आवरण कथा
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अगर खबर में कांग्रेस पार्टी का जिक्र न होता, तो पहली नजर में यही लगता कि यह घोषणा मुस्लिम लीग ने की है। दरअसल, कांग्रेस ने एक अतिरिक्त घोषणापत्र जारी किया है। विगत मार्च महीने में ही उसने अपना घोषणापत्र जारी किया था। लेकिन उससे भी उसका पेट नहीं भरा और उसने पूरक घोषणापत्र देश के सामने पेश कर दिया। सवाल अतिरिक्त घोषणापत्र पेश करने का नहीं है। कांग्रेस पार्टी के पास एक से अधिक घोषणापत्र जारी करने का अधिकार है। असली सवाल यह है कि उस घोषणापत्र में क्या कहा गया है, जिससे देश में चिंता पैदा होने लगी है? क्या वह देश के संवैधानिक ढांचे के अनुकूल है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस कोई छोटी पार्टी नहीं है, बल्कि सत्ताधारी दल है! ऐसा सत्ताधारी दल है, जिसके हाथ में पिछले 10 वर्षों से देश की बागडोर है। वैसे कांग्रेस खुद को ऐतिहासिक पार्टी होने का दावा करने से पीछे नहीं रहती। इसलिए उससे अपेक्षा की जाती है कि वह देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझेगी। पर क्या उसने जिम्मेदारी का निर्वहन किया है? अगर कांग्रेस संविधान द्वारा तय प्रावधानों से भटक रही है, तो क्यों? क्या यह सब आकस्मिक है?
सांप्रदायिकता का घोषणा पत्र मुस्लिम लीग की राह पर कांग्रेस
कांग्रेस के इस घोषणापत्र में तीन बातें महत्वपूर्ण हैं- एक, पिछडे़ मुसलमानों को आरक्षण दिया जाएगा। दो, मुस्लिम बहुल इलाकों को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित नहीं किया जाए। तीन, इस्लाम और ईसाई पंथ के कथित वंचितों को वंचित का दर्जा दिया जाएगा। इन तीनों बातों का अगर गहराई में विश्लेषण किया जाए, तो इसके गंभीर निहितार्थ उभरकर सामने आएंगे, जो देश के सेकुलर ढांचे के लिए खतरा है। इसमें कांग्रेस ही अकेली पार्टी नहीं है। खुद को सेकुलर होने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी भी इसमें पीछे नहीं है। यह वही समाजवादी पार्टी है, जो अपने को पिछड़ों का मसीहा बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती। वंचितों की रहनुमाई करने वाली बसपा ने जरूर कुछ टिप्पणी की है, लेकिन वह प्रतीकात्मक ही ज्यादा है। भाजपा ने इसके प्रति अपना पुरजोर विरोध जरूर प्रकट किया है। लेकिन बाकी दलों का व्यवहार तो ऐसा रहा, मानो कुछ हुआ ही नहीं है। जाहिर है चुनाव के इस माहौल में कोई ह्यसेकुलर वोटह्ण गंवाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहेगा। लेकिन चुप रहने के भी अपने खतरे हैं, जिसकी कीमत इन दलों को आज नहीं, तो कल चुकानी पड़ सकती है। पर अपने आपको सेकुलर होने का दावा करने वाले पाखंडी बुद्धिजीवियों की ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि वे इस पर चुप हैं? क्या सत्ता के साथ इनका स्वार्थ जुड़ा हुआ है?
