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-मुजफ्फर हुसैन-
पाठक इस बात को भूले नहीं होंगे कि कुछ समय पूर्व पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा परवेज ने भारत की यात्रा की थी। यद्यपि उनके भारत आने का उद्देश्य अजमेर के ख्वाजा की दरगाह पर हाजिरी देना था, लेकिन वे दिल्ली जाना नहीं भूले। क्योंकि राजा का एक गुप्त एजेंडा था, जिसके तहत वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलना चाहते थे। उन्होंने प्रधानमंत्री से मिलकर यह कहा था कि भारत, पाकिस्तान को कच्छ स्थित 'सर क्रीक' का संपूर्ण भाग सौंप दे। बंटवारे के समय पाक को केवल उसका 10 प्रतिशत भाग मिला था। उसका दावा है कि शेष 90 प्रतिशत भाग भी उसे मिलना चाहिए। पाकिस्तान सरकार की यह नीति रही है कि भारत की सीमा का कुछ न कुछ हिस्सा दबाकर अथवा भारतीय नेताओं को अपने विश्वास में लेकर वह उस क्षेत्र को दबोच ले। पाकिस्तान और बंगलादेश के निर्माण के पश्चात ऐसा होता चला आया है। नरेन्द्र मोदी को उक्त समाचार बहुत पहले ही मिल चुका था, उन्होंने इस बात की अटकल लगाई कि राजा अपने शिकंजे में कहीं भारत सरकार को न फंसा लें। इसीलिए मोदी ने दिल्ली की उड़ान भरी और मनमोहन सिंह को चेतावनी दे दी। राजा को जैसे ही मोदी के दिल्ली आने का समाचार मिला वे स्वदेश लौट गए।
राजा और मनमोहन दोनों समझ गए थे कि अब मामला बिगड़ने वाला है। राजा अजमेर के बहाने से आए थे, इसीलिए अजमेर की यात्रा कर खाली हाथ लौट गए। उनका असली उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। यदि मोदी समय पर नहीं पहंुचते तो भारत का एक और हिस्सा पाकिस्तान के हवाले कर दिया जाता। उक्त समाचार छुटपुट तौर पर दोनों देशों के अखबारों में छपा था। इस स्तम्भ लेखक ने भी अपने पाकिस्तान संबंधी डिस्पैच में उसका वर्णन किया था। लेकिन देश के बहुत कम लोगों का ध्यान इस ओर गया। ह्यसर क्रीकह्ण हाथ न आने से पाक सत्ताधीश बड़े निराश हुए थे। इसीलिए जब इस चुनाव को जीतकर मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद है तब पाकिस्तान को मोदी और भाजपा की जीत भला किस प्रकार हजम हो सकती है।
मोदी का दबदबा पाकिस्तान भली प्रकार जानता है, इसीलिए वहां उनका विरोध होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। पाकिस्तान में मोदी का जो विरोध हो रहा है उसमें उनका भय व्याप्त है। यदि भाजपा ने मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया होता और उनकी जीत की सम्भावना दुनिया के मीडिया को नहीं होती तो पाकि स्तानी प्रेस में उनका इतना विरोध नहीं होता। चुनाव तो भाजपा ने पहले भी लड़ा है और अटल बिहारी वाजपेयी जैसा दूरदर्शी और राष्ट्रभक्त व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ हो चुका है। पाक प्रेस में भारत के वर्तमान चुनाव को लेकर बहुत कुछ छप रहा है। भाजपा के लिए आज से पहले विरोध था, लेकिन इतना नहीं, जितना आज इस्लामाबाद कर रहा है। इंदिरा गांधी जैसा ही भय मोदी के लिए भी पाक के दिलो-दिमाग पर छाया हुआ है, यह भारत के लिए एक गर्व की बात है। गुजरात दंगों से भला पाक को क्या लेना-देना था, लेकिन भविष्य में पाक को होने वाली कठिनाइयों से वह बुरी तरह से चिंतित है।
पाकिस्तानी मीडिया के सभी अंग मोदी के विरोध में मुखर हैं। फिर भी प्रिंट मीडिया सबसे आगे है। पाकिस्तान के उर्दू और अंग्रेजी ही नहीं बल्कि सिंधी, पंजाबी और पश्तो में प्रकाशित अखबार भी समाचार और चुनाव विश्लेषण से भरे पड़े हैं। एक बात बड़ी स्पष्ट है कि इंदिरा गांधी के पश्चात पाकिस्तान के सत्ताधीश किसी से घबराए हुए हैं तो वे हैं सिर्फ नरेन्द्र मोदी। मोदी उनके लिए भविष्य की चुनौती हैं। वे कुशल प्रशासक और निर्भीक हैं, इसीलिए पाक नेताओं की नाजायज बातों को स्वीकार करने वाले नहीं हैं। वर्ष 2002 में हुए गुजरात दंगे और मुसलमानों के बेसिर पैर के बयानों से मोदी न तो भयभीत होने वाले हैं और न ही पिघलने वाले हैं। दैनिक डॉन लगभग आठ दिन पहले अपने विश्लेषण में लिख चुका है कि मोदी की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ बनने वाली है।
