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पचास वर्ष पूर्व का प्रसंग है। मेरी दादी सास के आंगन में एक नववधू (मेरी देवरानी) ब्याह कर आई। उसका जन्म बनारस में हुआ था। बीच शहर में ही उसका पत्थर का बड़ा मकान था। शादी के पूर्व वह बनारस से बाहर कहीं नहीं गईं थी। गांव तो देखा ही नहीं था। उनके पिता ने एक ऐसे लड़के से विवाह किया जो गांव में पला बढ़ा था। बनारस में कार्यरत था। शहर के स्टेशन से उतर कर डोली में बैठना, वहां से ससुराल जाना, सब उसके लिए नया अनुभव था। वह बहुत डरी-डरी सी थी। सुबह उठकर जब उसने बड़े आंगन के चारों ओर देखा, उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। वह एक-एक उपकरण देखकर पूछने लगी- 'यह क्या है?'
सबसे पहले उसने ढेकी को देखा। लम्बी लकड़ी की बनी वह ढेकी जिसका अगला भाग मोटा और पिछला पतला था। सामने दो फुट लम्बी लकड़ी की मूसल लगी थी। लकड़ी की कमर के पास दो मोटी लकड़ियों के खंभे गाड़कर उस बीच ढेकी को उठाकर बांधा गया था। निर्मला को ढेकी का परिचय देने के लिए मेरी ननद ने उसके पिछले भाग को नीचे गड्ढ़े में पांव से दबाया। मूसल ऊंचा उठ गया, फिर पैर खींच लेने पर मूसल अपने नीचे बनाए छोटे से ओखल में यथास्थिति आ गया। ऐसा दो-चार बार किया। निर्मला ने पूछा-'इससे कौन खेलता है?'
वहां खड़ी सभी महिलाओं की हंसी निकल आई। निर्मला की सास ने कहा-'यह खिलौना नहीं है। अन्न कूटने की मशीन है।' उन्होंने सामने के ओखल में धान रखकर उसे कूट कर दिखाया।
निर्मला के लिए जांता (चक्की) भी नई ही थी। उसके लिए तो उस आंगन का हर सामान आश्चर्यजनक था। धीरे-धीरे वह उन सबसे परिचित हुई। उसे जांता के दोनों ओर दो महिलाओं के बैठकर उसके हथड़ा (हैंडल) पर ऊपर नीचे हाथ रख घूमाना, ऊपर से गेहूं, चना डालकर, नीचे से आटा और बेसन निकलते देखना बड़ा सुखकर लगता था। ओखल मूसल से धान कूटते देखना भी उसे आश्चर्यजनक लगता। दादी के आंगन की अन्य महिलाएं उसे सब बतातीं।
एक दिन ओखल में मूसल का बार-बार गिरना और उठना निर्मला ध्यान से देख रही थी। उसकी दादी सास ने पूछा-'तुम भी धान कूटेगी?'
वह सहम गई। बोली- 'नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती।'
यह सच था कि उसके बनारस के शहरी मकान में आंगन ही नहीं था। आंगन की शोभा ढेकी, ओखल मूसल और जांता की जरूरत भी नहीं थी। ये सारे उपकरण तो कृषि प्रधान आंगन की शोभा थे।
गांव में आटा पीसने, धान कूटने की मशीनें नहीं लगी थीं। जब मशीनें लग गईं तो मजदूर महिलाएं भी दो या पांच सेर गेहूं जांता में नहीं पीसती। वे भी चक्की ले जाती हैं। आसान हो गया है काम। मेहनत नहीं लगती। चूकि ढेकी, जांता, ओखली-मूसल जैसे उपकरण से ही घर गृहस्थी का काम चलता था, वे अतिआवश्यक थे, इसलिए उनकी ही पूजा भी होती थी। दीपावली के दिन में उनकी विशेष सफाई होती, लकड़ी में तेल लगाकर सिन्दूर से सात लाइनें खींचकर पूजा होती। एक-एक दीप भी इन उपकरणों पर जलाया जाता। दादी इन उपकरणों की विशेष देखभाल करतीं। ओखल को गिरा कर ही रखा जाता था। मूसल की भी विशेष सफाई होती। जांता को कपड़े या टोकड़ी से ढंक कर रखा जाता, ताकि उनके अंदर कीड़े-मकोड़े या छिपकली जैसे जंतुओं का प्रवेश न हो। उन्हें उपयोग में लाने के पूर्व भी साफ-सफाई की जाती थी।
