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Written byArchiveArchive
Aug 20, 2012, 12:00 am IST
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जागो हिन्दू जागो

दिंनाक: 20 Aug 2012 11:27:27

विदेशी/विधर्मी ताकतों को परास्त करने के लिए

स्वदेश चिन्तन

 नरेन्द्र सहगल

बंगलादेशी घुसपैठिए असम को बना रहे हैं कश्मीर

जिन जिहादी ताकतों ने निरंतर हिन्दू विरोधी हिंसक अभियान चलाकर कश्मीर को हिन्दू- विहीन करके भारत से काटने के षड्यंत्र रचे हैं, वही तत्व अब असम को भी हिन्दू-विहीन करने की खूनी मुहिम चला रहे हैं। बलात्  मतान्तरण, नरसंहार, आगजनी और पलायन का जो मंजर कश्मीर घाटी में चलाया गया वही असम में दोहराया जा रहा है। असम सहित पूरे देश में बंगलादेशी घुसपैठियों की तादाद चार करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। इन बंगलादेशी घुसपैठियों से न केवल जनसंख्या का अनुपात ही बिगड़ा है अपितु असम के कश्मीर बन जाने का खतरा भी पैदा हो गया है। जहां कश्मीर में दूसरे पाकिस्तान ने जन्म ले लिया है, वहीं असम में तीसरे पाकिस्तान की जमीन इन बंगलादेशी घुसपैठियों ने तैयार कर दी है।

असम में इस समय 38 विद्रोही गुट सक्रिय हैं। इनमें 13 गुटों पर स्थानीय और बंगलादेशी मुसलमानों का पूरा कब्जा है। मुस्लिम सिक्युरिटी काउंसिल, इस्लामिक लिबरेशन आर्मी, मुस्लिम वालंटियर फोर्स, इस्लामिक सेवक संघ, रेवोल्युशनरी मुस्लिम कमांडोज, मुस्लिम टाइगर फोर्स,  यूनाइटेड रिफोरमेशन प्रोटेस्ट आफ इंडिया, हरकत उल मुजाहिद्दीन और हरकत उल जिहाद इत्यादि हथियारबंद संगठनों को पाकिस्तान और चीन से सहायता मिलती है। ये सभी संगठन बंगलादेशी मुसलमानों को सीमा पार से आने, छिपने, रहने, कारोबार करने, हिन्दुओं की जमीनों पर कब्जा करने, भारत की नागरिकता लेने और मताधिकार प्राप्त करने में मदद करते हैं।

असम के अनेक जिले मुस्लिम-बहुल हो गए हैं। यहां हिन्दुओं का जीना असंभव बन गया है। 126 विधानसभा क्षेत्रों में 56 पर बंगलादेशियों का वर्चस्व स्थापित हो गया है। पूर्वोत्तर भारत के दूरदराज के इलाकों तक इनकी बस्तियां बढ़ रही हैं। मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर और नागालैंड भी इनके शिकंजे में आने वाले हैं। राजधानी दिल्ली सहित भारत के प्राय: सभी बड़े शहरों तक इन विदेशी घुसपैठियों ने पांव पसार लिए हैं। इनका गैर कानूनी जमावड़ा, स्थानीय मुस्लिम संगठनों का सहयोग, सरकार की देशघातक राजनीति, सुरक्षा बलों को दिए जाने वाले आधे-अधूरे आदेश और हिन्दुओं की मजबूरी लाचारी ही वर्तमान त्रासदी का आधार है। बंगलादेशी मुसलमानों द्वारा किया गया यह वर्तमान शक्ति प्रदर्शन पूर्व नियोजित है। सौ से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। 500 गांवों के 5000 घर फूंक दिए गए हैं। लगभग 5 लाख लोग 200 शिविरों में पहुंच गए हैं।

