| दिंनाक: 26 Apr 2014 15:36:43 |
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मैंने जब सेना में टाट्रा ट्रक की खरीद में हुए घोटाले का विरोध शुरू किया तो सभी विरोधी एकजुट होने लगे और मुझे हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई
लोकसभा चुनाव जारी हैं और आचार संहिता लागू है, लेकिन यूपीए सरकार इस कदर बौखला गई है कि जल्दबाजी में नई सरकार बनने से पूर्व ही सभी फैसले करने पर आमादा हो गई है। हाल ही में सेनाध्यक्ष बिक्रम सिंह की जगह नये सेनाध्यक्ष बनाने को लेकर प्रक्रिया शुरू करने की खबरें सामने आई। राजनीति में पदार्पण करने वाले पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विजय कुमार सिंह ने भी इसे गलत निर्णय करार दिया है। सेना में हावी होती राजनीति और सैनिकों की मनोस्थिति के संबंध में उनसे विस्तार से बातचीत की पाञ्चजन्य संवाददाता राहुल शर्मा ने। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश :-
ल्ल आप सेना में शीर्ष पद पर रहे और उसके बाद राजनीति मंे आ गए, राजनीति मंे शामिल होने के पीछे आपका क्या उद्देश्य था?
मन में पहला सवाल यह था कि सेना में 42 साल रहकर समाज से बहुत कुछ सीखा था। इसलिए प्रण कर लिया था कि सेवानिवृत्ति के बाद समाज को कुछ देने का समय आ चुका है और बैठने का समय नहीं है। देश में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए व्यवस्था परिवर्तन बेहद जरूरी था जिस कारण से युवाओं से भी संपर्क बढ़ाया क्योंकि देश का पुनरुद्धार उन्हीं के हाथों में है।
शुरुआत में अण्णा हजारे जी के साथ लोकपाल के लिए जारी आंदोलन से जुडे़। लोकपाल पास होने वाले दिन ह्यहमने अण्णा जी से कहा कि हम पर एक दबाव है कि हम जहां भी जाते हैं और राजनीति को साफ-सुथरा करने की बात करते हैं तो लोग हम से ही कहते हैं कि आप स्वयं क्यों राजनीति में नहीं आ जाते।ह्ण इस पर अण्णा जी ने सहमति जता दी। फिर मैंने स्वयं विश्लेषण कर पाया कि देश मंे एकमात्र राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी ही है, जो कि मूल राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़ा है। इसके बाद मैं भाजपा में शामिल हो गया और जब पार्टी ने मुझे गाजियाबाद से चुनाव लड़ने का निर्देश दिया तो मैं उसके अनुरूप चुनाव मैदान में कूद गया।
ल्ल हाल-फिलहाल देखने में आया है कि सेना में राजनीति काफी हावी हो गई और नियमों की अनदेखी कर फैसले लिए जा रहे हैं। इसे आप किस दृष्टि से देखते हैं?
कुछ नीतियां और नियम हैं जिनका पालन होना चाहिए वरना व्यवस्था बिगड़ जाती है। नये सेनाध्यक्ष के नाम की घोषणा अभी तक केवल दो माह पहले होती थी और वह भी 1 जून को। लेकिन बिक्रम सिंह की जगह अप्रैल माह में ही नये सनोध्यक्ष की प्रक्रिया शुरू कर दी गई, जो कि नियमों के विपरीत है। मेरे मामले में तीन माह घोषणा कर दी गई थी क्योंकि सरकार मुझे निष्क्रिय करना चाहती थी। सरकार अब जाते-जाते अपने फैसलों पर सवालिया निशान न जाने क्यों लगवाने जा रही है।
ल्ल नौसेना में भी शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति में वरीयता को अनदेखा किया जा रहा है। इससे आम सैनिक और सेना के मनोबल पर क्या असर पड़ता है?
