चर्चा सत्र
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बल्देव भाई शर्मा
खबर है कि कांग्रेस सुरेश कलमाड़ी, ए.राजा और कनिमोझी पर फिर मेहरबान हो गई है और संप्रग सरकार ने तीनों को क्रमश: विदेश मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति, ऊर्जा मंत्रालय व गृह मंत्रालय की समिति में नामांकित कर दिया है। आश्चर्य तो यह है कि भ्रष्टाचारियों पर मेहरबान इस सरकार की मार्गदर्शक व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गुजरात विधानसभा का चुनाव अभियान शुरू करते हुए राजकोट में मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप जड़ दिए। इसे कहते हैं कि सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद। भ्रष्टाचार के मामले में अनगिनत आरोपों से घिरी कांग्रेसी सरकार 'मेरी कमीज से तेरी कमीज ज्यादा सफेद क्यों' की तर्ज पर व्यवहार कर रही है। अब यह सरकार कोयला खदान आवंटन की जांच 1993 से कराने की बात कर रही है ताकि वह अपने दामन पर लगी 1.86 लाख करोड़ की कोयले की कालिख की ओर से वह जनता का ध्यान हटा सके। राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के सूत्रधार जिन कलमाड़ी के लंदन ओलंपिक में जाने से भारत की छवि धूमिल होने की बात स्वयं संप्रग सरकार के खेल राज्यमंत्री अजय माकन ने कही थी, वही कलमाड़ी अब कांग्रेस के दुलारे बन गए! प्रश्न उठता है कि क्या कलमाड़ी अब पाक साफ हो गए? इस तरह भ्रष्टाचारियों को गले लगाए रखने वाली कांग्रेस की अध्यक्ष किस मुंह से भ्रष्टाचार के लिए मोदी सरकार को कोस रही हैं?
सरकार विहीनता की स्थिति
अब तक की सबसे भ्रष्ट साबित हो चुकी इस सरकार की नीतियों ने न केवल आम जन की खुशियों का गला घोंट दिया, बल्कि देश की सुरक्षा और स्वाभिमान को भी खतरे में डालने वाली अनेक गतिविधियों में वह लिप्त रही है। परिणामत: उसे सहारा देने वाले घटक दल भी उसका साथ छोड़ गए। संप्रग की सबसे बड़ी घटक रही तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की खटास तो इस सरकार के प्रति इतनी बढ़ गई है कि उन्हें अब यह कहने में भी संकोच नहीं कि 'संप्रग सरकार संसद का विश्वास खो चुकी है। इसके बावजूद वह जनविरोधी फैसले लेने को आतुर है। रिटेल में एफडीआई लागू करके मनमोहन सरकार ने देश को बेच दिया है। जो भी सरकार के खिलाफ आवाज उठाता है, उसे सीबीआई का डर दिखाकर चुप करा दिया जाता है।'
वस्तुत: देश में सरकार जैसी कोई व्यवस्था काम करती दिखती ही नहीं है, जो ढांचा है वह डा.मनमोहन सिंह की आड़ में सोनिया गांधी व राहुल गांधी के निर्देशों पर कांग्रेस के सत्ता-स्वार्थ साधने का उपक्रम मात्र है। देश का सम्मान व जनता की खुशहाली उसके एजेंडे में कहीं दिखती ही नहीं है। परिणामत: अब सरकार के रुख से नाराज देश की सर्वोच्च अदालत को भी कहना पड़ रहा है कि 'भगवान भला करें इस देश का'। सरकार के विरुद्ध नाराजगी जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की। एक मामले में शहरी विकास मंत्रालय के सचिव को नोटिस जारी करते हुए न्यायालय ने कहा कि 'आप गहरी नींद में सोये हैं और आप अदालत से चाहते हैं कि वह आपको जगाए! भगवान आपका व इस देश का भला करें।' अदालत की टिप्पणी के निहितार्थ समझे जा सकते हैं कि इस सरकार के क्रियाकलापों से देश की जनता में चहुंओर निराशा है, जितने दिन यह सरकार रहेगी, उतना ही राष्ट्रहित और जनहित का नुकसान करेगी। जितनी जल्दी इस सरकार से देश को मुक्ति मिले उतना अच्छा होगा। देश के लिए यही अच्छा होगा कि वह जितनी जल्दी हो इस सरकार विहीनता की स्थिति से निजात पाए।
सत्ता–राजनीति का दुष्परिणाम
