| दिंनाक: 28 Jun 2014 17:28:27 |
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भारत की जनता ने 2014 के लोकसभा चुनावों में जो जनादेश दिया है उससे बुद्घिजीवियों के उस समुदाय में खलबली मची हुई है जो अब तक इस देश के जनमानस को सबसे बेहतर तरीके से समझने का दावा करता रहा है। यूरोपीय शिक्षा पद्घति की बेकरी में से निकला बुद्घिजीवियों का यह समुदाय आज तक सत्ता के दरबार में इंडिया ही भारत का प्रतिनिधि होने का दावा करता हुआ सारी दुनिया को धोखा देता रहा। लेकिन इस बार भारत के श्रमजीवियों ने एकजुट होकर इंडिया के शासकों को पराजित कर दिया। लेकिन जनता की जीत के बावजूद, उखड़ चुके सत्ता दरबार के कथित बुद्घिजीवियोंं का प्रलाप अब भी जारी है।
अभी भी 'मैं न मानूं' के भाव से जब समाचार पत्रों में अरुन्धति राय, हर्ष मन्दर, तीस्ता सीतलवाड, कुलदीप नैयर, राजेन्द्र सच्चर, प्रफुल्ल बिदवई, सीमा मुस्तफा, आनन्द सहाय, सतीश जेकब, अनुराधा शेनाय, मेधा पाटकर इत्यादि की सेकुलर फौज विभिन्न विषयों पर यूरोपीय अवधारणाओं की जूठन की जुगाली करती दिखाई देती है। पश्चिम के ऐसे प्रत्यक्ष-परोक्ष पैरोकारों ने अपने अपने एन. जी. ओ. बना रखे हैं। उनकी विदेशी पैसे से समय समय पर लिपाई-पुताई होती रहती है।
हाल ही में हर्षमंदर, जो कभी सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के नवरत्नों में रह चुके हैं, असम में विभिन्न समुदायों में दरार बढ़ाने के लिये कलम घिसते देखे गये। असम में बढ़ते अवैध बंगलादेशी मुसलमानों के लिए उनका दर्द छलक आया। स्थानीय लोगों को परे धकेल कर संसाधनों पर कब्जा करते बंगलादेशी मुसलमान अनेक स्थानों पर स्थानीय लोगों को ठेलते हुए बहुसंख्यक हो गए हैं, वे असम के सत्ता प्रतिष्ठानों में भी पहुंच रहे हैं। लेकिन हर्षमंदर की जमात को यह स्थापित करना है कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा। ये सब बंगलादेशी तो उन्नीसवीं शताब्दी से ही वहां कानूनी तरीके से बसे हुये हैं। इन बुद्धिजीवियों के पास तर्क के नाम पर केवल थोथी जिद है।
असम के बोडो जनजाति के क्षेत्रों में बसे बोडो लोगों में इन घुसपैठिए बंगलादेशियों को लेकर गुस्सा और उत्तेजना है। गुस्से का कारण यह भी है कि सोनिया कांग्रेस की सरकार स्थानीय बोडो क्षेत्रों में वोटों के लालच में इन बंगलादेशियों को बसाने में मदद करती रहती है। बोडो लोगों और अवैध बंगलादेशियों में कुछ अरसे पहले टकराव हो गया था। उसमें दोनों पक्षों को नुकसान हुआ था और अनेक लोग मारे गये थे। यदि कोई व्यक्ति सचमुच इस स्थिति से दुखी हो, तो जाहिर है कि वह निदार्ेष लोगों की मृत्यु पर दुख प्रकट करने के बाद यह कहेगा कि अवैध बंगलादेशी मुसलमानों की शिनाख्त करने के बाद उनको वापस उनके देश भेजा जाये। लेकिन आजकल हर्षमंदर और उनके सेकुलर साथियों का तो गुप्त एजेंडा दूसरा है और वह यह है कि अखबारों में उपन्यासनुमा शैली में लिखो कि बोडो क्षेत्र के स्थानीय लोगों ने किस प्रकार मुसलमानों पर अमानवीय अत्याचार किये। भावुक शैली में इसलिये ताकि