गंगा की बात क्या करूं गंगा उदास है
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गंगा उदास है
पर्व पर सन्त-समाज ने गंगा की दुरावस्था पर गंभीर चिन्तन के उपरान्त कुछ स्वस्तिकर निर्णय लिये और सामाजिक चेतना को गंगा की चिन्ता से जोड़ने का प्रयास किया। आज यह एक सर्वज्ञात सत्य है कि गंगा की दुर्दशा का सबसे महत्वपूर्ण घटक है कानपुर के चर्म उद्योग का जहरीला अपशिष्ट। चूंकि इस उद्योग पर एक वर्ग विशेष का अधिकार है, इसलिए वोट बैंक के खतरे के कारण आज तक कोई भी सरकार प्रभावी कदम नहीं उठा सकी है, भविष्य में भी उम्मीद न के बराबर ही है।
इस सन्दर्भ में उच्च न्यायालय के आदेश न जाने कब से रद्दी की टोकरी में फेंके जा रहे हैं। कुछ अन्य कारक भी हैं – तटीय नगरों के नालों का सीधे गंगा में गिरना, उत्तराखण्ड में विकास के नाम पर गंगा का गला घोंट रहे बांधों का बनना और तथाकथित धार्मिकों द्वारा मन्दिरों के पूजा-पदार्थों का नदी में विसर्जित किया जाना। विविध स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा धार्मिक कर्मकाण्डियों को तो इस बात के लिए प्रेरित किया जा रहा है कि वे खण्डित मूर्तियां, दीपावली के उपरान्त गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमाएं तथा मन्दिरों के निर्माल्य को जलधारा में न डालकर, उन्हें भू-समाधि प्रदान करें। इस प्रेरणा का सकारात्मक प्रभाव भी परिलक्षित हो रहा है, किन्तु कुर्सी की अंधी पिपासा वाली राजनीति का क्या किया जाए ? विडम्बना यह है कि इसी के 'शिखर-पुरुष' विविध मंचों पर दीप जलाकर गंगा उत्सवों का उद्घाटन करते हैं और गंगा की धारा को निर्मल रखने का उपदेश भी देते हैं! उस समय अत्यन्त विक्षोभ के साथ चित्त चीख उठता है –
सुन रहे हैं आपसे उपदेश गोया,
गीत मीरा का तवायफ की ज़बां से।
आग सीने में कहीं भी है नहीं तो,
ये धुआं अशआर में आता कहां से!
इससे पूर्व इलाहाबाद में जब सन् 1986 में कुम्भ था, तब उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की तरफ से 'गंगा तेरी लहर' नामक एकगीत संकलन प्रकाशित किया गया था। इस संकल्प में वरिष्ठ रचनाकारों के द्वारा जहां भागीरथी की महिमा का गान किया गया वहीं उस पर निरन्तर छाते जा रहे संकट का भी बयान था। आज दो दशकों के उपरान्त क्रान्तिदर्शी कवियों की उक्तियां अपनी सत्यता को अक्षरश: प्रमाणित कर रही हैं। डॉ. ब्रजेन्द्र अवस्थी की पंक्तियाँ गंगा की पौराणिक छवि की आरती हैं –
कहते हैं हरिचरन से प्रवहमान है गंगा,
ब्रह्मा के कमण्डल का अनुष्ठान है गंगा।
शंकर की जटाओं में लिये स्थान है गंगा,
धरती के लिये स्वर्ग का सोपान है गंगा।
यदि गंगाजल का दर्श-स्पर्श-पान मिल गया,
तो तीनों देवताओं का वरदान मिल गया।।
प्रभात शंकर जी की पंक्तियां गंगा के सीने में करवटें बदलते आर्त्तनाद से जुड़कर एक श्रद्धालु का संवेदनशील प्रश्न बन जाती हैं –
तू कभी पांव के छागल को बजाती आई
कभी कल-कल कभी छल-छल भी सुनाती आई
पत्थरों में भी तू हलचल-सी मचाती आई
सहमी-सहमी-सी तेरी आज रवानी क्यों है?
बोल गंगा ये तेरी आंख में पानी क्यों है ?