कांग्रेस की सत्ता-राजनीति और सेकुलरवाद के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण ने भारत की राजनीति को कितना विकृत कर दिया है, इसकी दुष्प्रेरणा से संप्रग को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के राज में उत्तर प्रदेश में निरंतर तेज हो रहा मजहबी उन्माद आंखें खोल देने वाला है। उधर, कांग्रेस शासित असम में सत्ता की राजनीति से शह पा रहे बंगलादेशी घुसपैठियों ने बोडो क्षेत्रों में हिंसा का कैसा कहर ढाया, यह देश को चिंता में डालने वाला है। इसी सत्ता की राजनीति से भस्मासुर बन रहा जिहादी आतंकवाद किस तरह संप्रग सरकार के 8 सालों में देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा बन गया है और हजारों निर्दोष नागरिकों व सुरक्षा बलों के जवानों की बलि ले चुका है, यह देशवासियों की संवेदनाओं को झकझोर देने वाला है। अपने सत्ता-स्वार्थों और सरकार के दामन पर लगे भ्रष्टाचारी दागों को धोने के लिए किस तरह संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग व उन पर हमला किया जा रहा है, इससे भारतीय लोकतंत्र के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन पर सर्वोच्च न्यायालय की राय को अपने बचाव का कवच बनाकर व्याख्यायित किया जा रहा है। सोनिया कांग्रेस की पूर्वज इंदिरा गांधी कहा करती थीं कि भ्रष्टाचार तो वैश्विक समस्या है, यानी इसकी आड़ में हमारा सरकारी भ्रष्टाचार भी उचित मान लिया गया। इसी तर्ज पर संप्रग सरकार मान रही है कि सर्वोच्च न्यायालय की राय के मुताबिक तो बिना नीलामी के कोयला खदानों का आवंटन उचित हुआ है, उसमें कोई धांधली नहीं हुई अर्थात 1.86 लाख करोड़ का महाघोटाला खारिज।
राजनीति के सामने चुनौती
क्या इस मानसिकता से देश चलेगा? देश की जनता के लिए यह गंभीर विचार का प्रश्न है और उन राजनीतिक दलों के लिए भी जो अपने राष्ट्रवादी वैचारिक अधिष्ठान पर चलते हुए राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हैं। आज सत्ता के लिए सेकुलर प्रधानमंत्री या सेकुलर राजनीति का नारा दिया जाना क्या कांग्रेस की ही कुत्सित राजनीति को प्रकारांतर से परिपुष्ट नहीं करेगा? सत्ता से बड़ा देश, इस मंत्र को भूलकर राजनीति के द्वारा राष्ट्रहित का पोषण कभी नहीं हो सकता। हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक करार देने वाली कांग्रेस ने तो देश विभाजन का राष्ट्रीय अपराध करने वाली मुस्लिम लीग से भी सत्ता के लिए चुनावी गठबंधन कर लिया और कह दिया कि यह मुस्लिम लीग दूसरी है, वह नहीं। कांग्रेस की इसी साम्प्रदायिक राजनीति में से मुस्लिम तुष्टीकरण व अल्पसंख्यकवाद खड़ा हुआ जो आज सेकुलर दलों के लिए भी सत्ता का 'शार्टकट' सा बन गया है। क्या इस सेकुलरवाद की नीति पर चलकर देश का भला होगा? इसी सेकुलरवाद ने आज देश की एकता-अखंडता के सामने कितने ही खतरे खड़े कर दिए हैं और पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक फिर से विभाजन की स्थितियां निर्माण कर दी हैं। इससे उत्साहित राष्ट्रद्रोही और अलगाववादी तत्व खुलेआम इस सरकार की नाक के नीचे देश विभाजन के नारे लगाते हैं और सरकार आंखें मूंद लेती है कि जैसे देश में कोई शासन ही नहीं है, जो चाहे जैसे चाहे कर सकता है, भारत का कोई पुरसाहाल नहीं। इन स्थितियों से देश को निकालना और एक सुखी, समृद्ध व स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में खड़ा करना देश की राजनीति के सामने एक बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को स्वीकार कर देश के हालात बदलने के लिए जो आगे बढ़ेगा, जनता उसके साथ खड़ी होगी, क्योंकि जनता इस सरकार और देश के हालात से आजिज आ चुकी है।










