| दिंनाक: 08 Nov 2014 12:07:46 |
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एक परिचित ने उस दिन एक बड़ा दिलचस्प वाकया सुनाया। हिमालय की कंदराओं में घूमते-घामते उन्हें एक शांत-निर्जन जगह पर एक साधु दिखा जो बदन पर मात्र छोटी सी दुसूती धोती लपेटे आनन्द से समाधिस्थ था। हिमालय की उस हाड़-गला देने वाली सर्दी में कोई मानव इस तरह खुले बदन बिना विचलित हुए मस्त बैठा है, यह देखकर हमारे शहरी मित्र का हकबकाना स्वाभाविक ही था। रहा न गया तो थोड़ी देर संत केे आंख खोलने का इंतजार किया और फिर पूछा, महाराज, आप इतनी ठंड में खुले बदन कैसे बैठे हैं, मैं तो दो स्वेटर और इस मोटे कोट-मफलर में अकड़ा जा रहा हूं? संत ने मुस्कुराते हुए कंदरा के एक और पड़ी सूखी टहनी का बहुत छोटा सा तिनका उनको खिलाया और कहा, यह इसका कमाल है। मित्र भौंचक्के से अपने शिविर में आकर लेटे ही थे कि पसीने टपकने लगे, एक एक कर कपड़े उतारते गए पर शरीर मानो गर्मी से तप रहा था। यह कमाल किया था उस सूखे डंठल के बहुत बारीक से टुकड़े ने। कैसी गजब की बूटी कि रत्तीभर खा लो और जाड़ा गायब! भारत के गिरि-पर्वत, जंगल, वन-प्रांतर ऐसी विलक्षण जड़ी-बूटियों, औषधियों से भरे पड़े हैं जिनमें एक से एक गुण हैं। गजब की तासीर और रोग को कोसों दूर रखने के रामबाण असर वाले झाड़-पत्तर।
इस बखान के पीछे वजह बस इतनी है कि हम भारत की उस थाती का स्मरण करें, जिसका यशोगान हमारे ग्रंथों-उपनिषदों में भरा पड़ा है और जिसे प्राचीन काल से संतों-ऋषियों ने स्वयं को रोगमुक्त रखने के लिए ही नहीं, बल्कि जन-सामान्य के योग-क्षेम के लिए भी संजोया और प्रसारित किया है। लेकिन दवा-औषध की दरकार पड़े उसके बजाय क्यों न हम अपने आचार-विचार-व्यवहार को परिशुद्ध करें। क्यों न यम-नियम-प्राणायाम-प्रत्याहार को साधते हुए धारणा-ध्यान-समाधि में गहरे उतरें और निरोगी काया पाएं! लेकिन आज मानव जीवन जिस ढर्रे में ढलता जा रहा है उसमें यह संभव है? क्या आज प्रतियोगिता के मर्यादित मायनों को पछाड़ते हुए भागमभाग और आगे निकलने की बौराने की सीमा तक जाती 'मॉडर्न लाइफ' के भौतिकतावादी चौखटे में यह निरोग-शिरोग, आयुष-वायुष जैसे शब्दों के कोई मायने रह गए हैं? गुड़गांव के बहुमंजिला एनआरआई अपार्टमेंट के 27वें माले पर रहने वाले आधुनिक चाल-ढाल के परिवार के लिए योग-आसन के मायने दिल्ली के एक बड़े अंग्रेजी अखबार के चलाए 'राहगिरी' कार्यक्रम में चुस्त कपड़े पहनकर अंग्रेजी धुनों पर बिंदास 'एयरोबिक्स' करना भर रह गए हैं। कभी गांव-बहुल रहे भारत के तेजी से नगर-बहुल होते जाने के पीछे तस्वीर का यह नया रूप उभरना ही था। ऐसा जीवन जहां न खाने का होश है, न पीने का। न शरीर को ध्यान-योग के रास्ते स्वस्थ रखने की चिंता है, न संतुलित-सात्विक भोजन के रास्ते विचार शुद्ध रखने की फुर्सत। कुकुरमुत्तों की तरह हर गली-मोहल्लेे में उग आए 'जिम' की कसरती मशीनों से भले