राजभवन ऊंचा सुने दिंनाक: 06 Jul 2013 15:08:07 घमंडीलाल अग्रवाल हैं बुलंद यदि हौसले, धैर्य अगर है पास।। पंख कटे तो क्या हुआ, उड़ने की पर चाह। चाह जहां होती वहां, मिल ही जाती राह।। सपने सब जोगी हुए, हुई कलंकित प्रीति। जबसे घर में आ गई, पश्चिम वाली रीति।। धूप न बंटवारा करे, भेदभाव कब छांव। बांट लिए हैं क्यों भला, हमने अपने गांव।। गिरवी रखो शराफतें, तिकड़म जिंदाबाद। काम बनाएं तिकड़में, दिल रहता आजाद।। नारे हरदम खाइए, नारे पीना यार। नारों से ही नर बना, नारों की जयकार।। चांद हमें रोटी लगा, ओस लगी है नीर। क्षण-क्षण जी ली जिंदगी, पल-पल पी ली पीर।। राजभवन ऊंचा सुने, चिल्लाना बेकार अरी झोंपड़ी मत लुटा, मन का निर्मल प्यार।।