गंगा को भावना और निष्ठा की तरल अभिव्यक्ति तथा भक्ति और अनुरक्ति की संयुक्ति मानने वाले कविवर श्रीकृष्ण तिवारी की उद्भावना है कि गंगा पर मंडराता संकट प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रतिमान के विखंडन का संकेत है –
कण्ठ से गंगोत्री के
बह रही तुम छन्द-सी
सभ्यता की और संस्कृति की
सही पहचान हो,
हिमशिखर की वादियों से
जंगलों मैदान तक
तुम लहर की बांसुरी पर
जिन्दगी का गान हो।
जाह्नवी जिस दिन तुम्हारा
स्वर शिथिल हो जायेगा,
देश की संजीवनी का
गीत ही मर जायेगा।
कवि ने कभी जो चिन्ता प्रकट की थी, जो आकांक्षा जताई थी, वह धीरे-धीरे सघन होती जा रही है। प्रसुप्त लोकचेतना, प्रवंचक राजनीति और पाखण्डी मानसिकता के तहत गंगा के संरक्षण के लिये कागजी प्रचार तो बहुत होता है, उसकी दुर्दशा का उपचार नहीं होता! कविवर कैलाश गौतम की 'गूंगी गंगा' शीर्षक कविता इस देश की आलोड़ित संवेदना की शाब्दिक अभिव्यंजना है। कैलाश के स्वर में हमारी अभिशप्त सदी में जीवन्त त्रासदी बन गई गंगा की छटपटाहट है, जो यदि सुनी न गई तो हमारे भविष्य की लड़खड़ाहट भी बन सकती है क्योंकि गंगा इस राष्ट्र की प्राण-रेखा भी है –
गंगा की बात क्या करूं गंगा उदास है,
वह जूझ रही खुद से और बदहवास है।
ना अब वो रूप-रंग है ना वो मिठास है,
गंगाजली को जल नहीं गंगा के पास है।
असहाय है लाचार है मजबूर है गंगा,
अब हैसियत से अपनी बहुत दूर है गंगा।
कैसी रही क्या हो गई हैरान है गंगा,
शीशे में खुद को देख परेशान है गंगा।
मैदान ही मैदान है मैदान है गंगा,
कुछ ही दिनों की लगता है मेहमान है गंगा।
गो, गंगा और गीता हमारी सांस्कृतिक चेतना की त्रिपदा गायत्री का स्वरूप हैं। गोवंश को हमारी नृशंस व्यवस्था ने मांस-निर्यातकों के लिये सहज उपलब्ध कराने का बीड़ा उठा रखा है तो गीता केवल अदालत में शपथ खाने के काम में प्रयुक्त हो रही है। अब वह इस प्रगतिशील भारत के लिये जीवनदृष्टि प्रदायिका तथा आचरण की संदर्शिका नहीं रही। उसका उल्लेख मात्र व्यक्ति के ऊपर साम्प्रदायिक होने का ठप्पा लगवाने के लिये पर्याप्त है। रह गई गंगा, वह हमारी अकर्मण्यता, दीर्घसूत्रता और खुरदुरे यथार्थ से आंखें बन्द कर लेने की शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति के अनवरत प्रयोग का उदाहरण बन कर रह गई है। कैलाश गौतम जी की पंक्तियों से ही नि:श्वासों भरे इस आलेख को विराम देता हूं –
गंगा के पास दर्द है आवाज नहीं है,
मुंह खोलने का गोत्र में रिवाज नहीं है।
गंगा नहीं रहेगी यही हाल रहा तो,
कब तक यहां बहेगी यही हाल रहा तो।
कुछ कीजिये उपाय प्रदूषण भगाइये,
गंगा पे आंच आ रही गंगा बचाइये।
अभिव्यक्ति मुद्राएं
बना खिलौनों के बचपन गुजार आये हैं,
हम अपने मन को बहुत पहले मार आये हैं
गये थे भूल से इक बार हम दुखों की तरफ,
फिर उसके बाद वो खुद बार-बार आये हैं।
– राजेश रेड्डी
और भी चाहिये कुछ दिल के उजालों के लिये,
सोने-चांदी से उजाला नहीं होने वाला।
लाख इसरार करें कितना ही रोयें बच्चे,
सस्ता अब कोई खिलौना नहीं होने वाला।
– हस्तीमल हस्ती
मेरी खामोशियों में भी फसाना ढंूढ लेती है,
बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ लेती है।
-राजेन्द्र तिवारीं











