मनुष्य आनंदकामी है। वह अति प्राचीन काल से ही सुखी देश/भूक्षेत्र में रहना चाहता है। ऋग्वेद (9.113.10 व 11) में प्रार्थना है ‘VɽþÉÆ सारी कामनाएं पूरी होती हों- यत्र कामा निकामाश्र्च, जहां सुखदायी तृप्तिदायक अन्न हों, जहां आनंद, मोद, मुद व प्रमोद हैं – यत्रानन्दाश्च, मोदाश्च, मुद: प्रमोद आसते। कामनाएं जहां तृप्त होती हैं आप हमें वहां स्थायित्व दें।' लेकिन इसके लिए एक श्रेष्ठ राज्यव्यवस्था चाहिए। श्रेष्ठ राज्यव्यवस्था के अभाव में राष्ट्र सुखी नहीं होते। कहते हैं ‘VɽþÉÆ विवस्वान का पुत्र राजा है, जहां विशाल नदियां रहती हैं जहां आनंद का द्वार है आप हमें वहां स्थायित्व दें।' (वही 8) यहां परमवैभवशाली राष्ट्र की कामना है। स्तुति है ‘VɽþÉÆ सूर्य का अखण्ड तेज प्राप्त होता है, उस विनाश रहित क्षेत्र में आप मुझे स्थायित्व दें।' (वही 7) यजुर्वेद के एक सुन्दर मंत्र (22.22) में प्रार्थना है ‘½þ¨ÉÉ®äú राष्ट्र में शूरवीर हों। विद्वान सम्पूर्णता के ज्ञाता हों – ब्रह्मवर्चसी जायताम्। गायें दुधारू हों, परिवार संरक्षक माताएं हों, तेजस्वी गतिशील युवा हों। राष्ट्र में समृद्धि हो। यहां एक भरे पूरे आनंदमग्न राष्ट्र की आकांक्षा है। प्राचीन भारत ऐसा ही आनंदमग्न राष्ट्र था। फिर विदेशी आक्रांताओं ने भारत की व्यवस्था को तोड़ा। इस्लामी-अंग्रेजी शासन विदेशी थे। वे भारतीय जनों के प्रति क्रूर थे। समूचा भारत लड़ा, स्वाधीनता संग्राम चला और अंग्रेज चले गये। 15 अगस्त, 1947 के दिन भारत स्वतंत्र हुआ। इस्लामी-अंग्रेजी शासन की सारी मान्यताएं खत्म करने की जरूरत थी। भारत को भारत की संस्कृति और प्रकृति के अनुसार राज्यव्यवस्था का मार्ग निर्धारित करना था।
राष्ट्रजीवनकाआधारसंस्कृति
पं. दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार प्राचीन को अधुनातन और विदेशी को राष्ट्रानुकूल बनाकर स्वतंत्र भारत की राजनीति का नियमन होना था। गांधी जी ने ‘ʽþxnùº´É®úÉVÉ' में यही रूपरेखा प्रस्तुत की लेकिन संविधान निर्माताओं ने भारत अधिनियम (1935) को ही नये संविधान का आधार बनाया। विश्व के सभी संविधान राज्य व्यवस्था की रूपरेखा हैं। राष्ट्रजीवन संविधान से नहीं चलते। भारत में यह काम संस्कृति करती है। संविधान को संस्कृति का अनुसरण करना चाहिए। संविधान को दर्शन और विज्ञान से भी प्रेरित और सिद्ध होना चाहिए। वरना संविधान कौन मानेगा? भारत के संविधान में भारतीय संस्कृति की अनुगूंज नहीं है। इसमें राष्ट्र का सांस्कृतिक प्रवाह नहीं है। पं. नेहरू ने संविधान निर्माण की शुरुआत में एक संकल्प 13 दिसम्बर, 1946 के दिन रखा था। संविधान सभा ने इसे 22 जनवरी, 1947 के दिन पारित किया। संकल्प बड़ा है। कुछ बातें विचारणीय हैं जैसे ‘ºÉÆÊ´ÉvÉÉxÉ सभा ……..भारत के भावी शासन के लिए संविधान बनाने की घोषणा करती है।' ठीक बात है। दूसरी बात परिशुद्ध राजनीतिक है ‘Ê¥ÉÊ]õ¶É भारत के राज्य क्षेत्र, देशी रियासतें और ब्रिटिश भारत के बाहर के क्षेत्र मिलाकर एक संघ ¤ÉxÉäMÉÉ*’ संकल्प में भारत अखण्ड इकाई और प्राचीन राष्ट्र नहीं है। अनेक राज्य क्षेत्र और रियासतें मिलाकर संघ बनाया जा रहा है। संकल्प का बिन्दु 6 विशेष ध्यान देने योग्य है ‘+±{ÉºÉÆJªÉEòÉå के लिए, पिछड़े और जनजाति क्षेत्रों के लिए, दलित व अन्य पिछड़े और जनजाति क्षेत्रों के लिए तथा अन्य पिछड़े हुए वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षोपाय किए जाएंगे।' पं. नेहरू ने मान लिया था कि यहां अल्पसंख्यक समस्या है। यानी अल्पसंख्यक भारत का अविभाज्य अंग नहीं है। वे पीड़ित हैं। उनकी रक्षा के लिए ही ‘ʴɶÉä¹É रक्षोपाय' शब्द प्रयोग हुए हैं।
