी का साहित्य प्रासंगिक है और रहेगा।
'हम कौन थे क्या हो गये और क्या होंगे अभी' पर चिन्तन और मनन अपेक्षित है, उससे दशा के सापेक्ष दिशा भी मिलेगी तथा भारत पुन: विश्वगुरु बन सकेगा। भारत-भारती के भविष्यत् खण्ड की निम्नांकित पंक्तियां प्रत्येक भारतवासी को 'उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको नहीं' का जागरण-मंत्र दे रही हैं –
भूलो न ऋषि-सन्तान हो
अब भी तुम्हेंे यदि ध्यान हो-
तो विश्व को फिर भी तुम्हारी
शक्ति का कुछ ज्ञान हो।
बनकर अहो फिर कर्म्मयोगी
वीर बड़भागी बनो,
परमार्थ के पीछे जगत में
स्वार्थ के त्यागी बनो॥
होकर निराश कभी न बैठो,
नित्य उद्योगी रहो,
सब देश-हितकारी कार्य में
अन्योन्य सहयोगी रहो।
धर्म्मार्थ के भोगी रहो बस कर्म के योगी रहो,
रोगी रहो तो प्रेम-रूपी रोग के रोगी रहो॥
पुरुषत्व दिखलाओ पुरुष हो,
बुद्घि-बल से काम लो,
तब तक न थककर तुम कभी
अवकाश या विश्राम लो-
जब तक कि भारत पूर्व के
पद पर न पुनरासीन हो,
फिर ज्ञान में विज्ञान में जब कभी
वह स्वाधीन हो॥
गुप्त जी की 50वीं पुण्यतिथि पर उन्हें अशेष श्रद्घांजलि। –अयोध्या प्रसाद गुप्त 'कुमुद'