सीआरपीएफ के इंटेलीजेंस सैल की रपट के अनुसार बंगलादेशियों की घुसपैठ ने असम का जनसांख्यिकी संतुलन बिगाड़ दिया है। इससे गैर-इस्लामिक धार्मिक समूहों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन असम को मुस्लिम राज्य बनाने के उद्देश्य से हिन्दुओं को पलायन कर जाने, इस्लाम कबूल करने अथवा परिणाम भुगतने की धमकियां देते हैं। इतना सब कुछ होते हुए भी सरकार खामोश है। सीमा पर घुसपैठ जारी है। पहले से आए घुसपैठियों की शिनाख्त नहीं हो रही। उन्हें वापस भेजने की कोई योजना नहीं है। सीमा को सील करने जैसा सशक्त कदम भी नहीं उठाया जा रहा।

 

मुम्बई में हुआ देशद्रोह का खुला प्रदर्शन

प्रश्न पैदा होता है कि असम में लगी जिहादी आग मुम्बई तक कैसे पहुंच गई? उत्तर बहुत सीधा है। अनेक मुल्ला-मौलवियों, कट्टरवादी मुस्लिम नेताओं और जिहादी आतंकी संगठनों ने शोर मचा दिया कि असम में केवल मुसलमान ही हिंसा के शिकार हुए हैं। फिर क्या था, असम में हो रहे दंगों और म्यांमार में हुए अल्पसंख्यकों (मुसलमानों) पर हमलों के विरोध में मुम्बई के मुस्लिम संगठन सड़कों पर उतर आए। दैनिक जागरण (12 अगस्त) में छपे समाचार के अनुसार 'आजाद मैदान में प्रदर्शन का आयोजन रजा अकादमी ने किया था, जिसमें सुन्नी जमायत उल उलेमा एवं जमाते रजा ए मुस्तफा जैसे कई संगठन शामिल थे। यहां लगभग 50,000 लोगों की भीड़ मौजूद थी।' इन प्रदर्शनकारियों ने जमकर तोड़फोड़ की। चालीस वाहन फूंक दिए। 42 पुलिसकर्मियों सहित 60-70 लोग घायल हुए हैं। दो की मृत्यु हुई। मीडिया वालों को भी नहीं छोड़ा गया।

यह वास्तव में फिरकापरस्त जुनून का परिणाम था। शुक्रवार की नमाज के बाद मजहबी नेताओं द्वारा प्रदर्शन में भाग लेने के लिए अपीलें की गईं। मोबाइल फोन के द्वारा म्यांमार और असम में हुई हिंसा की वीडियो क्लिप्स भी जारी की गईं। 'सिटीजन्स फार जस्टिस एंड पीस मुम्बई' ने रहस्योद्घाटन किया है कि यह वीडियो क्लिप्स झूठी हैं। यह सभी चित्र चीन और थाईलैंड की आपदाओं में मारे गए लोगों के हैं। सूत्रों के मुताबिक आजाद मैदान की बुकिंग महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार के दो मंत्रियों द्वारा करवाई गई थी। उन पर एकतरफा मजहबी जुनून का भूत सवार था। इनके सामने देशहित, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सौहार्द जैसी कोई चीज नहीं थी। क्या यह सब कुछ विदेशी घुसपैठियों और देशद्रोहियों के समर्थन में नहीं हो रहा? क्या ऐसी हरकतें भारत विरोधी नहीं हैं?

वोट बैंक की घटिया राजनीति का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार के आदेश पर मुम्बई की पुलिस ने दंगाइयों को इसलिए गिरफ्तार नहीं किया क्योंकि रमजान का महीना चल रहा था। बंगलादेशी घुसपैठियों के इन समर्थकों ने मुम्बई के सीएसटी स्टेशन के निकट स्थापित जवान ज्योति पर भी हमला कर दिया। क्या यह भारतीय सेना द्वारा प्रदर्शित शौर्य और बलिदानों का अपमान नहीं है? समाचारों के अनुसार इन दंगाइयों ने पाकिस्तान का झंडा भी फहराया? क्या यह शर्मनाक कृत्य देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आता?

सवाल यह भी है कि महाराष्ट्र सरकार ने रजा अकादमी को इस प्रकार की रैली करने की इजाजत ही क्यों दी? गोधरा नरसंहार के बाद गुजरात में हुई प्रतिक्रिया का आज तक शोर मचाने वाले कांग्रेसियों, जनतादलियों और समाजवादियों से देश की जनता जवाब चाहती है कि वे बंगलादेशी घुसपैठियों और पाकिस्तान समर्थक मुस्लिम गुटों द्वारा की जा रही हिंसा पर चुप क्यों हैं? मुम्बई की घटना के तार बंगलादेश, पाकिस्तान एवं म्यांमार से कैसे जुड़े?

