अनोखी शैली में प्रेरक प्रसंग
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सामान्यत: प्रेरक प्रसंगों की पुस्तकों में महान विभूतियों के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण और प्रेरणास्पद घटनाओं का संकलन होता है। प्राय: ऐसी पुस्तकें बच्चों को ध्यान में रखकर लिखी जाती हैं। लेकिन हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक 'प्रेरक' प्रसंग' में चयनित विभूतियों और उनके जीवन के प्रेरक प्रसंगों को प्रस्तुत करने का अंदाज कुछ अनोखा है। सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु ने उसमें कुल 34 व्यक्तियों के जीवन की प्रमुख घटनाओं का वर्णन किया है। यह पुस्तक कई आयामों में परम्परागत प्रेरक प्रसंगाधारित पुस्तकों से अलग है। पहली बात तो यह कि इसमें चुने गए लोग कई क्षेत्रों से संबंधित हैं। दूसरी बात, इसमें देशी के साथ ही कुछ विदेशी विभूतियां भी शामिल हैं। इसके अलावा इसमें एक-दो ऐसे लोग भी सम्मिलित हैं जो बहुत नामचीन नहीं थे लेकिन उनका कृतित्व और परमार्थी जीवन उन्हें महानता की पदवी पर प्रतिष्ठित करता है।
इस पुस्तक में महावीर द्विवेदी, प्रेमचंद और निराला जैसे अद्वितीय लेखकों के साथ संतराम और सानेगुरु के अवदान को भी रेखांकित किया गया है। क्रांतिकारी ऊधम सिंह, अजीमुल्ला खां, रानी लक्ष्मीबाई और राजगुरु की गौरवगाथा भी इसमें दर्ज है। होमी जहांगीर भाभा और जगदीश चंद्र बसु जैसे भारतीय वैज्ञानिकों की वैज्ञानिक उपलब्धि को इसमें रेखांकित किया गया है तो गैलीलियो और लुई पाश्कर जैसे विदेशी वैज्ञानिकों के प्रयोगों को भी लिपिबद्ध किया गया है। इस पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि इसमें प्राचीन काल से लेकर आधुनिक दौर के विशिष्ट व्यक्तियों को समेटा गया है। मिसाल के तौर पर गोस्वामी तुलसीदास, अमीर खुसरो के साथ पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में हुई परमार वंश की वीरांगना महारानी मल्हना तक की जीवन कथा भी इसमें संकलित है। पुस्तक में स्वाधीनता संघर्ष में अपना बलिदान देने वाली आजीजन बाई (पेशे से तवायफ) जैसी विलक्षण महिला की मार्मिक कथा भी है, जो इस बात को प्रमाणित करती है कि उच्च विचार और देश-समाज के लिए गहन भावना रखने वाला सामान्य व्यक्ति भी सदैव के लिए इतिहास में अमर हो सकता है।
मूलत: कानपुर के लेखक राष्ट्रबंधु ने पुस्तक में महिला चिकित्सक डा. एस.के. बोरवणकर की कर्तव्य पराणयता को भी पूरी मार्मिकता से लिखा है। कानपुर को ही अपनी कर्मभूमि बनाने वाली डा. बोरवणकर के बारे में कानपुर के लोग ही बहुत कम जानते होंगे। इस तरह लेखक ने अलग-अलग कालखण्डों में हुए और अलग-अलग क्षेत्रों से सम्बंधित प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की प्रमुख घटनाओं को एक जगह संकलित कर श्रमसाध्य कार्य किया है। हालांकि शख्सियतों के चयन में अगर लेखक कोई निश्चित मानक तय कर लेते तो यह पुस्तक और भी प्रभावी बन सकती थी। अपनी भूमिका में उन्होंने कुछ स्पष्ट करते हुए लिखा है, 'राष्ट्र के लिए मरने वालों का आकलन यत्किंचित ही सही, लेकिन किया गया है, लेकिन राष्ट्र के लिए जीने वालों का आकलन हुआ ही नहीं है।' यही वजह है कि समीक्ष्य पुस्तक में लेखक ने देश के लिए शहीद होने वाले देशभक्तों के साथ ही अपनी रचनात्मकता और राष्ट्र व समाजोत्थान की दिशा में सक्रिय और पूरा जीवन अर्पण करने वालों को भी शामिल किया है। पुस्तक की भाषा-शैली भी अपारंपरिक है। एक-दो लोगों के प्रसंग लिखने में लेखक ने आत्मकथात्मक शैली अपनाई है। बहरहाल, यह पुस्तक पढ़ने में रोचक और बच्चों के साथ ही बड़ी उम्र के लोगों को भी प्रेरणा देने योग्य है।
पुस्तक का नाम – प्रेरक प्रसंग
लेखक – डा. राष्ट्रबंधु
प्रकाशक – प्रतिभा प्रतिष्ठान
1161, दखनीराय स्ट्रीट,
नेताजी सुभाष मार्ग
नई दिल्ली-110002
मूल्य – 150 रु. पृष्ठ – 119
कर्मयोगी अरविन्द के अमूल्य विचार