एक समय था कि पाक सत्ताधीश भारतीय जनता पार्टी का विरोध करते थे, लेकिन इस समय उनके पृष्ठों पर मात्र मोदी का नाम लेकर विरोध हो रहा है। कराची से प्रकाशित होने वाले दैनिक एक्सप्रेस का कहना है कि इस चुनाव में सबसे स्पष्ट बात करने वाला कोई नेता है तो वह नरेन्द्र मोदी हैं। मोदी की सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। भारतीय जनता पार्टी के साथ अन्य दल भी उनका समर्थन करेंगे। भारतीय लोकतंत्र में ऐसा समय भी आया है कि जब कांग्रेस और जनता पार्टी की सरकारों के पास बहुमत नहीं था और तब भी उनकी सरकार चली। इस तुलना में तो भाजपा का आंकड़ा बेहतर ही होगा। येन-केन प्रकारेण 255 से 280 के बीच वह सीटें प्राप्त कर लेंगे। पाक मीडिया का कहना है कि अनेक बार गैर कांग्रेसी पार्टियां पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर सकीं, लेकिन उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया।
दैनिक डॉन का मत है कि मुस्लिम नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद को लेकर आशंकित हैं, लेकिन उनके समर्थन में आवाज भी सुनने को मिल रही है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में समान नागरिक कानून और राम मंदिर निर्माण जैसे मुद्दों का समावेश किया है, लेकिन सामूहिक रूप से अब तक उसका कहीं भी विरोध नहीं हुआ है। ऐसा लगता है कि इस बार सत्ता के लिए वह समझौता नहीं करेगी। जनता पार्टी में एक बार जनसंघ को, जो भाजपा का पुराना स्वरूप था, अपना विलय करना पड़ा था, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा। अब तक अनेक राज्य स्तर की पार्टियों ने भाजपा में या तो अपना विलय कर लिया अथवा सीटों के साथ साझेदारी स्थापित कर ली है। भारत की राजनीति परिपक्व हुई है, इसीलिए राजनीतिक दलों में पहले जैसा बचकानापन नहीं दिखाई पड़ता है।
डॉन ने अपने लेख में यह सवाल उठाया है कि ह्यदरअसल किसी अस्थिर देश में मुस्लिम, हिन्दू, सिख या ईसाई, कोई भी खुश नहीं रह सकता है। तो पाकिस्तानी पत्रकारों को अपने देश के मुसलमानों की बजाय भारत के मुसलमानों की चिंता क्यों है? पाकिस्तान के मुस्लिम अपने पड़ोसी देश के मुसलमानों से अधिक खुशहाल हैं तो पाकिस्तानी पत्रकारों का यह कृत्य किसी भी अर्थ में पत्रकारिता नहीं है । इस चिंतन के लिए हमारे पत्रकार ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान की सरकार भी है। पाकिस्तान मंे मुसलमानों का जो जीवन स्तर गिरा हुआ है उसके लिए पाक सरकार ही अधिक उत्तरदायी है। यदि हम भारत की रात-दिन आलोचना करते रहेंगे तो क्या हमारा उद्देश्य पूरा हो जाने वाला है? किसी लोकतंत्र को अपनाने वाले देश में सरकार और मतदाता दोनों जिम्मेदार हैं। इसीलिए सरकार की आलोचना करने से कुछ नहीं होगा। पाक में मीडिया को अपने देश और जनता दोनों की सुध लेनी होगी। भारत के नेता आवाज तो बुलंद करते ही हैं, अपने बजट के माध्यम से उनका जीवन स्तर सुधारने के लिए प्रयास भी करते हैं। क्योंकि उन्हें पांच साल के बाद जनता के बीच जाना है, लेकिन पाकिस्तान के नेता इस मामले में उदासीन हैं। वे दोष सरकार पर तो डाल देते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते कि
इसके लिए वे भी तो उतने ही जिम्मेदार हैं। लोकतंत्र की गाड़ी नेता और जनता के दो पहियों पर चलती है?
