| दिंनाक: 01 Dec 2014 13:03:30 |
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आज तक हम सब यही समझते थे कि राष्ट्रीय एवं प्रांतीय महिला आयोग महिलाओं के संपूर्ण हित,सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य की और शोषण से मुक्ति की बात करते हैं। इसी के लिए उनका पूरे देश में सतत् प्रयास रहता है। ऐसी ही धारणा महिला आयोग एवं महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली महिला नेताओं के प्रति देशवासियों की रही है। आश्चर्य ही नहीं,अपितु बेहद दु:ख हुआ यह जानकर की भारत के राष्ट्रीय महिला आयोग की नवनियुक्त अध्यक्ष और भाजपा की पूर्व प्रवक्ता श्रीमती ललिता कुमारमंगलम ने यह प्रस्ताव सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति को भेजा है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दी जाए तथा वेश्याओं के अधिकारों की रक्षा वैसे ही की जाए जैसे अन्य श्रमजीवियों को पूरे देश में प्रदान की जाती है।
याद रखना होगा कि सन 2010 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका के आधार पर एक पैनल बनाया गया था, जिसमें वेश्याओं के पुनर्वास की व्यवस्था करने की मांग की गई थी। सन 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय महिला आयोग को भी इस पैनल में शामिल किया। पैनल का उद्देश्य यह था कि देश में पहले बने हुए अनैतिक व्यापार रोकथाम अधिनियम में कुछ सुधार किए जाए। यौन कर्मियों के कल्याण के लिए जो संगठन काम करते हैं वे बहुत लंबे समय से यह मांग करते आए हैं कि इन महिलाओं को भी सम्मान के साथ जीने का अधिकार है,इसलिए इस धंधे को कानूनी मान्यता दी जाए। यौन कर्मियों के लिए काम करने वाले संगठनों की संयुक्त समिति की सचिव भारती डे का कहना है कि जिस तरह और लोग काम करके पेट भरने के लिए रोजी-रोटी कमाते हैं उसी तरह ये महिलाएं भी काम करती हैं, पर समाज इन्हें इंसान ही नहीं समझता, इसलिए कानूनी दृष्टि से यौन कर्मियों को अन्य कामगारों की तरह ही समझा जाना चाहिए। आश्चर्य है कि देश के कुछ तथाकथित समाजसेवी वेश्यावृत्ति को समाप्त करने की बात नहीं करते और न ही उन नाबालिग लड़कियों को इस चंगुल से छुड़ाने का कोई सार्थक प्रयास कर रहे जो अपराधी तत्वों द्वारा इन वेश्याओं के जाल में फंसाई गई हैं। सभी जानते हैं कि भारत में 1997 तक यौन कर्मियों की संख्या बीस लाख थी, जो बढ़ते-बढ़ते तीस लाख हो गई। 2006 में महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा तैयार रपट में यह भी पाया गया था कि देश में 90 फीसदी यौन कर्मियों की उम्र 15 से 35 साल के बीच है। ऐसे भी मामले देखने में आए हैं जिसमें झारखंड, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड में 12 से 15 वर्ष की कम उम्र की लड़कियों को भी वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है।
सभी स्वस्थ मनोवृत्ति वाले भारतवासी तो यह आशा कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री का स्वच्छ भारत अभियान केवल सड़कों से कूड़े-कर्कट की सफाई तक ही सीमित नहीं रहेगा, अपितु समाज-जीवन में भी स्वच्छता ले आएगा। पर राष्ट्रीय महिला आयोग का यह प्रस्ताव कि वेश्यावृत्ति को ही कानूनी संरक्षण दिया जाए, सामाजिक जीवन में मलिनता बढ़ाने वाला हो जाएगा। वेश्यावृत्ति ऐसा गैरकानूनी धंधा है जो तस्करी की तरह पुलिस और कानून से छिपाकर नहीं किया जाता। पूरा देश जानता है कि एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया अर्थात वेश्यावृत्ति का अड्डा कोलकत्ता के सोनागाची में है, जहां एक अनुमान के अनुसार 11 हजार वेश्याएं देह व्यापार करती हैं। दिल्ली के जीबी रोड से भी सभी परिचित हैं। विशेषकर वे कानून के रक्षक जिनका काम इन धंधों को रोकना है। यहां नेपाल और बंग्लादेश से बड़ी संख्या में लड़कियों की तस्करी करके लाया जाता है। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में रेशमपुरा इलाका देह व्यापार के लिए जाना जाता है। अब यहां विदेशी लड़कियों के साथ-साथ स्थानीय युवतियां भी इस धंधे में फंस रही हैं। उ.प्र. के मेरठ में स्थित कबाड़ी बाजार बहुत ही पुराना रेडलाइट एरिया है, जहां अंग्रेजों के जमाने से देह व्यापार प्रचलित था। पुलिस यहां कभी-कभी छापे तो मारती है, पर धंधा चलता रहता है। एक जानकारी के अनुसार मेरठ में बहुत सी नेपाली लड़कियों को बड़ी-बड़ी अलमारियों में जानवरों की तरह बंद करके रखा गया था। मायानगरी मुंबई का कामथीपुरा रेडलाइट एरिया पूरी दुनिया में चर्चित और एशिया का जाना पहचाना तथा पुराना देह व्यापार का केंद्र है। ऐसा कहा जाता है कि 1795 में इस क्षेत्र में यह धंधा शुरू हुआ और 1880 तक अंग्रेजों के लिए ऐशगाह बन गया। इसके अतिरिक्त वाराणसी में दाल मंडी, सहारनपुर में नक्कास बाजार और नागपुर का गंगा यमुना क्षेत्र इस निंदनीय धंधे के लिए प्रसिद्घ हैं।