संकल्प की आखिरी पंक्तियां भाव प्रवण हैं लेकिन धोखा देती हैं। कहा गया, ‘ªÉ½þ प्राचीन भूमि विश्व में अपना समुचित और गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी और विश्व शान्ति तथा मानव कल्याण के लिए स्वेच्छा से अपना पूरा सहयोग करेगी।' प्राचीन भूमि की जगह ‘|ÉÉSÉÒxÉ राष्ट्र' कहने में क्या हर्ज था? राष्ट्र कहने से भूमि, जन और संस्कृति की त्रयी का एकात्मबोध होता। राष्ट्र गठन में भूमि, जन और संस्कृति तीन घटक हैं। नेहरू के संकल्प में सिर्फ भूमि है। जन और संस्कृति गायब हैं। क्यों? पं. नेहरू भारत के जन को एक ‘|ÉÉSÉÒxÉ जन' नहीं मानते थे। वे आर्यों को बाहर से आया हुआ जानते थे। ‘±ÉÉäMÉ आते गए कारवां बसता गया' की गूंज उनके मन पर थी। यही बात संस्कृति पर भी लागू थी, वे हजारों वर्ष प्राचीन वैदिक संस्कृति से विकसित भारतीय संस्कृति को सामाजिक, मिली-जुली संस्कृति मानते थे। राष्ट्र उनके लिए निर्माणाधीन था। इसलिए उन्होंने ‘|ÉÉSÉÒxÉ भूमि' कहा, प्राचीन राष्ट्र नहीं।
सबसेबड़ासंविधान
अंतत: बना अपना संविधान। भारत के लोगों द्वारा अधिनियमित, आत्मार्पित। हमने दुनिया का सबसे बड़ा संविधान बनाया। संविधान में भारत प्राचीन राष्ट्र नहीं, राज्यों का संघ है। इसमें ‘¦ÉÉ®úiɨÉÉiÉÉ' नहीं है। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा है, ‘<ºÉ¨Éå (संविधान में) भारतमाता की जीवमान चैतन्यमयी कल्पना नहीं। संविधान के प्रथम अनुच्छेद के अनुसार इण्डिया अर्थात भारत राज्यों का संघ होगा' अर्थात बिहारमाता, बंगमाता, पंजाबमाता, कन्नड़माता, तमिलमाता आदि को मिलाकर भारतमाता बनेगी। यह हास्यास्पद कल्पना है। हमने देश की कल्पना भारतमाता के रूप में की है, अलग-अलग माताओं के रूप में नहीं। इसमें अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार है पर इसमें अल्पसंख्यक की परिभाषा ही नहीं है। कानून के समक्ष समता है पर विशेषाधिकार भी हैं। उद्देशिका बड़ी प्यारी पर उसके प्रवर्तन के अधिकार नहीं है। नीति निर्देशक तत्व हैं पर उनके लिए न्यायालय जाने का अधिकार नहीं है। इसमें समान नागरिक संहिता एक महान आदर्श है पर इसके लागू कराने की व्यवस्था नहीं हैं। इस संविधान में दो राष्ट्रगीत हैं। व्यावहारिक रूप में दो राजभाषाएं हैं, अंग्रेजी महारानी है, हिन्दी नौकरानी। ‘EòÉì¨ÉxÉ सिविल EòÉäb÷’ संविधान का नीति निर्देशक तत्व है लेकिन दो तरह के सिविल कानून हैं। जम्मू- कश्मीर के लिए अलगाववादी अस्थायी अनुच्छेद 370 है पर स्थायी से ज्यादा स्थायी है। स्वतंत्र भारत की 65 वर्षीय राजनीति का चेहरा डरावना है। यहां राष्ट्रगीत वंदेमातरम् से भी चिढ़ है। राजनीति अल्पसंख्यकवादी है, राष्ट्रवाद विरोधी है। यह सत्तावादी है, संविधान की मर्यादाएं भी नहीं मानती। यहां क्षेत्र और जाति मजहब की संकीर्णताएं हैं। पूर्वोत्तर के सात राज्यों में राष्ट्र राज्य ही नहीं बचा। असम जल रहा है, आंच पूरे देश में है। कश्मीर में पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे हैं। पूरे देश में आतंकवाद है। एक-तिहाई हिस्से में माओवादी हिंसा है। नस-नस में व्याप्त भ्रष्टाचार है। आधुनिक राजनीति इतिहास से सबक नहीं लेती, संस्कृति अतीत से प्रेरित नहीं होती। राजनीति में घोर चारित्रिक संकट है। यह कमाऊ उद्योग बन गई है। यहां आय से अधिक सम्पदा है। घोर विचारहीनता है। यहां लाभ ही लाभ है। इसीलिए राजनीति में भी ‘Ê´Énäù¶ÉÒ पंूजीनिवेश' (एफ.डी.आई.) की भी चर्चा है।