बहरहाल, ह्यपिछड़े मुसलमानोंह्ण को शैक्षणिक संस्थाओं और नौकरियों में आरक्षण देने की घोषणा का मतलब क्या है, जबकि मंडल आयोग के तहत इन्हें पहले से ही आरक्षण की सुविधा प्राप्त है। इनको उनके सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ेपन के कारण आरक्षण दिया गया है, लेकिन उनके कोटे में मुसलमानों के लिए अलग से 4.5 प्रतिशत आरक्षण का मतलब उनको अलग सांप्रदायिक पहचान देना है। आखिर यह बात अब क्यों उठाई जा रही है? मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के समय यह बात क्यों नहीं उठाई गई? इसके लिए पिछले 20 वर्षों में कांग्रेस पार्टी की अंदरुनी सेहत और मुस्लिम समाज में आए बदलाव पर ध्यान देने की जरूरत है। अस्सी के दशक में ही इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी सांप्रदायिक राजनीति की ओर बढ़ चली थी। जो इंदिरा सत्तर के दशक में ह्यगरीबी हटाओह्ण की बात करती थीं, अस्सी के दशक में सत्ता में वापस आने के बाद लोकप्रिय राजनीति की जगह प्रबंधन की राजनीति करने लगी थीं। नतीजा था सांप्रदायिक राजनीति। सोनिया गांधी के काल में कांग्रेस की यह समस्या और घनीभूत हो चुकी है। मुसलमान और दलित उनसे दूर जा रहे हैं। दलितों की तो इन्हें चिंता नहीं है, लेकिन मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए इसने कई नए कदम उठाए। दूसरी ओर मुसलमानों की बेहतर होती आर्थिक और शैक्षिक हालत उनमें अपने सामुदायिक अधिकारों के प्रति आग्रहशील बना रही थी। उनमें ऐसा नेतृत्व उभर नहीं पा रहा था कि वह अपने समुदाय की बेहतरी संबंधी आकांक्षाओं को सेकुलर धरातल तक सीमित रख सके। जातीय आरक्षण से उसे लग रहा था कि उनकी एकता खंडित हो रही है। इसलिए वे कोटा के भीतर उप कोटा की ओर बढ़ चले। यह सांप्रदायिक राजनीति का आधार है, क्यांेकि पिछडे़ मुसलमानों को आरक्षण तो पहले से मिल ही रहा था।
मतांतरण को मिलेगा बढ़ावा
दरअसल, 2004 में सत्तारूढ़ होते ही कांग्रेस नीत संप्र्रग सरकार धड़ाधड़ और चुपचाप ऐसे फैसले ले रही थी, जो देश की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए भविष्य में खतरा पैदा करते। अपनी सांप्रदायिक राजनीति को छिपाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने आयोगों और समितियों का सहारा लिया, ताकि जनता को दिखाया जा सके कि विद्वान लोगों की सिफारिश पर वह ऐसा कदम उठा रही है। कई आर्थिक फैसलों के पीछे कुछ समितियों आदि का हाथ रहा है। यहां पर कांग्रेस ने राष्ट्रीय धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यक आयोग (2007) की सिफारिश का भरपूर सहारा लिया। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र, जो कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा के सदस्य बनाए गए थे, इस आयोग के अध्यक्ष थे। रंगनाथ मिश्र आयोग में अल्पसंख्यक सदस्यों का बहुमत था। ऐसा लगता है कि कांग्रेस नीत सरकार ने इस पूर्व धारणा के आधार पर आयोग का गठन किया था कि अल्पसंख्यकों के मामलों से बहुसंख्यकों का क्या संबंध है। अगर आयोग केवल अल्पसंख्यक समाज के हितों को ध्यान में रखकर सिफारिश करेगा, तो संभव था कि इससे बहुसंख्यकों का हित प्रभावित होता। अगर इस आयोग में बहुसंख्यक समुदाय के हितों के साथ सामंजस्य बनाए रखने वाले सदस्य होते, तो क्या आयोग का निष्कर्ष ऐसा ही होता? आयोग ने केवल अल्पसंख्यकों के हितों को ध्यान में रखकर सिफारिश की थी। ध्यान देने की बात है कि आयोग की सदस्य सचिव आशा दास ने दलितों के सवाल पर आयोग की राय से असहमति जताई थी। आयोग ने बहुमत से उनकी बात को खारिज कर दिया था। यहीं पर आयोग की सिफारिशों की नैतिक ताकत कमजोर हो गई थी। यह बहुसंख्यक समुदाय की भावना को अनदेखी करने वाला था।
बदल गए मंडलयुगीन राजनीतिक समीकरण
रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के परिप्रेक्ष्य में अगर कांग्रेस पार्टी की घोषणाओं को देखा जाए, तो स्थिति और भी भयावह है। आयोग ने केंद्र व राज्य की नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए 15 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी। इसमें मुसलमानों के लिए 10 प्रतिशत और बाकी अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत। मंडल आयोग की रिपोर्ट के मद्देनजर आयोग का कहना था कि 27 प्रतिशत अन्य पिछडे़ वर्ग के कोटे में 8.4 उप कोटा अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित होना चाहिए। इसमें 6 प्रतिशत मुसलमानों के लिए होना चाहिए। कांग्रेस ने तो अभी 4.5 प्रतिशत कोटा आरक्षित करने की बात की है। कोई नहीं जानता कि भविष्य में यह प्रतिशत और बढ़ जाए। सीटों का यह अंतर भले ही दोनों में हो, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर दोनों एक ही नाव पर सवार हैं। कांग्रेस चाहती तो आयोग की इस रिपोर्ट को खारिज कर सकती थी, लेकिन उसने इसे 2011 में ही लागू करने का फैसला कर लिया था। उसे लगता था कि एक विद्वान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली यह रिपोर्ट संवैधानिक दृष्टि से इतनी युक्तियुक्त होगी कि सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी उसे आसानी से मिल जाएगी, लेकिन उसने इस पर रोक लगा दी। अभी तक वह अदालत के पाले में पड़ी हुई है।
साक्षात्कार : दलित ईसाइयों को नहीं चाहिए अनुसूचित जाति का दर्जा
जिस समय रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन हुआ था, उसी के आसपास मनमोहन सरकार ने भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर रिपोर्ट देने के लिए न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। सच्चर समिति (2006) ने यह सिफारिश की कि अल्पसंख्यक बहुल, खासकर मुस्लिमों के इलाके लोकसभा और विधानसभा के लिए अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित न किए जाएं। बेशक यह मुसलमानों के लिए चुनाव लड़ने और चुने जाने के अवसर बढ़ा देगी, लेकिन यह समस्या हिंदुओं की अन्य जातियों को भी उठानी पड़ती है। चूंकि मुसलमानों की समस्याओं के अध्ययन के लिए इस आयोग का गठन किया गया था, इसलिए उसने एकांगी सिफारिश करके अपने कार्य की इतिश्री मान ली। क्या यह अच्छा नहीं होता कि इस मसले पर चुनाव सुधार के उपक्रम के तहत समग्रता में विचार किया जाता? दरअसल, संप्रदाय विशेष के लिए गठित आयोग के साथ ऐसी समस्या होना लाजिमी है।
अवसरवादी आश्वासन और कसमों का अतिरेकल्ल
वंचित दर्जे का प्रश्न अत्यंत गंभीर है। कांग्रेस पार्टी ने कथित तौर पर वंचित मुसलमानों और ईसाइयों को वंचित का दर्जा देने की जो घोषणा की है, वह भारतीय समाज के यथार्थ और संवैधानिक प्रावधानों को नकारता है। यह सबको पता है कि अस्पृश्यता हिंदू धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा है, जो सदियों से चला आ रहा है। इस कारण प्रगतिशील लोग हिंदू समाज की घोर आलोचना करते रहे हैं। यह अवांछित भी नहीं था। हिंदू समाज में चली आ रही इस अस्पृश्यता के कारण 1950 के संवैधानिक आदेश में कतिपय जातियों को शामिल किया गया था। इसका आधार वास्तव में धर्म विशेष नहीं था, बल्कि अस्पृश्यता थी। संविधान सभा में भी कहा गया था कि अस्पृश्यता की यह प्रथा हिंदू धर्म को छोड़कर किसी अन्य पंथ में नहीं है। पर रंगनाथ मिश्र आयोग का नजरिया हैरानी पैदा करने वाला रहा। उसे इसमें धार्मिक आधार नजर आता है। इतना ही नहीं, उसे यह भी लगता है कि 1950 के संवैधानिक आदेश के अधीन सूचियों में समय-समय पर अनुसूचित जातियों को शामिल किया जाना देश में वास्तविक जाति स्थिति के किसी सर्वेक्षण पर आधारित नहीं है। आयोग ने जिस ऐतिहासिक सचाई को नकारने की कोशिश की है, वह आयोग की सदस्य सचिव आशा दास की असहमत टिप्पणी में प्रकट हो गई है। आशादास बताती हैं कि 1880 से ही हिंदुओं की कुछ चुनिंदा जातियों के बारे में विचार किया जाने लगा था। 