आश्चर्य है कि कन्या पूजन करने वाले भारत देश में हमारी लाखों बेटियां वेश्यावृत्ति में फंसी हैं या फंसाई गई हैं, पर यह तो निश्चित है कि जो 36 प्रतिशत बालिकाएं वेश्या बनने को विश्व की गई हैं वे तो कानून और समाज की नालायकी के कारण ही इस दलदल में धकेली गई हैं। यह तर्क किसी को स्वीकार नहीं कि वेश्यावृत्ति में फंसी लड़कियों को उनके परिवार लेने को तैयार नहीं। मान लिया जाए कि परिवार नहीं लेते, पर सरकारों को तो यह उत्तर देना होगा कि किस प्रकार ये बच्चियां उन कोठों में पहुंचीं और उनको वहां से मुक्त करवाकर सुरक्षित सामाजिक जीवन सरकारें क्यों नहीं दे पाईं? बाल और महिला संरक्षण गृहों में रखकर इन बालिकाओं और युवतियों को शिक्षा-दीक्षा देकर स्वावलंबी तो बनाया जा सकता है। क्या सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी और जब कोई हल नहीं निकला तो वेश्यावृत्ति के धंधे को ही कानूनी मान्यता दे देगी, यह तो भारतीय समाज और सरकार के दिवालियेपन का प्रतीक सिद्ध होगा। देश भर के सभी महिला आयोग, समाजसेवी संस्थाएं और सरकार का सारा ढांचा एक बार तो इन महिलाओं को अपने नियंत्रण में लेकर यह तो जान ले कि कौन-कौन यहां अपराधियों द्वारा बेची गई हैं और कौन-कौन यहां से मुक्त होना चाहती हैं। विडंबना है कि अपने देश में यौन बिक्रेता को तो दंड मिलता है, लेकिन यौन बिक्रेता कानून की पहुंच से दूर रहते हैं। उनको दंड देने के लिए कोई कानून शायद बना ही नहीं। जो महिला संस्थाएं यह वकालत करती हैं कि इस धंधे को ही मान्यता दे दी जाए, उनको याद रखना होगा कि जिस-जिस देश में इस धंधे को मान्यता मिली, वहीं वेश्याओं की संख्या बढ़ गई। वे बहुत सी बीमारियों का शिकार हो गईं। नशे का सेवन करने लग गईं और कौन नहीं जानता एड्स जैसी भीषण बीमारी भी इन्हीं बदकिस्मत बस्तियों में से ही निकलती है जहां लोग शरीर की भूख मिटाने के लिए जाते हैं और लाचार युवतियां पेट की भूख मिटाने के लिए शरीर बेचती हैं।
वर्तमान सरकार से यह आशा की जाती है कि वेश्यावृत्ति को धीरे-धीरे समाप्त करने के लिए प्रभावशाली कार्य करे। सबसे पहले जो इस नरक से मुक्ति चाहती हैं उनको मुक्ति दी जाए और जो अब किसी भी विवशता में इसी दलदल में जीना चाहती हैं उनका जीवन दूसरों को इस जाल में फंसाने वाला न हो।
उन लोगों की बुद्घि पर तरस आता है जो यह कहते हैं कि महिलाओं के विरुद्घ यौन अपराध बढ़ रहे हैं, इसलिए वेश्यावृत्ति को मान्यता दी जाए। क्या यह संभव नहीं कि इस विकृत मानसिकता के स्वामी कल को यह भी कहेंगे कि देश में हथियारों और नशे की तस्करी ज्यादा बढ़ रही है इसलिए इस तस्करी को भी मान्यता दे दो। बहुत सी हत्याएं अपराधी करते हैं इसलिए कुछ लोगों को मारने की छूट इन हत्यारों केा दे दी जाए। वैसे ही जैसे पंचतंत्र की कहानी में लिखा है कि एक शेर बहुत से पशु प्रतिदिन मारता था, इसलिए एक पशु रोज उसकी भूख मिटाने के लिए भेजने का फैसला जंगल की पंचायत ने किया था। जो लोग विशेषकर महिलाएं वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने की बात कर रही हैं उनको एक महिला के नाते सोचना चाहिए कि उन महिलाओं का जीवन कितना दयनीय होता है, जो इस धंधे में फंसी हैं।
अच्छा तो यह हो कि यह समाजसेवी संगठन वेश्यावृत्ति छोड़कर समाज की मुख्य धारा में आने वाली महिलाओं के भरण पोषण और छोटी उम्र की लड़कियों के विवाह आदि का प्रबंध करके स्वस्थ समाज के गठन का कार्य करें। कन्या पूजन करने वाले देश के माथे पर यह बहुत बड़ा कलंक है कि आज यहां 2000 लाख रुपये का देह व्यापार प्रतिदिन होता है। इसका सीधा अर्थ है कि लाखों पुरुष परिवार से बाहर भी अपनी कामवासना को शांत करने के लिए भटकते हैं, पर कानून उन्हें कोई दंड नहीं दे पा रहा। इसे बंद करके ही भारत-भारत रहेगा और हमें भारत को भारत ही रखना है। -लक्ष्मीकांता चावला