पाठकों के मन में बंगलादेशी मुसलमानों के पक्ष में करुण रस पैदा किया जा सके और स्थानीय बोडो लोगों के प्रति घृणा पैदा की जा सके। हर्षमंदर प्रशासनिक सेवा में भी रह चुके हैं और सोनिया गांधी की दरबारी सलाहकार परिषद के भी नूरे-नजर रहे हैं, इसलिये इतना तो जानते ही होंगे कि उनके इन कारनामों से बोडो लोगों के मन में भी गुस्सा भड़क सकता है और स्थितियां और भी खराब हो सकती हैं। तो आखिर वे यह सब क्यों कर रहे हैं? यदि उन्हें सचमुच लगता था कि इन अवैध बंगलादेशी मुसलमानों(जिन्हें वे केवल मुसलमान कहना पसन्द करते हैं) के साथ यहां के बोडो जनजाति के लोग(जिन्हें वे आतंकवादी या उग्रवादी कहना पसन्द करते हैं) अमानवीय व्यवहार करते हैं, तो उन्हें उन बोडो लड़कियों की कथा का भी उसी शैली में वर्णन करना चाहिये था जिनके साथ उनके इन 'मुसलमानों' ने बलात्कार ही नहीं किया बल्कि उनकी बाद में दरिंदगी से हत्या भी कर दी।
आज जब उच्चतम न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालयों तक और राज्यपाल से लेकर राज्य के पुलिस प्रमुखों तक ने माना है कि असम इन अवैध बंगलादेशियों की बाढ़ में डूब कर अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देने की ओर बढ़ रहा है तब भी हर्षमंदरों की टोली यही स्थापित करने में लगी हुई है कि ये बंगालादेशी मुसलमान तो शताब्दियों से यहीं बसे हुये थे। पिछले दिनों यह रहस्योद्घाटन हुआ था कि कुछ एन. जी. ओ. विदेशों से पैसा लेकर भारत में इस प्रकार की गतिविधियों में लगे हुये हैं जिससे भारतीय हितों को नुकसान पहुंचता है। विभिन्न भारतीय समुदायों में घृणा भाव पैदा होता है। सोनिया गांधी के नेतृत्व में बनी सलाहकार परिषद, जिसका करोड़ों रुपये का खर्चा भारत के सर्वहारा वर्ग (सर्वहारा का अर्थ तो हर्षमंदर अच्छी तरह जानते ही होंगे) के खून पसीने की कमाई में से खर्च होता था, के नवरत्नों की एनजीओ का खुलासा ही नहीं किया जाना चाहिये बल्कि उनके धन-स्रोतों की छानबीन भी की जानी चाहिये। इन के सूत्र अन्दर ही अन्दर कहां कहां जुड़े हुये हैं और उनकी गतिविधियां कैसे परस्पर सहयोग से संचालित होती हैं, इसकी भी जांच भारत सरकार को करवानी चाहिये ।
अभी तक सभी के ध्यान में ही होगा कि अमरीका में गुलाम नबी फाई द्वारा आयोजित सेमिनारों में जा-जाकर जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान की ही भाषा बोलने वाले भारतीय पत्रकारों के तब कपड़े तर हो गये थे जब यह खुलासा हुआ था कि फाई के ये सारे तथाकथित बौद्घिक सेमिनार पाकिस्तान की आई. एस. आई. द्वारा ही संचालित होते थे। यह अलग बात है कि इस रहस्योद्घाटन के बाद कपड़े भीग जाने को भी इन विद्वानों ने अपनी बौद्घिक शूरता कह कर प्रचारित करना शुरू कर दिया था। देखते रहिए, राजदरबार से ताजा-ताजा बेदखल हुये इन तथाकथित बौद्घिक शूरों की जमात अभी और आग उगलेगी। लेकिन देश की मेहनतकश जनता को सावधान रहना होगा ताकि नफरत फैलाने के अपने अभियान में यह बिरादरी सफल न हो सके। -डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री