हम खुद को वहम में उलझाए रखें कि सब 'कंट्रोल' में है, लेकिन असल में हमारे महापुरुषों और गं्रथों द्वारा दिखाए रास्ते से इतर हर रास्ता बेमानी ही है। स्वामी विवेकानंद शारीरिक सौष्ठव और निरोगी काया को बड़ा महत्व देते थे। वे कहते थे कि जब तक शरीर बलिष्ठ नहीं होगा, भुजाएं मजबूत नहीं होंगी, नसें ठोस नहीं होंगी तब तक उपनिषद के मर्म को नहीं समझा जा सकता। इसीलिए वेद-उपनिषद-गीता पढ़ने से पहले फुटबाल खेलकर अपना शरीर दमदार बनाओ।
चरक, सुश्रुत और पतंजलि की भूमि में समय समय पर ग्रंथों ने भी कहा है कि सबसे महत्वपूर्ण है निरोगी काया यानी शरीर और मन का स्वस्थ और रोगमुक्त होना। चरक संहिता में कहा गया है-
शरीरं सत्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मत:
तथासुखानां योगस्तु सुखानां कारणं सम:
अर्थात् शरीर और मन रोगों और अस्वस्थता के आधार हैं। जब (शरीर, मन और इंन्द्रिय-विषय का) समान योग होता है, तब स्वस्थता होती है और इनका असमान योग होने से रोग होता है।
हम भारत के लोग योग को खूब अच्छे से जानते हैं। घर-घर में गीता है। गीता में योगेश्वर कृष्ण ने योग का महत्व बताया है। शरीर-मन-बुद्धि में तारतम्यता। तीनों का एक वक्त पर एक जगह रहकर एक बिन्दु पर मिलकर चिंतन। और जो ऐसा करने में सिद्ध हो जाता है वही योगी है, वही भक्ति को, शक्ति को और निरोगी काया को प्राप्त कर सकता है।
जब इतना सब साफ-साफ लिखा है, हम जानते हैं फिर भी गाहे-बगाहे नहीं, अक्सर यह सुनने में आता है कि फलां को महज 30 की उम्र में शुगर है, या फलां 40 का ही है और देखो, दिल की नसें सिकुड़ गई हैं वगैरह, वगैरह। आज शुगर, बी.पी., आर्थराइटिस, दिल या गुर्दे की खराबी, स्पॉन्डिलाइटिस, एपिलैप्सी, एपेंडिसाइटिस आदि बीमारियां बातचीत में आम सुनाई देती हैं और सुनकर कोई खास अचरज नहीं होता। यह रवैया जिंदगी जीने के उस ढर्रे से ही उपजा है जिसमें खान-पान, दिनचर्या में विधान और अपनी सभ्यता-संस्कृति के सम्मान का ध्यान नहीं रखा जाता।
जीवन-चर्या में थोड़ा सा बदल, आचार-विचार में थोड़ा सा संयम और आहार-विहार में सात्विकता निरोगी काया की राह पर बढ़ाती है। भारत सरकार ने नई दिल्ली में चार दिन (6-9 नवंबर, 2014) का विश्व आयुर्वेद सम्मेलन और आरोग्य एक्सपो का जो आयोजन किया उसके पीछे मंशा यही है कि हम भारत के लोग अपने पारम्परिक खान-पान और रोग-निदान को अपनाएं। आयुर्वेद, यूनानी-तिब्बती चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध विज्ञान, कोटक्कल की तैल चिकित्सा….कितनी ही प्रकार की स्वदेशी पद्धतियां हैं रोग-निदान की। इनके बारे में जानें, इन्हें अपनाएं और प्रचारित-प्रसारित करें, यही इस आयोजन के पीछे का भाव है। इस मौके पर पाञ्चजन्य ने भी आरोग्य पर विशेष आयोजन किया है जिसमें ऐसी ही कुछ बातों पर विशेषज्ञों ने प्रकाश डाला है ताकि हमारे बड़े-बुजुगों का 'आयुष्यमान भव' का आशीष फलदायी हो। ल्ल