सीना ताने सीमा पर... दिंनाक: 25 Aug 2012 16:45:53 कमल किशोर 'भावुक' हल की नोकों से लिख-लिखकर, कविता रोज सुनाते हैं। धरती के साधक माटी का मान किसान बढ़ाते हैं। खून-पसीना जब मेहनतकश ये मजदूर बहाते हैं। ऊंचे-ऊंचे महल तभी तो तने-खड़े मुस्काते हैं। बच्चों को दाना चुगवाना, फिर भूखे ही सो जाना, हमने देखा घर के पंछी परदेशी हो जाते हैं। मत पूछो कितने गरीब है, जिनके पास नहीं है रोटी, कर्जा तो ले लेते हैं पर कर्जा नहीं चुकाते हैं। उस शिल्पी के हाथों को ही ये दुनिया कटवा लेती, पत्थर को भी काट-छांटकर जो भगवान बनाते हैं। हमने देखा वह आंगन भी फूट-फूटकर रोता है, गोदी में जो खेले बच्चे वो दीवार उठाते हैं। चादर ताने तब सोते हम, सीना ताने सीमा पर- सजग खड़े ये सैनिक अपना जब सुख-चैन लुटाते हैं।