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गुरु पूर्णिमा अध्यात्म की राह पर चलने वालों के लिए बड़ा अहम दिन है। यह एक ऐसा वक्त है, जब इंसान ईश्वरीय कृपा के प्रति पूरी तरह से ग्रहणशील हो जाता है।
साल का यही वह समय है, जब पहली बार आदि-योगी का ध्यान अपने सात यशस्वी शिष्यों पर गया था। यह वह महीना है, जिसमें एक तपस्वी व योगी, जिसका अपने आसपास की चीजों के साथ कोई लगाव नहीं था, उसने भी इन चीजों के साथ जुड़ना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसके अंदर अपने अनुभवों को बांटने की चाह जगने लगी। ज्येष्ठ पूर्णिमा से आषाढ़ पूर्णिमा- जिसे गुरु पूर्णिमा कहा जाता है, इस दौरान शिव सप्तऋषियों से अपना ध्यान नहीं हटा सके। इन सप्तऋषियों को तैयार होने में 84 साल का वक्त लगा था और इस दौरान एक पल के लिए भी शिव ने उन पर ध्यान नहीं दिया। और अब आदि-योगी का ध्यान अपने शिष्यों के प्रति अटूट था।
यह ऐसा महीना था, जिसमें एक पूरी तरह से हृदयहीन तपस्वी भी अपने सात शिष्यों की उत्कट इच्छा को नजरंदाज नहीं कर सका और उसे करुणा आ ही गई। एक ऐसा शख्स, जिसने खुद को इतना ज्यादा कठोर बना लिया था कि किसी की भावना उसे छू भी न सके, आखिरकार ढीला पड़ करुणामय बन गया और एक गुरु बनने को मजबूर हो गया, जबकि उसका ऐसा इरादा बिल्कुल नहीं था। तो इस महीने को गुरु की कृपा पाने के लिए शुभ मुहूर्त के रूप में देखा जाता है। गुरु की कृपा पाने और खुद को योग्य पात्र बनाने के लिए यह अच्छा समय है।
हमेशा एक सवाल सबके मन में होता है कि कृपा पाने के लिए मैं क्या करूं। अगर आप कुछ न करें और खुद को खाली कर पाएं यानी आपके अंदर का 'मैं' हट जाए, तो ग्रहणशील बनने का यही सबसे अच्छा तरीका है। साधना को कुछ ऐसा बनाया ही जाता है कि आप हर रोज उसका अभ्यास करने में कुछ इस तरह से डूब जाएं कि आपको याद ही न रहे कि आप कौन हैं। आप भूल जाते हैं कि आप क्या हैं। आपको पता नहीं रहता कि आपके जीवन का मतलब क्या है।
जेन पद्धति में मानवीय चेतना के विकास से जुड़ी एक बड़ी खूबसूरत कहानी है। एक शिष्य जेन गुरु के पास जाता है और पूछता है, 'अपने आध्यात्मिक विकास के लिए मैं क्या करूं?' गुरु जवाब देते हैं, 'झाड़ू लगाओ, लकड़ी काटो, भोजन बनाओ, बस।' यह सुनकर शिष्य कहता है, 'यह सब करने के लिए मुझे यहां आने की क्या जरूरत है? यह तो मैं घर पर भी कर सकता हूं।'
लेकिन अगर तुम अपने घर में झाड़ू लगा रहे हो, तो यह तुम्हारा खुद का घर है। अगर पड़ोसी का घर गंदा पड़ा है, तो तुम उसे साफ नहीं करोगे। लकड़ी काटना और भोजन बनाना तुम्हारी अपनी जरूरतों के लिए होगा या उनके लिए होगा, जिन्हें तुम अपना मानते हो। ऐसे में तुम जो भी काम करोगे, वह तुम्हारी पहचान को और मजबूत करेगा, अहं को और विस्तार देगा, बजाय इसके कि वह तुम्हारे अहं व तुम्हारी पहचान को खत्म कर दे कि तुम कौन हो। अपने कमोंर् को अपने लिए बंधन बनाने या फिर मुक्ति का जरिया बनाने में बस इतना ही अंतर है। या तो आप कमोंर् को अर्जित कर रहे हैं या आप उन्हें योग की तरह कर रहे हैं। या आप तमाम काम खुद के विस्तार के लिए करते हैं या अपने अहं को विलीन करने के लिए। बस यही अंतर है।
होना यह चाहिए कि झाड़ू लगाने, खाना बनाने या पेड़ों को पानी देने जैसे सभी काम अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए हों। पेड़ों को पानी देने का मकसद यह न हो कि उनकी छाया में सिर्फ आप या आपके बाल-बच्चे बैठें, पानी आप इसलिए दें कि कोई भी, यहां तक कि आपका दुश्मन भी उनकी छाया में बैठ सके। आप आम का पेड़ लगा रहे हैं, तो यह सोचकर लगाएं कि आपका दुश्मन और उसके बच्चे भी उस पेड़ के आम खा पाएं। अगर आप ऐसे काम कर रहे हैं, तो यही काम आपका अहं खत्म करने में मददगार बन जाएगा। नहीं तो आपका हर काम आपको बंधन में ही डालने का काम करेगा।
गुरु पूर्णिमा जैसा, शिष्य आषाढ़ जैसा : ओशो
ये कर्म ही हैं, जो लोगों को फंसा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम काम करने की अपनी क्षमता का प्रयोग खुद को बंधनों में जकड़ने के लिए कर रहे हैं। अपनी बुद्धि के इस्तेमाल से अपने कष्टों को ही बढ़ा रहे हैं। ऐसा करके अनजाने में ही आप अपनी ही क्षमताओं के दुश्मन बन जाते हैं। इसीलिए ऐसा करना गलत है। इस तरह से अगर आप अपनी क्षमताओं और बुद्धि का ही विरोध करेंगे, तो आप पिछड़ जाएंगे। आप आगे नहीं बढ़ पाएंगे। आपका विकास नहीं होगा, बल्कि आप एक निम्न जीवन की ओर चले जाएंगे। तो यह महीना कृपा पाने का है। गुरु-कृपा तो आपके विकास के लिए खाद का काम करती है। कृपा से इंसान खुद को अस्तित्व के एक अलग आयाम में ले जाता है, जहां वह अपनी क्षमताओं और संभावनाओं के एक नए आयाम में प्रवेश करता है। अब सवाल है कि कृपा का इस्तेमाल करने के लिए हम क्या करें? करने को कुछ नहीं है। जिस चीज को आप 'मैं' कहते हैं, उसे जितना कम करेंगे, आपकी कृपा तक पहुंच उतनी ही ज्यादा होगी।