युगद्रष्टा, विचारक, क्रांतिकारी, राजनीतिक चिंतक और महान योगी श्री अरविन्द बहुप्रतिभा संपन्न विभूति थे। वह अपने जीवन में कई आयामों में सक्रिय रहे और आयामों में उत्कर्ष को स्पर्श किया। जाहिर है, ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व के विचार हर किसी के लिए मूल्यवान हैं। उन्होंने जीवन और पराजीवन के संदर्भ में अभूतपूर्व विचार व्यक्त किए। जीवन से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा पक्ष हो जिस पर महर्षि अरविन्द की दृष्टि न पड़ी हो। उनके ऐसे ही कुछ मूल्यवान विचारों का संकलन हाल ही में 'मैं अरविन्द बोल रहा हूं' शीर्षक से प्रकाशित होकर आया है। यही सही है कि महात्मा गांधी से पूर्व देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने वालों में श्री अरविन्द प्रमुख थे। इसलिए उस दौरान (जब वे युवा थे) एक राजनीतिक कार्यकर्ता और क्रांतिकारी के तौर पर सक्रिय रहते हुए उनके विचार एक गहन राष्ट्रवादी होने को प्रमाणित करते हैं। देशभक्ति के बारे में उन्होंने कहा था, 'देशभक्ति के अपराध में हमें कोई भी दंड दिया जाए, राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने में हमें किसी भी खतरे का सामना करना पड़े, तो भी हमें आगे ही बढ़ना चाहिए। देश का कार्य करना ही चाहिए।'
इसी तरह भारतीय संस्कृति के बारे में उनका विचार था कि 'भारत को अपनी रक्षा करनी होगी और इसके लिए उसे अपने सांस्कृतिक विधि-विधानों का एक प्रकार नया निर्माण करना होगा कि वह उसके प्राचीन आदर्श को अधिक घनिष्ठ एवं पूर्ण रूप में प्रकट करे।' देश की स्वतंत्रता को नितांत आवश्यक बताते हुए उन्होंने कहा था, 'स्वतंत्रता भी जीवन के लिए उतनी आवश्यक है, जितना कि विधान और शासन पद्धति।' लेकिन इसके साथ ही स्वतंत्रता को उन्होंने आत्मा से जोड़ते हुए कहा था, 'अपने आप में स्वतंत्र बनो ओर इस प्रकार अपने मन, प्राण और शरीर में स्वतंत्र बनो, कारण-आत्मा स्वतंत्र है।'
अपनी जीवन यात्रा के उत्तरार्द्ध में पहुंचने पर जब उन्हें यह आभास हुआ कि देश की स्वतंत्रता के संघर्ष का नेतृत्व किसी और को संभालना है, तो उन्होंने स्वयं को आत्मसाधना में लीन करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने निर्जन व शांत द्वीप पांडिचेरी को चुना। वहां उन्होंने लगभग 40 वर्ष तक आत्मसाधना की। इस दौरान उन्होंने जो अनुभूतियां कीं, उन्हें भी सरल शब्दों में व्यक्त किया। इसके पीछे उनका उद्देश्य समस्त मानव जाति का कल्याण ही था। आध्यात्मिकता को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा था, 'जब हम अहं से भिन्न किसी अन्य चेतना को जानना और उनमें निवास करना या इसमें प्रभाव के अधीन होना प्रारंभ करते हैं तो यह आध्यात्मिकता होती है। वह विशाल, अनंत, स्वयंभू और अहंकार इत्यादि से रहित चेतना ही परमात्मा कहलाती है। अत: निश्चित ही आध्यात्मिकता का यही अर्थ है।' धर्म संबंधी उनकी व्याख्या बेहद विस्तृत अर्थों वाली और आधुनिक संदर्भों में अधिक प्रासंगिक जान पड़ती है। उन्होंने कहा था, 'धर्म एक साथ ही कर्म का मार्मिक नियम और हमारी प्रकृति का गंभीरतम विधान है। यह कोई ऐसा सिद्धांत, धर्ममत या आदर्श नहीं है, जो नैतिक और सामाजिक नियम मात्र को प्रेरणा देता हो। धर्म तो हमारे जीवन के सभी अंगों के कार्य व्यापार का यथार्थ विधान है।'
श्री अरविन्द के विचार केवल वैयक्तिक या आत्मिक विकास तक केन्द्रित न होकर समस्त मानव समुदाय के कल्याण और विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं। सच कहा जाए तो वे मूलत: एक आध्यात्मिक पुरुष थे लेकिन उनका अध्यात्मवाद केवल आत्मकेन्द्रित नहीं था। वह आत्महित के साथ ही जगतहित के लिए भी प्रत्यनशील रहने के पक्षधर थे। यही कारण है कि उनके विचारो में हम आत्मा, परमात्मा, जगत, जीवन, समाज, राष्ट्र और आम आदमी के सुख-दु:ख को भी पाते हैं। यह विचार हमें आदर्श जीवन जीने की कला सिखाते हैं। ऐसी पुस्तक पाठकों को उपलब्ध कराने के लिए लेखक का साधुवाद।










