| दिंनाक: 15 Nov 2014 11:38:30 |
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नवम्बर के अंतिम सप्ताह में जब सर्दी की चादर फैलेगी, जम्मू-कश्मीर की राजनीति गरमा रही होगी। पांच चरणों में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव इस बार खास हैं। कोई अचरज नहीं कि इस गर्माहट में दशकों से चले आ रहे समीकरण बदल जाएं। सामाजिक-राजनैतिक रुखाई की बर्फ पिघल जाए, दूरियों की घाटियां पट जाएं। लेकिन कौन से ग्लेशियर पिघलेंगे? कौन सी घाटियां पटेंगी? क्या बदलाव की हलचल राज्य में लोगों को भी मथ रही है, या यह सिर्फ दिल्ली का सपना है? केन्द्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार स्थापित होने के बाद राजनीति की यह नई करवट ऐसी है जिसकी संभावना सभी अनुभव कर रहे हैं। राज्य सत्ता के केन्द्र यानी श्रीनगर की सुगबुगाहटों पर नजर डालें तो लगता है कि जनता में फर्क करने का, मजहबी लामबंदी का जो सिलसिला घाटी से शुरू हुआ वह घाटी में ही दफनाया जाएगा। केन्द्रीय सत्ता बदलने वाला देश की राजनीति का यह ऐसा संक्रमण काल है जिसके असर से जम्मू-कश्मीर भी अछूता नहीं है।
स्थानीय कद्दावर नेताओं की कशमकश, नई राजनैतिक लामबंदियों की कोशिश और मजहब को राजनीति का फेवीकोल बनाए रखने की आखिरी छटपटाहट आज जम्मू-कश्मीर में साफ देखी जा सकती है। यह बेचैनी बताती है कि सत्तातंत्र में बड़े बदलाव को स्थानीय स्तर पर तेजी से महसूस किया जा रहा है।
पीडीपी विधायक पीरजादा मंसूर को ही लीजिए। वह कहते हैं कि राज्य का मुख्यमंत्री कोई मुस्लिम ही हो सकता है। उनके इस बयान में सिर्फ वह जहरीली मानसिकता नहीं है जिसने केसर की क्यारियों में कट्टरवाद का बारूद बिछाया है। यह इस्लाम के नारे से जनता को छलने की आखिरी राजनैतिक कोशिश भी है। इसमें दो राय नहीं कि घाटी में हिन्दुओं के साथ-साथ गुज्जर, बक्करवाल, शिया सबने 'सुन्नी अन्याय' झेला है लेकिन पीडीपी ने श्रीनगर से नेशनल कांफ्रेंस को साफ करने के उसी इस्लामी उस्तरे को धार लगाना शुरू कर दिया है जो ब्रिटिश काल से अब्दुला परिवार की पहचान रहा है। इसमें शक नहीं कि पीडीपी इस चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस का काल साबित होगी लेकिन क्या उन्माद की राजनीति से लोग उकताए नहीं हैं? क्या बुनियादी ढांचे का विकास और बेहतर जीवन जम्मू-कश्मीर की जनता की चाह नहीं है? सूबे का शासन कब तक कुछ कुनबों के हाथ का खिलौना बना रहेगा इस पर भी राज्यभर में माहौल बनने लगा है। कश्मीर पीपुल्स कांफ्रेंस के नेता सज्जाद लोन की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात को स्थानीय जनता की इसी बेचैनी के तौर पर देखा जाना चाहिए। वे जम्मू-कश्मीर की राजनीति में खानदानों का वर्चस्व समाप्त करने की इच्छा रखते हैं। राजनीति को परिवारों की जकड़बंदी से छुड़ाने की चाह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर भाजपा का रुख उनके मन को छूता है। स्थानीय जनता का रुख, उसका मन, महत्वाकांक्षाएं सीधा दिल्ली तक पहुंचें, यह बात घाटी के कुछ परिवारों को बेचैन कर रही है। इस भेंट को भाजपा-केपीके गठजोड़ कहना गलत होगा, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि सज्जाद की दिल्ली यात्रा ने डल झील में तरंगें पैदा कर दी हैं। वैसे, पीरजादा का बयान और सज्जाद की यात्रा सिर्फ दो घटनाएं नहीं बल्कि राज्य की राजनीति का झरोखा भी हैं। इस खिड़की से नजर आता है सेकुलर भारत का एक ऐसा हिस्सा जहां साफ-साफ मजहबी आधार पर प्रतिनिधित्व के समीकरण बैठाए जाते हैं। एक ऐसा राज्य जहां भूगोल के आधार पर भेदभाव होता है। ऐसी व्यवस्था जहां लोकतंत्र के नाम पर राजा मालामाल हैं और प्रजा लुटी-पिटी है।
दरअसल जम्मू-कश्मीर व्यक्तिगत महत्वा-कांक्षाओं के चलते पोसे गए पागलपन और इससे उपजी बदहाली और आक्रोश का सबसे साफ नमूना है। लेकिन पागलपन के बाद की थकन और स्वस्थ होने की अकुलाहट के लक्षण राज्य में दिखने लगे
हैं। केन्द्र में मजबूत सरकार के गठन के बाद राज्य सत्ता की 'पारिवारिक गिरोहबंदी' तोड़ी जा सकती है, ऐसी आस जनता के मन में जगी है। विधानसभा चुनाव के बाद क्या समीकरण बनेंगे और सत्ता के सूत्र किसके हाथ रहेंगे इसकी टोह लेने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना है कि जनता किस राजनीति में अपना भविष्य देखती है। एक तरफ परिवार हैं, पिस्तौलें हैं, उन्मादी नारे हैं, बारूद है। दूसरी तरफ सामाजिकता के पुल हैं, भविष्य की योजनाएं हैं, देश-दुनिया के साथ कदमताल करने का मौका है। अब यह राज्य की जनता को देखना है कि कट्टरता और अलगाव के ग्लेशियर कैसे पिघलें। घाटी बनाम जम्मू-लद्दाख का अंतर कैसे पाटा जाए। सबको साथ लेकर पूरी ताकत से तरक्की की राह पर बढ़ने की राजनीति पूरे राज्य के विकास के लिए जरूरी तो है लेकिन इस राह पर बढ़ने का फैसला जम्मू-कश्मीर की जनता को ही करना है।