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बहस और चर्चा का विषय यह नहीं कि उत्तराखंड में जो जल प्रलय के रूप में आपदा आई है उसे राष्ट्रीय आपदा कहा जाए अथवा प्रांतीय। यह सच है कि स्वतंत्र भारत में गुजरात भूकंप के बाद यह सबसे बड़ी आपदा है, जिसमें असंख्य लोगों का जीवन चला गया, धन संपदा की भी अकथनीय हानि हुई। जो लोग इस प्रलय में बच गए, इससे उनके मन-मस्तिष्क पर भी कभी न मिटने वाली भय की छाया पड़ गई। सरकार का कहना है कि इस संकट में से अस्सी हजार लोगों को बचा लिया गया और अभी भी लगभग पंद्रह हजार लोगों को बचाना शेष है। सेना, वायु सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और आपदा प्रबंधन में लगीं सुरक्षा एजेंसियों ने जो सराहनीय कार्य किया उसी से लोगों का जीवन बचा है और प्रकृति के इस कोप से जूझने में भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने ऐतिहासिक महत्व का कार्य किया है, जिसे सदा याद रखा जाएगा।
अब प्रश्न यह है कि क्या सरकारें सचेत होतीं तो इस मुसीबत को कम किया जा सकता था अथवा आपदा प्रबंधन का काम अधिक शीघ्रता और कुशलता के साथ हम कर सकते थे?
एक सुनिश्चित जानकारी के आधार पर यह बताया गया कि उत्तराखंड में वर्ष 2007 में आपदा प्रबंधन अधिकरण की स्थापना हुई थी। लेकिन अफसोस कि आज तक इस कमेटी की कोई बैठक नहीं हो सकी। इसके लिए जो करोड़ों रुपये राज्य को मिले उसका प्रयोग कहां किया गया अथवा नहीं किया गया, इसका भी कोई विवरण जनता और केंद्र को नहीं दिया गया। सच तो यह है कि आपदा प्रबंधन के लिए उत्तराखंड में आज तक न तो कोई निश्चित नीति बनी और न ही आवश्यक दिशा-निर्देश तय किए गए।
उत्तराखंड में प्रकृति को चुनौती देते हुए वन काट-काट कर बिजली परियोजनाओं के लिए कार्य शुरू कर दिया गया। उत्तराखंड में हुआ विनाश वास्तव में अनियोजित विकास और लोगों द्वारा प्रकृति से छेड़छाड़ का ही परिणाम है। 1975 में प्रस्तुत किए गए उस प्रारूप विधेयक पर भी आज तक कोई कार्यवाही नहीं की गई जिसमें बाढ़ों को रोकने के लिए नदियों के किनारे सीमित निर्माण करने की बात कही गई थी।
कुछ समय पूर्व राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने सभी प्रदेशों की सरकारों को नदियों के किनारे हो रहे निर्माणों को रोकने के लिए उचित पग उठाने को कहा था, परंतु राजस्थान के अतिरिक्त और किसी सरकार ने इसका उत्तर देना भी उचित नहीं समझा। पंजाब में तो नदियों के किनारे वैध-अवैध रूप में रेत खनन करके कुछ सत्तापतियों को अमीर बनाने का काम किया जा रहा है, यद्यपि इससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।
आपदा प्रबंधन के कार्य को सरकारों ने इतना महत्वहीन समझा कि अधिकतर प्रांतों, विशेषकर प्राकृतिक चुनौतियों से हमेशा घिरे रहने वाले उत्तराखंड ने भी इस दृष्टि में कोई गंभीर कदम नहीं उठाया। जानकारी के अनुसार आज भी स्वार्थी राजनीतिक नेता और शक्तिशाली ठेकेदार स्वयं अमीर बनने के लिए वृक्ष काटने का काम कर रहे हैं। साथ ही जो सरकार का काम है कि प्रांत के आपदा प्रबंधन से सम्बद्ध अधिकारियों को तथा जनता को इस संबंध में कोई प्रशिक्षण दें, वह प्रयास भी सरकार ने नहीं किया। यह भी बताया गया है कि 2011-12 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से कोई भी धनराशि उत्तराखंड को नहीं मिली, क्योंकि पहले भेजे पैसे का हिसाब केंद्र को नहीं भेजा गया। ऐसा लगता है कि पहले प्राप्त धनराशि जिस कार्य के लिए मिली थी, वह कार्य ही नहीं किया गया और अब तो इस संकटकाल ने यह सिद्ध कर दिया है कि उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन केवल फाइलों तक सीमित है। जहां-जहां यह काम होना चाहिए था वहां परिणाम शून्य है। दु:खद पक्ष यह भी है कि जो आपदा प्रकोष्ठ यहां स्थापित किया गया, वहां कोई सुनने और उत्तर देने वाला भी नहीं है।
आपदा प्रबंधन के कार्य में देश के दूसरे प्रांतों की स्थिति भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं। पंजाब में तो कुछ कर्मचारी ठेके पर भर्ती करके चंडीगढ़ के सचिवालय में बंद कर दिए गए हैं और उन्हें भी फाइलें लिखने और पढ़ने का काम ही सौंपा गया है। दिल्ली में भी राज्य सरकार द्वारा स्थापित आपदा प्रबंधन प्राधिकरण लगभग दो दर्जन कर्मचारियों को ठेके पर रखकर कभी-कभी 'मॉक ड्रिल' करके अपने अस्तित्व का परिचय जनता को दे देता है।
कुछ वर्ष पहले जापान और अमरीका ने अपने देश में आईं आपदाओं को जिस तरह से संभाला, वह अनुकरणीय है। देश भर के मंत्री बिना काम भी विदेश यात्राओं पर करोडों रुपये और समय खर्च करते हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा तथा पुलिस के अधिकारी भी यदा-कदा प्रशिक्षण लेने विदेश जाते हैं तो फिर आपदा प्रबंधन के लिए जापान और अमरीका जैसे देशों में अपने अधिकारियों को भेजकर उन्हें कार्यकुशल बनाने एवं आपदा से सक्षम होकर निपटने की योग्यता देने में क्या हर्ज है।
'कैग' ने की किरकिरी
l 23 अप्रैल 2013- 'कैग' रपट ने बताया कि अक्तूबर 2007 में गठित राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की आज तक कोई बैठक नहीं हुई, न नियम बने, न नीतियां, न दिशानिर्देश।
l पूर्व चेतावनियों के लिए कोई योजना नहीं
l संचार तंत्र किसी काम का नहीं
l 2011-12 में केन्द्र ने आपदा प्रबंधन का कोई पैसा उत्तराखण्ड नहीं भेजा, क्योंकि पहले भेजे का अता–पता नहीं।
l जिला आपदा आपरेशन इकाइयों में 44 फीसदी पद रिक्त
l उत्तराखण्ड सरकार ने राज्य आपदा निवारण कोष में अन्य मदों में बचा पैसा नियमानुसार निवेश नहीं किया। 2007-08 और 2011-12 के बीच 5.9 करोड़ रु. से 67.2 करोड़ रु. तक निवेश न होने से 9.96 करोड़ रु. का नुकसान











