होठों पे ऐसी बात मैं दबा के चली आयी…
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मना करते-करते भी आखिर युद्घ क्षेत्र में स्वयं उतरना ही पड़ गया। गए वह जमाने जब राखी के कच्चे धागे में बहन की लाज निभाने के लिए जीवन न्योछावर कर देने का आश्वासन समाहित रहता था। यहां तो भैया स्वयं गाय की तरह सीधा निकला। खुद अपनी लाज बचा ले काफी है। थोड़ी देर किसी तगड़े न्यूज चैनल के एंकर को झेलना पड़ जाए तो हकलाने लगता है। कुरते की बांहें समेटने में ऐसा उलझ जाता है कि मैं स्टूडियो के कोने में छिपकर बैठी थक जाती हूं। वो मेरी तरफ देखना भी भूल जाता है। मेरी उपस्थिति की सुध आती भी है तो परेशानी में मेरे इशारे समझ नहीं पाता। उस दिन कितना कुछ रटा, समझा कर भेजा था पर वो चिटके हुए ग्रामोफोन रिकार्ड की तरह एक जगह अटक जाता था। पार्टी के विषय में पूछा गया तो बोला ह्यपार्टी है कहां, वह तो एक आइडिया है।ह्ण पता नहीं अभिषेक बच्चन से सीख कर आया था क्या ये आइडिया वाली बात। मुझे तो इतना गुस्सा आया कि मैंने उसे एक झापड़ दिखाया चल घर, तुझे बताती हूं। पर वो मेरा इशारा गलत समझ गया। मेरे झापड़ को देखकर कहने लगा ह्यहम स्त्रियों को सशक्त बनाना चाहते हैं।ह्ण मैं पूछती हूं इस देश में जहां दादी ने सौ करोड़ लोगों पर निरंकुश राज किया, जहां एक बहन जी को सरकार चलाने में सहायता देने का मूल्य सी. बी. आई के मुंह पर ताला लगाकर चुकाना पड़ता है, जहां ममता निर्ममता से अपनी हर जिद पूरी करवाने के लिए काली कलकत्तेवाली का रूप धारण कर लेती हैं, महिला सशक्तीकरण की जरूरत कहां है? होती तो संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण न हो जाता?
महिला सशक्तीकरण की बात पर मां के स्वास्थ्य का ध्यान आता है। उनका स्वास्थ्य अपेक्षा रखता है कि उनकी मदद के लिए भी कोई आये। बस इतनी सी तमन्ना थी कि भैया के लिए मनमोहन चाचा सीट गरम रखें। पर भैया तो हर क्षेत्र में देर कर रहा है। अब जाकर बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ कि चाचा की गरमाई हुई सीट पर बैठेगा तो वह सीट तवे की तरह तप रही है। किसी तरह बैठ भी पाए तो क्षण भर में ही उचक कर भागेंगे। कहीं उसका अधोभाग झुलस न जाए! खैरियत है, अहमद पटेल चाचा से लेकर दिग्विजय चाचा तक सभी कहते हैं कि अब इसका कोई खतरा है ही नहीं।
जो भी हो, मुझे तो अपना कर्तव्य पूरा करना है। राखी का धागा जो मैं भैया की कलाई पर बांधती हूं कह रहा है ह्यपुराने रिवाज छोड़ो। चलो तुम उसकी लाज बचाओ।ह्ण दादी शान्ति निकेतन के दिनों की बातें करती थीं, तो गुरुदेव की वह कविता याद करती थीं, जिसमें डूबते सूरज को नन्हा दीया आश्वासन देता है कि उसके जाने के बाद धरती को प्रकाशित करने की जिम्मेदारी वह संभाल लेगा।
मुझे पता है दीये की तरह मुझे भी केवल अपनी आत्मा को संतुष्ट करना है। इतना गहरा अन्धेरा मैं अकेले कहां मिटा पाऊंगी? और मेरे सामने तो मम्मी और भैया की लाज बचाने के अतिरिक्त ह्यइनकीह्ण भी जिम्मेदारी आ पड़ी है। अब दो चार लाख से सात सौ करोड़ कैसे बनाए मैं कैसे समझाऊंंगी। जमीन जायदाद और स्विस बैंक का चक्कर मैं क्या जानूं। मैं तो इन तीनों से यही कहती हूं जानूं तो जानूं बस इतना कि मैं तुम्हंें अपना मानूं रे।
मुझे अमेठी, रायबरेली की गरम लू इतनी बुरी नहीं लगती क्यूंकि इन्ही दिनों वहां दशहरी आम फलते हैं, जो लखनऊ , मलिहाबाद के दशहरी जैसे ही स्वादिष्ट होते हैं। पर अब तो आम का नाम लेना भी पाप है। जाने उस सिरफिरे को क्या सूझी कि अपनी पार्टी का नामकरण आम से कर डाला। फिर नादानी में इनके मुंह से निकला हुआ ह्यमैंगो पीपुलह्ण लोगों को खल गया। अब मैंगो हो या आम मैं तो उनके बारे में सोचती भी नहीं। बस सोचती हूं कि लोग मेरी इस रणक्षेत्र में उपस्थिति मात्र से रोमांचित होकर कहेंगे ह्यया देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:़ह्ण उफ्, फिर गलती हो गयी, फिर उस परम शत्रु का नाम मुंह से निकल गया। भैया को ऐसी गलतियों के लिए डांटने की सोच कर आयी थी। ये अब मुझे क्या हो गया है। क्या अन्दर की घबराहट मेरी जुबां पर आ रही है?ल्ल











