| दिंनाक: 21 May 2014 12:33:43 |
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मेरठ को देशभर में जहां 10 मई, 1857 की क्रांति के उद्गम के रूप में जाना जाता है, वहीं इस बार उत्तर प्रदेश सरकार की निष्क्रिय पुलिस की उपस्थिति में दंगाइयों ने हिंसा का तांडव मचाया। गोली चली, पत्थरबाजी हुई, लेकिन दंगाई और पुलिस एक ही पाले में खड़े दिखाई दिए।
मेरठ का गुदड़ी बाजार वही स्थान है, जहां स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर पर 1939 में हमला हुआ था, जब वे अपनी रिहाई के बाद देशभ्रमण करते हुए पहली बार यहां पहंुचे थे। उस समय भी मेरठ में दंगा भड़क गया था। वहीं तीरगरान मोहल्ला सैकड़ों वर्ष पुराने जैन व भैरव मंदिर के लिए जाना जाता है। इन्हीं मंदिरों के पास एक प्राचीन बंद कुआं है जिसके समीप कुछ भूमि विवादित है। यहां वर्ष 1952 के बाद से कोई भी निर्माण करना निषेध है। 10 मई को इसी भूमि पर मुसलमानों ने करने की कोशिश की थी जिसका विरोध करने पर उन्होंने हिंसा फैला दी।
पत्रकारों को बनाया निशाना
मेरठ में दंगाइयों ने बाजार में लूटपाट के दौरान गोलीबारी की और यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ। हिंसा के दौरान मेरठ के पुलिस अधीक्षक ओमप्रकाश सिंह ने माइक से अपील कर दंगाइयों से कहा कि वे सभी भाग जाएं वरना उनकी तस्वीर प्रेस फोटोग्राफरों के कैमरे में कैद हो गई है। इस आधार पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी, इस पर दंगाइयों पत्रकार और उनके साथ मौजूद फोटोग्राफरों को भी नहीं छोड़ा। इस दौरान 10 पत्रकार घायल हो गए।
पुलिस का पक्षपातपूर्ण रवैया
पुलिस की निष्क्रियता के चलते ही पीडि़त पक्ष को आत्मरक्षा के लिए पथराव करना पड़ा। लगभग 2 घंटे तक चले इस घटनाक्रम के बाद दंगाइयों की ओर से पहले पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। साथ ही भाजपा व युवा मोर्चा के नेताओं को उसमें नामजद करने के लिए दंगाइयों से लोगों की जानकारी मांगी। वहीं शुभम रस्तोगी के परिजन जब नामजद शिकायत लेकर पहंुचे तो उसे फाड़ दिया गया और अज्ञात के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया।
काले कपड़ों वाले शूटर
मेरठ हिंसा में काले रंग के कपड़े वाले शूटर चर्चा में हैं, जो कि प्रशिक्षित ढंग से गोलीबारी कर रहे थे। सूत्रों के मुताबिक इनमें गुदड़ी बाजार में रहने वाला एक बसपा नेता बताया जा रहा है, जो कि पूर्व सांसद व महापौर भी रह चुका है। ल्ल अजय मित्तल