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आवरण कथा –
उत्तर प्रदेश में इन दिनांे कानून व्यवस्था को जंग लग चुकी है। महिलाओं के साथ बढ़ती बलात्कार की घटनाएं, सांसद व नेताओं पर जानलेवा हमले और पुलिस की वर्दी से खिलवाड़ करने का सपा सरकार में मानो चलन सा हो गया है। ऐसे में दो साल पूर्व सपा सरकार को बहुमत दिलाने वाली प्रदेश की जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है। लोकसभा चुनावों में यूपी की जनता अपना फैसला सुना चुकी है। यदि यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं कि जब बिगड़ती कानून व्यवस्था को लेकर उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह से पाञ्चजन्य संवाददाता राहुल शर्मा की बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत
उत्तर प्रदेश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था को क्या आप सरकार की विफ लता मानते हैं?
निश्चित तौर पर इस समय उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। बलात्कार जैसे संवेदनशील मसलों पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का यह कहना कि 'अकसर युवाओं से गलती हो जाती है,' यह काफी कष्टदायक है। प्रदेश की जनता ने सपा को पूर्ण बहुमत देकर सत्ता में पहंुचाया है, लेकिन जब सरकार या उसमें बैठे मुखिया जनता की परेशानी से मंुह मोड़कर अपनी जवाबदेही से बचते हैं तो वाकई यह गलत है। सरकार की अपराधियों और खासकर यादव जाति को लेकर तुष्टीकरण की नीति अपनाना न्यायसंगत नहीं है। अपराधी का मतलब अपराधी ही होता है फिर वह चाहे किसी भी जाति विशेष से संबंध क्यों न रखता हो।
ल्ल वर्तमान में प्रदेश में बढ़ते अपराधों को लेकर आपका कोई सुझाव या नीति है जिससे तुरंत अपराध या अपराधियों पर काबू पाया जा सके?
सबसे पहले हमें यह तय कर लेना चाहिए कि हम कानून और संविधान के दायरे में रहकर पूरी निष्ठा से कार्य करेंगे। हमारे संविधान में पुलिस को अपराधियों पर नकेल कसने के लिए पर्याप्त शक्तियां दी गई हैं। फिर चाहे उसका उल्लंघन करने वाला कोई विशिष्ट व्यक्ति ही क्यों न हो उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। यदि अपराधी को पकड़ने से पूर्व पुलिस अधिकारी मंत्री या बाहुबलियों से अनुमति लेंगे तो फिर कानून का पालन किसी सूरत में नहीं हो सकता है। सरकार को चाहिए एकसूत्रीय योजना बनाकर सबसे पहले प्रत्येक थाना क्षेत्र के टॉप 10 और जिले के 50 अपराधियों की सूची तैयार कर उनकी धरपकड़ शुरू करे। इन पर गैंगस्टर, मकोका, रासुका व गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई करने के साथ-साथ इनकी संपत्ति आदि कुर्क की जाए। साफ शब्दों में जब तक अपराधी के मन में पुलिस का भय नहीं होगा तब तक कानून की धज्जियां उड़ती रहेंगी। सरकार को चाहिए कि बलात्कारी, देशद्रोही और गंभीर अपराध की रोकथाम के लिए विशेष प्रकोष्ठ बनाए और अधिकारियों को तय समय-सीमा में मामले को सुलझाने का निर्देश दे। साथ ही ऐसे मामलों में पीडि़त को त्वरित न्याय दिलाने की व्यवस्था करे।
ल्ल हाल ही में समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर खूब चर्चा रही है कि सपा सरकार में 'यादववाद' को प्रमुखता दी जाती है, क्या इससे दूसरे समुदाय से संबंध रखने वाले अधिकारियों के मनोबल पर प्रभाव पड़ता है?
