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पिछले दिनों 'राष्ट्रधर्म-गौरव सम्मान' से अलंकृत होकर बहु-आयामी रचनाकार अशाोक अंजुम की कृति 'प्रिया तुम्हारा गांव' पुन: सुविज्ञ जनों के मध्य चर्चा का विषय बनी। राष्ट्रवादी चेतना के प्रचारक सम्पादक-द्वय श्री आनन्द मिश्र 'अभय' तथा श्री बल्देव भाई शर्मा के सन्निध्य में सम्मानित अशोक अंजुम हमारे दौर के अति प्रतिभावन्त रचनाकारों की प्रथम पंक्ति में हैं। हाल ही में प्रख्यात समीक्षक श्री जितेन्द्र जौहर के सम्पादन में प्रकाशित 'रोशनी का घट' उनके अप्रतिम रचनाधर्मी स्वरूप का विविधावर्णी रेखांकन लेकर सामने आया था। अब प्रतिभाओं को प्रश्रय और प्रोत्साहन देने की अपनी गरिमामयी परम्परा के अनुरूप राष्ट्रधर्म ने साधना के एक जाग्रत प्रदीप पर अभिनन्दन के अक्षत बरसा कर एक सराहनीय कार्य किया है।
एक समय था जब तथाकथित नव्यता के पक्षधरों ने समस्त छान्दसिक कविता को नकार रखा था। गीत को युग-बाह्य घोषित कर दिया गया था। वाचिक कविता के मंच को हेय-दृष्टि से देखने का बौद्धिक फैशन प्रचलित किया गया था। बहुमान्य साहित्यिक पत्रिकाओं के पश्चिमी दृष्टि से आक्रान्त सम्पादकों ने गीति-रचनाओं के लिये प्रवेश-निषेध की तख्तियां लटका रखी थीं और दुराग्रही समीक्षा के शिविर सिर्फ कुछ अपनों को उनमें प्रवेश करने का अधिकार-पत्रक सौंप कर छन्द से, लय से, गीति-विधा से जुड़े हर अधिष्ठान को अवमानित और अपमानित कर रहे थे।
धीरे-धीरे तथाकथित महानुभावों की इस प्रकृति में तब परिवर्तन परिलक्षित होने लगे जब 'नई कविता' के एक महत्वपूर्ण ध्वजवाहक दुष्यन्त कुमार ने आपातकालीन परिवेश में अपने अन्तस् के आर्त्तनाद को प्रकट करने के लिये गजल जैसी लयात्मक और छन्दोबद्ध विधा का सहारा लिया, और तब गीतात्मकता पर लगाये गये तमाम प्रश्नचिह्न निष्प्रभ हो गये। इसी कालखण्ड के आस-पास अनेकानेक प्रतिभावन्त कवियों ने हिन्दी के सर्वाधिक पुराने छन्द दोहे में स्वयं को अभिव्यक्त करना प्रारंभ किया और इस बार उन्हें हाथों-हाथ लिया गया। धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं ने उन्हें सर-माथे बिठाया। धीरे-धीरे हिन्दी की छान्दसिक कविता पुन: प्रतिष्ठित हुई और युग की तमाम सामर्थ्यवन्त कलमों ने गीत-गजल और दोहों के संग्रह प्रस्तुत किये। इसी परिप्रेक्ष्य में और इसी परिवेश में प्रस्तुत हुई है – 'प्रिया तुम्हारा गांव।' कविवर नीरज का अभिमत है- अशोक अंजुम बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं। कविता में गीत, गजल, दोहा, हास्य व्यंग्य, लघुकथा, समीक्षा, कहानी आदि के साथ-साथ चित्रकला, सम्पादन और अभिनय के क्षेत्र में भी आपकी मजबूत पकड़ है।….. अशोक अंजुम को दोहे की समझ है। दोहे के सन्दर्भ में स्वयं नीरज जी की मान्यता है कि –
गागर में सागर भरे मुंदरी में नवरत्न,
अगर न ये दोहा करे, हैं सब व्यर्थ प्रयत्न।