1931 की जनगणना रिपोर्ट के दौरान उसके आयुक्त जे एच हट्टन ने अस्पृश्यता के मानदंड भी निर्धारित किए थे। भारत शासन अधिनियम, 1935 में पहली बार ह्यअनुसूचित जातिह्ण शब्द का इस्तेमाल किया गया था। इसी अधिनियम के तहत 1936 का भारत सरकार (अनुसूचित जाति) आदेश जारी किया गया था। बाद में इसकी परिणति 1950 के संवैधानिक आदेश के रूप में हुई थी। ध्यान देने की बात है कि 1936 का आदेश लाने वाली कोई हिंदुत्ववादी सरकार नहीं थी, बल्कि गोरी अंग्रेज सरकार थी। उसने साफ कहा था कि किसी भी भारतीय ईसाई को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाए। संविधान सभा के निर्माताओं ने भी इस पर मुहर लगाई थी। क्या अंग्रेजी शासन और संविधान सभा ने सांप्रदायिक आधार पर फैसला किया था? सेकुलरवाद का ढोल पीटने वाली कांग्रेस जैसी पार्टियों के रवैये से देश, खासकर वंचित समाज का चिंतित होना स्वाभाविक है।
कट्टर जोश, भूल गए पुरानी सोच
दिलचस्प बात है कि आजादी के 67 वर्ष बाद भारत में अस्पृश्यता के मामलों में काफी कमी आई है। 1980 में जहां अस्पृश्यता के करीब 4000 मामले दर्ज किए गए थे, वहीं 2003 में यह घटकर केवल 651 रह गए थे। इसके बावजूद मुसलमानों और ईसाइयों में कथित तौर पर वंचितों का पैदा होना संदेह पैदा करता है। आखिर इस राजनीति के पीछे की मंशा क्या है? इसके पक्षधर यह कहते हैं कि जब 1956 में सिखों और 1990 में बौद्धों को संवैधानिक आदेश, 1950 में शामिल किया जा सकता है, तो कथित मुस्लिम और ईसाई वंचितों को इसमें क्यों नहीं शामिल किया जाता? इस क्रम में वे अनुच्छेद 25 की भावना को नकार देते हैं। अुनच्छेद 25 के स्पष्टीकरण में हिंदुओं के प्रति निर्देश का अर्थ सिख, बौद्ध और जैन पंथ से भी लगाया गया है। हिंदू धर्म से निकले इन पंथों में अस्पृश्यता की बीमारी होना स्वाभाविक है, जबकि विदेशी उद्गम स्थल होने के नाते इस्लाम और ईसाई पंथ में सैद्धांतिक तौर पर जाति व्यवस्था का न होना मान्य है। इसी तरह अनुच्छेद 341 के दायरे में सभी पिछड़े नहीं आते। इसके लिए अनुच्छेद 16 (4) है। इसलिए अनुच्छेद 341 में सभी पिछड़ों को शामिल करने पर अनुसूचित जाति के साथ अन्याय होगा। ऐसी स्थिति में अगर इन दोनों पंथों के कथित वंचितों को वंचित का दर्जा देना होगा, तो संविधान में संशोधन करना पड़ेगा। लेकिन क्या वह युक्तियुक्त होगा? क्या यह इन दोनों पंथों की सैद्धांतिक मान्यता के खिलाफ उनमें जाति को संस्थागत स्वरूप देने की कोशिश नहीं होगी? यह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय में पहले से लटका हुआ है।
संवैधानिक आदेश, 1950 न तो भेदभाव कारक है और न ही असंवैधानिक है, पर कांग्रेस को यह नजर नहीं आता। कतिपय राजनीतिक विश्लेषकों की दृष्टि में सोनिया गांधी की कांग्रेस अत्यंत सांप्रदायिक है। मनमोहन सरकार के तहत ऐसे कई फैसले और मंत्रियों के बयान आते रहे, जो देश के सेकुलर ढांचे के अनुकूल नहीं थे। अदालत और कानून की पेचीदगी के कारण यह नहीं कहा जा सकता कि यह सब लागू हो ही जाएगा, लेकिन इससे कांग्रेस की मंशा एक बार फिर उजागर हो गई है। उसकी राजनीति विभाजनकारी है। जब अल्पसंख्यकों की गैर-कानूनी मांगें पूरी नहीं होंगी, तो उन्हें लगेगा कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। दूसरी ओर ऐसी मांगों को पूरा करने पर बहुसंख्यकों को लगेगा कि उनके ऊपर अल्पसंख्यकों को तरजीह दी जा रही है। इससे अंतत: अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समाज के बीच वैमनस्य को बढ़ावा मिलेगा।
– अजय कुमार सिंह