उत्तर प्रदेश में लगातार बिगड़ती कानून-व्यवस्था की चर्चा देश ही नहीं, बल्कि विदेश के 'लंदन टाइम्स' जैसे अखबारों में प्रमुखता से छप रही हैं। आज यूएनओ तक भारत के इस राज्य की चर्चाओं से अछूता नहीं है। मैंने स्वयं पढ़ा है कि प्रदेश में 60 फीसदी पुलिस थानों में यादव समुदाय के लोगों की तैनाती की गई है। ऐसा करने से योग्य अधिकारी पीछे रह जाते हैं और उनकी मैरिट का कोई मायने नहीं रह जाता है। एक बार अधिकारियों के मनोबल पर कुप्रभाव पड़ने लगे तो उससे उबर पाना संभव नहीं रह जाता है। देश में सबसे कम उम्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहंुचने वाले अखिलेश यादव को सोचना चाहिए कि समय रहते वे जनता के हित में कार्य करें क्योंकि सत्ता के आसपास घूमने वाले चाटुकारों को खुश कर वे जनता में कम हो रही अपनी साख को नहीं बचा सकेंगे। यदि उन्होंने अभी भी सख्त निर्णय कर जनता का दिल जीत लिया तो बिगड़े हालात सुधरने में अधिक समय नहीं लगेगा। लेकिन आज दुर्भाग्य से सपा नेता पुलिस की वर्दी फाड़ रहे हैं और देशद्रोही जेल में बंद होने की बजाय खुले घूम रहे हैं। सरकार अपराधियों के वोट बैंक को ध्यान में रखकर ढील बरत रही है। नेताओं के कहने पर पुलिस अधिकारियों को जब चाहे हटा दिया जाता है, इस तरह से अपराध या अपराधियों को कभी काबू नहीं किया जा सकता।
ल्ल उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया के रूप में आपने विभाग को बहुत करीब से जाना है, क्या अधिकारियों में समय के साथ इच्छाशक्ति की कमी आप महसूस करते हैं?
देखिए मैंने जून, 2007 से सितम्बर, 2009 तक उ.प्र. पुलिस के महानिदेशक का पदभार संभाला था। मैंने कदाचार के आरोप में लिप्त 555 पुलिसकर्मियों को न केवल निलंबित किया, बल्कि उन्हें बर्खास्त कर दिया। विभाग में बिना सख्त निर्णय लिए आप अपना संदेश पूरे विभाग को नहीं दे सकते हैं। मैंने अपने कार्यकाल में उ.प्र. के दो कैबिनेट मंत्रियो, दो सांसदों और तीन विधायकों को जेल भेजा, उस समय राजनीतिक दबाव काफी था, लेकिन मैंने कानून के दायरे में रहकर जो भी उचित व आवश्यक था उसका निर्वाह किया। आज उसी तरह पुलिस अधिकारियों को कार्य करने की जरूरत है। पुलिस अधिकारियों को चाहिए कि वे निर्भय होकर कार्य करें, यदि कभी राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते कोई पोस्टिंग खराब हो भी जाए तो भी उन्हें निश्चिंत रहना चाहिए क्योंकि उनका भविष्य जरूर सुनहरा बनेगा।
ल्ल देखने में आता है कि निचले स्तर पर पुलिस पीडि़तों की सुनवाई नहीं करती है और अधिकारियों तक उनकी पहंुच नहीं होती है, इस व्यवस्था में कैसे सुधार किया जा सकता है?
हमें सबसे पहले पीडि़त व उसके परिवार के प्रति संवेदना रखनी होगी। वरिष्ठ अधिकारियों को चाहिए कि वे घटनास्थल पर स्वयं पहंुचने की कोशिश करें जिससे निचले अधिकारी या कर्मचारी उन्हें गुमराह न कर सकें। बेशक एक दिन में चाहे दूर-दराज के इलाकों में अपराध हो, अधिकारियों को सभी जगह पहंुचना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना होगा कि पीडि़त को न्याय मिले और वह दर-दर भटकता न रहे। यदि पुलिस अधिकारी अपने पद की गरिमा और कर्तव्य को ध्यान में रखकर कार्य करंेगे तो निश्चित ही जनता और पुलिस के बीच बढ़ती दूरी कम हो सकेगी। ल्ल











