गीली स्याही दिंनाक: 22 Sep 2012 13:48:09 परिवर्तन की भी कभी कथा लिखता हूं मैं इक विचार हूं चाहे भावुकता हूं बच्चों के भोले मन में कभी उगी जो मैं परी-कथाओं की सी उत्सुकता हूं। ज्यादा होता जल कभी बहा ले जाता नूतन अभिलेखों की गीली हूं स्याही दिल में जो उतर गया तो निर्मल कर हूं आंखों में आने की कब रही मनाही होगा मुझमें थोड़ा गीलापन बाकी मैं कोर नयन का या तल की सिकता हूं वन की ज्वाला सा हूं खुद ही में जलता मैं धाय-पुष्प सा हूं जंगल में खिलता घर में रह कर मद का संधान करूंगा आसव बनकर मैं तृष्णाओं को छलता विष का आचमन सही पर कब मारक हूं जीवन अनुभव बनकर पथ में रुकता हूं मैं हूं विकास का हामी पर पिछड़ा हूं कुछ पूर्वाग्रह भी है कुछ हूं प्रतिगामी कहने को तो हूं सजग बुद्धि का स्वामी कुछ मूर्खताओं का भी हूं पर अनुगामी इस जड़ता में अपनी मानवता खोजूं दोनों ही लड्डू हाथों में रखता हूं।