नौसेना में वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा की जगह दूसरे को वरीयता देकर नीति-नियमों का पालन नहीं किया गया है। दरअसल नौसेना प्रमुख को सामरिक दृष्टि से सभी क्षेत्रों की कमान का अनुभव होना चाहिए। वर्ष 2006 में जब भारतन को नौसेना प्रमुख बनाया जा रहा था तो उन्हें सभी कमानों का अनुभव नहीं होने के कारण प्रमुख बनाने से रोक दिया गया था। इसके लिए ह्यमिनिस्टरी ऑफ डिफेंसह्ण की नोटिंग भी है। उस समय सुरीश मेहता को नौसेना प्रमुख बनाया गया था। लेकिन अब सिन्हा के योग्य होने के बावजूद आर. के. धोवन को नौसेना प्रमुख बनाया गया है निजके पास सामरिक दृष्टि से सभी कमानों पर कार्य करने का अनुभव नहीं है। यह निर्णय अपने आप में सरकार की नीति-नियमों पर सवालिया निशान खड़ा करता है। सरकार को इससे बेहतर तो डी. के. जोशी का इस्तीफा मंजूर ही नहीं करना चाहिए था, जबकि धोवन की सेवानिवृत्ति में मात्र एक माह का समय बाकी रह गया था। ऐसे में एक माह बाद ही सरकार को निर्णय करना चाहिए था कि वह किसे नौसेना प्रमुख बनाये। ऐसी नियुक्ति होने से सेना में अंसतोष पनपता है। सभी सोचते हैं कि उनका मुखिया अनुभव से नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से प्रमुख बनाया गया है।
ल्ल बोफर्स कांड से लेकर अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर की खरीद तक रक्षा उत्पादों में घोटाले हुए हैं, क्या आप सेना में घूसखोरी की बात को स्वीकारते हैं?
हमारे देश में ह्यआर्म्स लॉबीह्ण हावी है। मैंने अपने कार्यकाल में टाट्रा ट्रक की खरीदारी पर शिकंजा कसा था। चेकोस्लोवाकिया में निर्माण हुआ एक टाट्रा ट्रक सेना को करीब एक करोड़ रुपये में मिल रहा था जिसकी कीमत वास्तव में मात्र 25 से 26 लाख रुपये ही थी। इनकी खरीद के लिए ह्यआर्म्स लॉबीह्ण मोटी घूस ले रही थी। हैरानी की बात यह है कि इन ट्रकों की संख्या सेना में पहले से 6 हजार थी, उसके बावजूद इन्हें खरीदा जा रहा था। लेकिन कोई नहीं बोलता था क्योंकि घूस की रकम सभी में बंटती थी। मैंने जब इसका विरोध शुरू किया तो सभी विरोधी एकजुट होने लगे और मुझे हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। कुछ और नहीं मिला तो ह्यडेट ऑफ बर्थह्ण का विवाद ही गहरा दिया गया। यदि नियमानुसार मेरी सेवानिवृत्ति होती तो मैं 2013 में सेवानिवृत्त होता, लेकिन सुनियोजित राजनीति के चलते मुझे 2012 में हटना पड़ा। इस गंदगी को दूर करने के लिए पारदर्शिता लानी पड़ेगी। व्यवस्था को बदलना पड़ेगा और निजी क्षेत्रों को बढ़ावा देना होगा। रक्षा उत्पादों के मामले में हम विदेशों पर निर्भर हैं क्योंकि कोई भी अपनी तकनीक हमें नहीं देता। हमारा रक्षा बजट बहुत कम है और हम अमरीका और चीन के रक्षा बजट के समक्ष कहीं नहीं टिकते हैं। हमारे यहां प्रक्रिया जटिल हैं, जो कि विकास को रोकती हैं। उनमें सुधार के लिए प्रेरणा की आवश्यकता है।
ल्ल सरकार से सैनिक क्या उम्मीद रखते हैं?
सैनिक के लिए देशहित सर्वोपरि होता है। उनके लिए जाति या धर्म मायने नहीं रखता। सैनिक सिर्फ सम्मान चाहता है। ह्यवन रैंक वन पेंशनह्ण होनी चाहिए। सबसे दु:खद बात तो यह है कि आजतक हमारी सेना का अपना कोई ह्यनेशनल वार मेमोरियलह्ण नहीं है। अंग्रेजों ने 1923 में बनाया था। उनके बाद इस बारे में कभी सोचा ही नहीं जाता। ल्ल