दादी के आंगन के ये उपकरण उनके दैनंदिनी के साथी थे। उन पर उनके क्रियाकलाप निर्भर होते थे। इसलिए लोक-कथाओं और लोकगीतों में भी इनके वर्णन होते थे। एक और विशेष उपकरण सीलबट्टा होता था। एक विवाह गीत की पंक्तियां हैं-
'साठ मिरिचिया के प्राभु, एके गो धनिया
धनिया पिसइते हे प्राभु मुरकी गेल हे बंहिया।'
नई-नवेली दुल्हन है। ससुराल आकर उसे सीलबट्टे पर धनिया पीसना पड़ता है। वह अपने पति से शिकायत करती है- 'साठ काली मिर्च के बराबर एक धनिया होता है। वैसे दो मुट्ठी धनिया पिसने में मेरा हाथ मुड़क गया। ग्रामीण जीवन की बानगी देखिए। अव्वल तो नायिका के इस वर्णन पर नायक (पति) को हाथ सहलाना चाहिए।, रोना-धोना चाहिए। पर उसे मालूम है कि उसकी पत्नी को घर-गृहस्थी का काम करना ही होगा।
फिर भी वह उसे छेड़ता है-
'जबे तोरा आहे धनि,
मुरुकि गेल बंहियां
अपना नैहरवा हे धनि,
मंगाइलहो हे चेरिया।'
यदि धनिया पीसते हुए तुम्हारे हाथ में मोच पड़ गई तो अपने मायके से सेविका (चेरिया) मंगवा लो। मेरे घर में धनिया पिसना ही पड़ेगा। चक्की चलानी पड़ेगी। ढेकी में अन्न कूटना पड़ेगा।
ढेकी चलाते हुए झूम-झूमकर महिलाएं गीत गाती थीं। जांता पर गाए जाने वाले गीत को जंतसार कहते हैं। दादी को यह नहीं मालूम था कि जांता चलाने, ढेकी कूटने, मसाला पीसने जैसे कामों को करने से उनके बहुओं का शरीर ठीक रहेगा। मुटापा नहीं बढ़ेगा, घुटनों और कमर का दर्द नहीं होगा। घरवालों को शुद्ध आटा-बेसन और चावल मिलेगा। उन उपकरणों के ये सब फायदे जाने बिना भी वे उनकी साफ-सफाई और बेहतर स्थिति पर ध्यान देती थीं।
दादी के आंगन के ये उपकरण उनकी आर्थिक समृद्धि के भी पहचान थे। जिस आंगन में ये उपकरण नहीं होते थे, उसकी आय (खेती से अन्न) भी कम मान ली जाती थी। जिस प्रकार दरवाजे पर पुआल के टाल, भूसा का 'भुसाल' और बैलों की संख्या देखकर परिवार की समृद्धि का आकलन हो जाता था, उसी प्रकार आंगन में इन उपकरणों को देखकर भी खाते-पीते परिवार की पहचान बनती थी। दादी तो इन उपकरणों में लक्ष्मी का वास मानती थीं। उनका कहना था कि जिस आंगन से भोर-भिंसार ढेकी चलने, जंतसार के गीत के स्वर सुनाई दे, समझो कि लक्ष्मी जगी हुई हैं।
दादी के आंगन में इन उपकरणों (लक्ष्मियों) की चहलकदमी होती रहती थी। दादी स्वयं उस आंगन की लक्ष्मी थीं। उन उपकरणों को भी जगाए रखती थीं। अब न आंगन है न दरवाजा। दादा जी के दरवाजे पर समृद्धि की पहचान चिन्ह नहीं है तो दादी के आंगन में कहां से होगीं। दरअसल अब न दादी है न दादा जी। इसलिए तो गांवों में भी आंगन विहीन घर बन रहे हैं। मृदुला सिन्हा