गागर में सागर भरने वाली बात तो बिहारी के समय से कही जा रही है किन्तु एक मुद्रिका में नवरत्नों को जड़ देने की कला को इससे अनुस्यूत कर नीरज जी सन्देश देना चाहते हैं कि जीवन के विविधतापूर्ण प्रसंगों, आवेगों और संवेगों की कलात्मक प्रस्तुति इस विधान की अपेक्षा है। इन्द्र धनुष में सात रंग होते हैं और वह कभी-कभी ही आकाश में प्रकट होते हैं किन्तु माणिक-मोती-वैदूर्य-पुखराज-नीलम आदि विविध रत्न नवग्रहों से सम्बन्धित होते हैं जो मानव-जीवन को आदि से अन्त तक प्रभावित करते हैं। इनकी छवि को मात्र अलंकरणी आभा से उठाकर कल्याणदात्री भूमिका में प्रतिष्ठित करना लेखनी का उद्देश्य होना चाहिये। अशोक अंजुम के दोहे भाषा की स्वर्ण मुद्रिका में कलात्मक रूप से जड़े बहुमूल्य भाव-रत्नों की मंगलमयी प्रस्तुतियां हैं। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं –
प्रिया तुम्हारा गांव है जादू का संसार,
पलक झपकते बीततीं सदियां कई हजार।
धूल झाड़कर जब पढ़ी यादों जड़ी किताब,
हर पन्ने पर मिल गये सूखे हुए गुलाब। श्रृंगार के इस अहसास के पार्श्व में ही है वक्त की गहरी नि:श्वास –
अब अपने सन्त्रास को किससे कहें कबीर,
अपने–अपने घाव हैं अपनी–अपनी पीर।
प्रकृति के साथ किये गये तथाकथित प्रगति के अत्याचार की कहानी इन दोहों की जुबानी बेहद मार्मिक हो उठी है –
आरी ने घायल किये हरियाली के पांव,
कंकरीट में दब गया होरी वाला गांव।
दूर शहर की चिमनियां देतीं ये आभास,
जैसे बीड़ी पी रहे बुङ्ढे कई उदास।
साधुवाद 'राष्ट्रधर्म', बधाई-अशोक अंजुम जी।
अभिव्यक्ति मुद्राएं
चलना है मुझे पांव के छालों के बावजूद,
आवाज कोई दूर बुलाये है इन दिनों।
–अखिलेश तिवारी
इक परिन्दा हूं चोट खाया हुआ,
प्यार से आके तू उठा मुझको।
मैं मुसाफिर हूं और तू मंजिल,
तुझको ढूंढूं कहां बता मुझको।
–पारसनाथ बुलचन्दानी
मिलके चलना बहुत जरूरी है,
अब संभलना बहुत जरूरी है।
गुत्थियां हो गईं जटिल कितनी,
हल निकलना बहुत जरूरी है।
–मनोज अबोध
हिन्दी हम सबकी परिभाषा
कुछ दिन पूर्व दक्षिण अफ्रीका में विश्व हिन्दी सम्मेलन सम्पन्न हुआ था। अभी समाचार पत्रों में मॉरीशस में सम्पन्न एक अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के समाचार प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी को विश्व-भाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने हेतु सर्वत्र प्रस्ताव पारित हो रहे हैं, विदेशी परिवेश में हिन्दी का उन्मेश निश्चय ही आह्लादित करता है, किन्तु अपने देश में उसकी सर्वत्र उपेक्षा का दंश ही नहीं चुभता, बल्कि उसको निश्प्रभ करने के राजकीय प्रयत्न संविधान की व्यवस्थाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं! सर्वत्र अपने उपनिवेश बनाते जा रहे अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय और पूर्णत: पश्चिमी दृष्टि को समर्पित होती जा रही हमारी शिक्षा-व्यवस्था बच्चो को 'बाबा ब्लैकशीप' का मन्त्र रटाते हुए उनसे उनकी मातृभाषा ही छीन रही है। कभी (स्व.) लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने एक हिन्दी-गीत लिखा था, जिसे तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के मंच से श्रीमती महादेवी वर्मा ने विश्व हिन्दी सम्मेलनों का बोध-गीत घोषित किया था। उसकी प्रारंभिक और अन्तिम पंक्तियां हिन्दी की परिभाषा को भी शब्दायित करती हैं, उसकी अपेक्षाओं को भी ध्वनित करती हैं। उन्हीं से आज की बात को विराम देता हूं-
कोटि–कोटि कंठों की भाषा
जनगण की मुखरित अभिलाषा
हिन्दी है पहचान हमारी
हिन्दी हम सबकी परिभाषा।…….
हिन्दी आज चाहती हमसे
हम सब निश्छल अन्त:स्थल से,
सहज विनम्र अथक यत्नों से,
मांगें न्याय आज से कल से।द