 

जिहादी पाकिस्तान में बेलगाम हिन्दू उत्पीड़न

पाकिस्तान में हिन्दुओं की हालत बद से बदतर होती जा रही है। परिस्थितियां इतनी भयानक हो चुकी हैं कि 1947 में हुए भारत विभाजन के समय हुए पलायन अथवा विस्थापन का खूनी इतिहास दोहराया जा रहा है। हाल ही में पाकिस्तान से आए हिन्दुओं के एक जत्थे के नेता मुकेश कुमार आहूजा ने बताया कि पाकिस्तान में रह रहे सभी हिन्दू भारत आना चाहते हैं। पांच हजार से ज्यादा परिवारों ने तो वीजा के लिए अर्जियां दे दी हैं। वे वापस भी नहीं जाना चाहते। पाकिस्तान के साथ सदैव वार्तालाप के लिए गिड़गिड़ाने वाली भारत सरकार ने हिन्दुओं की इस दयनीय परिस्थितियों पर कभी चर्चा नहीं की और न ही मानवाधिकारों के इस ज्वलंत मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया। पाकिस्तानी हिन्दुओं का भविष्य इसलिए भी अंधकारमय है क्योंकि वहां की सरकार अंतरराष्ट्रीय बदनामी के डर से  हिन्दुओं को भारत आने की इजाजत नहीं दे रही और भारत सरकार इन्हें स्थाई रूप से यहां रखना नहीं चाहती। क्या भारत सरकार, सभी राजनीतिक दल, हिन्दू संगठन और भारतीय मुसलमान पाकिस्तान में हो रहे इस गैर-इनसानी जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे?

 

अमरनाथ यात्रियों के साथ घोर अन्याय

सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद जम्मू-कश्मीर सरकार अमरनाथ धाम की यात्रा के लिए जाने वाले हिन्दू यात्रियों को पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध करवाने में आना-कानी करती रही है। इस हिन्दू यात्रा की अवधि दो मास से घटाकर 39 दिन की कर दी गई है। सरकारी सुविधाओं के अभाव में इस वर्ष इन 39 दिनों में 89 श्रद्धालु हृदयगति रुकने से मौत के शिकार हो गए जबकि 42 शिवभक्तों ने खस्ताहाल सड़कों पर हुई दुर्घटनाओं में दम तोड़ दिया। पवित्र यात्रा के दौरान होने वाली मौतों और फैलने वाले रोगों का स्वत: संज्ञान लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने पूछताछ और सुनवाई प्रारंभ की थी। प्रदेश सरकार की बेरूखी पर अपनी सख्त प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अब न्यायालय ने तीन सप्ताह में सरकार से जवाब मांगा है। यह बात समझने में देर नहीं लगती कि हज यात्रियों को धन के साथ ढेरों अन्य सुविधाएं देने वाली केन्द्र सरकार हिन्दू यात्रियों की चिंता क्यों नहीं करती?

हिमालय पर्वत की ऊंची सुरम्य पर्वत श्रृंखलाओं में एक 13500 फुट ऊंची बर्फानी चोटी पर स्थित श्री अमरनाथ धाम के लिए श्रद्धालुओं को कई प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। हिन्दू संगठन निरंतर मांग कर रहे हैं कि बर्फ गिरने से पूर्व सड़कों की मरम्मत, सार्वजनिक लंगर व्यवस्था, प्रदूषण मुक्त शौचालय, वातावरण को शुद्ध रखने वाले अस्थाई वैज्ञानिक उपकरण, चलते-फिरते चिकित्सालय और पर्याप्त विश्रामस्थल इत्यादि की व्यवस्था की जाए। इस प्रकार की सुविधाएं हिन्दू यात्रियों को मिले और यात्रा की अवधि पुन: दो मास की हो ऐसा सम्भवत: इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज इतना संगठित अथवा शक्तिशाली नहीं है। हिन्दुत्व के लिए इससे बड़ी चुनौती भला और क्या होगी?

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