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पाकिस्तान घोर वित्तीय संकट से जूझ रहा है। डेली टाइम्स लिखता है कि खर्चों और आमदनी के बीच लगातार बढ़ते जा रहे अंतर, सकल घरेलू उत्पाद का 60 प्रतिशत तक के कर्ज, दुनिया में 175वें नम्बर पर सकल घरेलू उत्पाद की दर, सकल घरेलू उत्पाद और कर की सबसे कम दरों में से एक (दुनिया में 203वां रैंक), गम्भीर भुगतान संतुलन संकट तथा तेजी से छीजते विदेशी मुद्रा भंडार (11 अरब डालर) और आसमान को छूती मुद्रा-स्फीति (13 प्रतिशत, जबकि खाद्य मुद्रास्फीति 22 प्रतिशत है) के चलते पाकिस्तान एक ऐसा देश बन गया है, जो शायद अपना रास्ता भूल गया है। इस पर, संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रपट के अनुसार देश की 18 करोड़ की आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है।
दो सौ से अधिक 'वारहैडस' वाले परमाणु जखीरे (यह गिनती और बढ़ रही है) और दुनिया का छठी सबसे सेना का दावा करने वाला पाकिस्तान, बढ़ते उग्रवाद और कट्टरवाद और अशांत अफगानिस्तान के बाहरी दबावों को झेलता अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। 54 प्रतिशत के सरकारी आंकड़े से भी कम की साक्षरता दर और जबरदस्त बेरोजगारी से नौजवानों, यानी देश की 60 प्रतिशत आबादी में उत्पन्न भारी असंतोष वाला यह देश, विदेशी मुद्रा भंडार के लिहाज से सबसे कम भंडार वाले देशों में से एक है (अक्टूबर 2012 में 11 अरब डालर), जो तीन महीनों के आयात के लिए ही काफी हो सकता है। इन कटु आर्थिक तथा सुरक्षा वास्तविकताओं से परेशान इस देश की एक अजीब सी समस्या भी है -अमरीकियों और पश्चिमी देशों के प्रति बढ़ता विरोध – जिसके चलते, विदेशी निवेश में निश्चित रूप से कमी आई है और जिससे मौजूदा विदेशी सहायता में भी कमी हो सकती है।(अडनी)