पाकिस्तान में दोनों ही वर्ग उदासीन हैं। इसके लिए हमें अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना होगा। पाकिस्तान के नेता यदि मार्शल लॉ की भाषा जानते हैं तो जनता भी उनकी गुलामी के लिए तैयार हो जाती है, जो हमारी सबसे बड़ी बदकिस्मती है। भारत के मुसलमान आंखें बंद कर वोट देते हैं, लेकिन यह स्थिति अब बहुत पुरानी हो गई है।ह्ण फिर भी सोनिया गांधी जैसी नेता इमाम के सामने आत्मसमर्पण कर देती हैं। मुट्ठी भर मुसलमान नेताओं को इसका लाभ मिल जाता है, लेकिन मुस्लिम जमात तो उसी अंधेरी गली में बंद हो जाती है। इसीलिए जितना दोष कांग्रेस का है उतना की मुस्लिम नेताओं और मौलानाओं का है। आज भी भारत के मुसलमानों ने अपने वोटों को मजहब की चारदीवारी में कैद कर रखा है। इसीलिए इसमें सरकार या राजनीतिक दल क्या करें? असली दोषी तो वे मुस्लिम नेता हैं, जो अपने स्वार्थ के घेरे से उन्हें बाहर आने नहीं देते। इन्हीं इमाम के कारण आपातकाल में वहां के मुसलमानों को कितना सहन करना पड़ा? लेकिन सोनिया गांधी ने उन्हें भुला दिया और इमाम मुसलमानों को उनके लाभार्थ सड़क पर ले आए। इसमें अन्य राजनीतिक दल क्या करें? मुसलमान मजहब के नाम पर कब तक ह्यब्लैकमेलह्ण होते रहेंगे?
कांग्रेस में अल्पसंख्यकवाद की राजनीति का चलन राजीव गांधी के समय से शुरू हुआ था। पहले तो मोहम्मद आरिफ खान से कहकर विरोध करवा लिया और बाद में पर्सनल लॉ के नाम पर ह्यब्लैकमेलह्ण करके अपने मूल्यों की बोली लगा दी, ऐसे अवसरवादी हर जगह हैं। पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर क्या-क्या होता है? सच बात तो यह है कि मजहब के नाम पर राजनीति नहीं होती, लेकिन मुसलमानों ने तो पूरे मजहब को ही राजनीति बना दिया है तो कोई क्या करे? वास्तविकता यह है कि संपूर्ण भूखंड में मुस्लिम अपने स्वार्थी नेता और मौलानाओं के दम पर ह्यब्लैकमेलह्ण हो रहे हैं। इस्लाम के सच्चे सेवक तो वे ही कहलाएंगे जो उसकी सेवा करें। यहां तो हमारी मजहबी नेतागिरी सारी कौम को परेशानी में डाले हुए है।
राष्ट्रवाद के माध्यम से यदि मुसलमान का भला होता है तो उसका स्वागत होना चाहिए। पाकिस्तान की उर्दू प्रेस इस बात को स्वीकार करती है कि भारत के मुसलमानों में चेतना पैदा हो रही है। पाकिस्तान के मुसलमान की स्थिति अधिक बदतर है। लोकतंत्र वरदान है, लेकिन उसे मजहब के कटघरे में खड़ा कर के अप्रासंगिक प्रश्न पैदा किए जाएं यह उचित नहीं है। भारत के मुसलमानों पर आप आंसू बहाकर अथवा उनकी रक्षा के नाम पर आप आंदोलन करके कोई भला नहीं कर रहे हैं। हज यात्रा से लगातार पिछड़ते मुस्लिम उत्थान, साथ ही उर्दू अकादमी और वक्फ बोर्ड की स्थापना दर्शाती है कि भारतीय मुसलमान जागरूक बन रहा है। उसकी चिंता करना छोड़ दीजिए, यही उन पर सबसे बड़ी कृपा होगी।











