| दिंनाक: 08 Nov 2014 11:52:09 |
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.विजय कुमार
अपने नरेन्द्र भाई ने पहले तो अमरीका में नवाज शरीफ के इरादों पर झाड़ू फेरा, फिर भारत में आकर सचमुच झाड़ू उठा ली। इससे पूरा देश झाड़ूमय हो गया। दो अक्तूबर को मोहल्ले वालों के साथ कुछ देर मैंने भी देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाया और फिर नहा-धोकर शर्मा जी से मिलने चल दिया। वहां बारह बजे भी उनके हाथ में झाड़ू देखकर मैंने उन्हें देशसेवा के इस जुनून के लिए बधाई दी, तो वे बरस पड़े, 'तुम जले पर नमक मत छिड़को वर्मा।'
– क्यों क्या हुआ शर्मा जी?
– होना क्या है ? हमने तो कल ही मोहल्ला साफ कर दिया था, पर सुबह कुछ पुलिस वाले आकर बोले कि नेता जी यहां सफाई अभियान का उद्घाटन करेंगे। इसलिए कुछ कूड़ा यहां होना जरूरी है। झक मार कर हमने फिर कूड़ा यहां डाला। नेता जी तीन घंटे देरी से आये। उनके साथ सैकड़ों लोग थे। कुछ देर झाड़ू हिलाकर उन्होंने फोटो खिंचवाये, फिर सबने सड़क पर ही चाय-नाश्ता किया। इस तमाशे में जो कूड़ा फैला, अब हम उसे समेट रहे हैं।
मुझे शर्मा जी के भाग्य पर ईर्ष्या हुई। काश, नेता जी हमारे मोहल्ले में आते, तो उनके साथ झाड़ू लिये मेरा फेस भी फेसबुक पर चर्चित होकर अखबारों में छपता। फिर सोचा, ठीक ही हुआ कि वे नहीं आये, वरना हमें भी चाय-नाश्ते का प्रबंध और दोबारा सफाई करनी पड़ती।
खैर, शर्मा जी ने स्नान किया। चाय पीकर हमने सोचा कि क्यों न कुछ लोगों से मिलकर इस बारे में उनके भी विचार जान लें। सबसे पहले हम देश की सबसे महान खानदानी पार्टी के कार्यालय पहुंचे। वहां हर दीवार पर गांधी जी टंगे थे। कोने में कुछ झाड़ू भी रखे थे; पर कोई उन्हें छूने को तैयार नहीं था। मैंने एक नेताजी से पूछा, तो वे उबल पड़े, 'झाड़ू लगाना हमारा काम है क्या ? गांधी जी ने इसके लिए जिनसे कहा था, आप उन्हीं से पूछें।'
– पर मोदी ने तो उन्हीं के नाम पर यह अभियान छेड़ा है ?
– तुम यहां मोदी का नाम मत लो। सरदार पटेल के बाद गांधी जी को भी उसने हमसे छीन लिया है। अब उसकी निगाह नेहरू पर है। इन सबके काम उसके खाते में चले गये, तो हमारे पास बस नाम ही बचेगा; और पिछले चुनाव में नाम का जादू भी उतर चुका है।
– पर आप अपने कार्यालय को तो साफ कर ही सकते हैं ?
– हां; पर यह काम हम रात में करेंगे। दिन में किया, तो अखबार वाले फोटो खींचकर हमें भी मोदी का समर्थक बता देंगे।
हमने बसपा के कार्यालय में विशाल सोफे पर अकेली बैठी बहन जी से उनकी राय पूछी, तो वे बोलीं, 'राय क्या खाक बताएं। उ़ प्ऱ में मोदी और अमित शाह ने ऐसी झाड़ू मारी है कि पूरी पार्टी कूड़ेदान में पड़ी सड़ रही है। अब सफाई करने को बचा ही क्या है?'
वहां से निकले, तो केजरीवाल साब धरने पर बैठे मिले। मैंने कहा,'केजरी साब, झाड़ू तो आपका टे्रड मार्क है; पर मोदी इसे भी छीनने की तैयारी में हैं; आप कुछ करते क्यों नहीं हैं?'
– मैं धरना दे तो रहा हूं। जरूरत पड़ी, तो अनशन भी करूंगा। सत्ता तो चली गयी, अब इज्जत के नाम पर चुनाव चिन्ह रूपी एक कपड़ा शरीर पर बचा है, पर ये दु:शासन उसे भी नोच रहा है।'
इतने में ही पंचर साइकिल के साथ जाते कठोर सिंह जी दिखे। शर्मा जी ने उन्हें रोका, तो वे बोले, 'पिछले चुनाव में हमारी साइकिल में इतने पंचर हो गये हैं कि कोई मिस्त्री हाथ लगाने को राजी नहीं है। हम लोगों को बता रहे हैं कि मोदी के हाथ में जो झाड़ू है, उसमें संघ वालों की लाठी भी है। इसलिए सावधान रहें।'
वामपंथियों के कार्यालय में तो मैदान ही साफ था। इस अत्यधिक सफल हड़ताल को देखकर हमने चौकीदार से पूछा, तो वह बोला – झाड़ू के तिनकों की तरह भारत में सैकड़ों वामपंथी गुट हैं। कौन समेटे और कौन लपेटे, इस पर ही विवाद चल रहा है। जनता ने सबको कूड़े में डाल दिया है। एक साल से मुझे वेतन नहीं मिला। आपके पास दस रु़ हों तो दे दो, सुबह से चाय तक नहीं पी है। हमने वहां से खिसकने में ही भलाई समझी। घर पहुंचे, तो दूरदर्शन पर राष्ट्रपति महोदय का संदेश आ रहा था कि देश की प्रगति के लिए सफाई को अपना राष्ट्रीय जुनून
बनाना होगा।
शर्मा जी बोले – क्यों वर्मा, इस संदेश का क्या अर्थ है? – मोदी ने जिस राजनीतिक कूड़े से देश को मुक्त करने का अभियान चलाया था, उसका पहला भाग तो पूरा हो गया। देशभक्त राष्ट्रपति जी शायद अब उसे राज्यों तक पहुंचते देखना चाहते हैं।
शर्मा जी मेरा मुंह ताकने लगे।