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कमल हाक
हैदर के जरिए विशाल भारद्वाज ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में जम्मू-कश्मीर के सच को तोड़-मोड़कर अलगाववादियों की मिजाजपुर्सी ही की है। ऐसा करके वह सेकुलर तमगा भले पा लें, लेकिन करोड़ों हिन्दुओं की धार्मिक भावना से खिलवाड़ करने की इजाजत उन्हें किसने दी? वैसे भी ह्यजम्मू-कश्मीर का सचह्ण दिखाने का दम भरने वाले किसी सेकुलर फिल्मकार ने पहले भी कौन सा सच ही दिखाया है, कश्मीरी पंडितों की आह किसे दिखी? हैदर ने तो सभी देशभक्तों को आहत किया है, करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं से खेलने की कोशिश की है। फिल्म में कश्मीर के प्राचीन मार्तण्ड सूर्य मंदिर को शैतान का घर दिखाना किस सोच की उपज है, यह सबकी समझ में आता है। महाराजा ललितादित्य द्वारा बनवाया यह मंदिर विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक अनूठा उदाहरण है, खासकर कश्मीरी पंडितों के लिए बहुत ही पूज्य। इसका वास्तुशिल्प इसलिए भी असाधारण है क्योंकि यह पूरे कश्मीर में एकमात्र उपासना स्थल है जो पश्चिम-मुखी है। आज इस मंदिर के जीर्ण-शीर्ण लेकिन अद्भुत अवशेष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन हैं, जो लगता है उस जगह के दुरुपयोग को लेकर बेपरवाह है, जिसे संभालने, सहेजने की उस पर जिम्मेदारी है।
हिन्दुओं के ऐसे उपासना स्थल को शैतान का अड्डा दिखाना सवाल खड़े करता है। ऐसा क्यों है कि जो चाहे जब चाहे हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ कर लेता है? आखिर हिन्दू से ही उसके धर्म और आस्थाओं से हो रहे योजनाबद्ध खिलवाड़ को मूक बनकर सहते जाने की अपेक्षा क्यों की जाती है? क्या किसी में हिम्मत है कि किसी दूसरे पंथ के उपासना स्थल को ऐसी बेशरमी के साथ अपमानित कर ले और उस पंथ के अनुयायी रोष न प्रकट करें?
कश्मीरी पंडितों के नजरिए से तो हैदर भारत के खिलाफ शैतानी मंशाओं के साथ जारी खतरनाक सोच को ही आगे बढ़ाती है। सूर्य मंदिर को अपमानित करना अपनी तरह का एक अकेला मामला न होकर कश्मीर की हिन्दू विरासत को पूरी तरह नकारने की ओर एक और कदम ही है। 1990 में यहां के अल्पसंख्यक हिन्दुओं को अपने पूर्वजों की माटी से बेदखल करने की घटनाएं कश्मीर के पूरे इस्लामीकरण की शुरुआत भर थीं। लेकिन, दुर्भाग्य कि हमारा देश स्थिति की गंभीरता को आंकने में नाकाम रहा। देश पर इस सभ्यतामूलक हमले को रचने वाले उन्मादी साजिशकर्ता अपने मंसूबों मेंे एक कदम और आगे जाकर कश्मीर की हिन्दू विरासत के प्रतीकों को नेस्तोनाबूद कर रहे हैं। अनंतनाग इस्लामाबाद कहा जा रहा है, शंकराचार्य पहाड़ी तख्त-एक-सुलेमान और हरि पर्वत को अब कोह-ए-मारान कहा जाने लगा है। कश्मीर में शैव मत की महान भक्त कवयित्री लल्लेश्वरी (लाल देद) को लाल आरिफा नाम दिया गया है। कश्मीर के बीते कल को इस कदर झुठलाया जा रहा है कि राजतरंगिणी, नीलमत पुराण को धुंधलाने के साथ ही सतीसर और ऋषि कश्यप के कश्यपमार की गाथाएं भी बदली जा रही हैं।
भारत आमतौर पर कश्मीर से उपजे और हैदर जैसी चीजों से उभारे जा रहे गंभीर खतरे को नजरअंदाज ही करता रहा है। देश बांटने की सोच की पैरवी करने के लिए हैदर की भर्त्सना की जानी चाहिए। एक स्वाभिमानी राष्ट्र के नाते हमें तय करना होगा कि क्या हम इस तरह की चीजों को यूं ही अनदेखा करते रहेंगे?
(लेखक पनुन कश्मीर के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)