भारतीय राजनीतिक तंत्र सड़ गया है। जनतंत्र के उद्योग तंत्र में हर चीज बिकाऊ है। दल बदल के रेट हैं। सरकार गिराने/बचाने, वोट देने/न देने और बहस के दौरान अनुपस्थित हो जाने के भी बाजार भाव हैं। थोड़ी पूंजी से बड़ा व्यापार। कभी भी, कहीं भी। यहां प्रत्यक्ष पूंजीनिवेश की मांग है। राजनीतिक दल पूंजीवालों को टिकट देने के लिए तत्पर हैं। पुख्ता जातीय जनाधार वाले दलों के टिकट महंगे हैं। भ्रष्टाचारियों की घुसपैठ ने चुनावों को खर्चीला बनाया है। शायद निर्दोष (?) सांसद इसी मजबूरी में ‘ºÉ´ÉÉ±É के बदले मोटी रकम' योजना चला रहे थे। संसदीय प्रणाली असफल हो गयी। संसद और विधानमण्डल भारत के लोगों का जीवन दर्पण है। सवा अरब भारतजन अपने भविष्य के लिए संसद और विधानमण्डल की तरफ टकटकी लगाए देखते हैं लेकिन पवित्र सदन उन्हें निराश करते हैं। जिनके पास विधान गढ़ने और संविधान संशोधन के भी अधिकार हैं, वही शीलभंग पर उतारू हैं। संसद और विधानमण्डलों में भी अपराधियों का प्रवेश राष्ट्रीय बेचैनी है। राजनीति लाभ का क्षेत्र है। संसद और विधानमण्डल की सीटें हैं ही। हाईकमानों के प्रियजनों के लिए निगम हैं, आयोग हैं, राज्यपाल हैं, राजदूत हैं, नये आयोग और पद सृजन की भी सुविधा हैं। पदधारकों की शाहखर्ची भौचक करती है। दौरों के लिए हेलीकाप्टर हैं। हनक, ठसक है। असलहे हैं। सरकारें सत्तादल के नेताओं पर चल रहे हत्या और लूट के मुकदमें भी ‘VÉxÉʽþiÉ' में वापस लेती हैं। नेता गरियाता है, कानून मिमियाता है। अरस्तु ने ‘{ÉÉʱÉÊ]õCºÉ' (पृष्ठ 401) में बताया था ‘VÉxÉiÉÆjÉ की विशेषता है कि सत्ता उनकी है, कानून उनके नीचे हैं।'
प्रीतिकरथीप्राचीनराजनीति
भारत की प्राचीन राजनीति प्रीतिकर थी। लुडविग ने ऋग्वेद के हवाले से लिखा कि ‘®úÉVÉÉ प्रजा के प्रति उत्तरदायी है।' ऋग्वेद (10.173.1) में कहते हैं, ‘+É{ÉEòÉä अधिपति नियुक्त किया गया है। आपके माध्यम से राष्ट्र का यश कम न हो – मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्।' ऋग्वेद में राजनीतिक स्थिरता के लिए भी स्तुतियां हैं। कहते हैं ‘VÉèºÉä आकाश, पृथ्वी, पर्वत और विश्व अविचल हैं, इन्द्र और अग्नि इस राष्ट्र को स्थिर रूप में धारण करें – राष्ट्रं धारयतां ध्रुव।' (वही 4, 5) राजा शपथ लेने के बाद कहता था ‘ªÉÊnù मैं इस प्रतिज्ञा को तोड़ता हूं तो मेरे जीवन की सारी उपलब्धियां व पुण्य नष्ट हों।' (ऐतरेय ब्राह्मण 8.15) आज संविधान के शपथी ही संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। क्या से क्या हो गया? मैगस्थनीज ने ‘<Îhb÷EòÉ' में भारतीय प्रशासनिक सुदृ़ढ़ता की प्रशंसा की थी। चाणक्य ने 320 ई. पूर्व ‘|ÉVÉÉ हितैषी शासन को सर्वोच्च धार्मिक प्रकल्प' बताया। चीनी यात्री फाह्यान ने ‘¡òÉä-CªÉÉä – कि' में भारतीय शासन को उदार सौम्य व सुव्यवस्थित बताया। इतिहासकार अलबेरूनी ने भी प्राचीन भारत की प्रशंसा की। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजा को निर्देश है कि वह रानियों और पुत्रों से रक्षा का प्रबंध करे। स्वतंत्र भारत की राजनीति में कई दलों की अगुआई ऐसी ही रानियों और पुत्रों के पास है। आज नेता पुत्र/पुत्रियां ही भारत का वर्तमान और भविष्य हैं। अनेक दलों में आजीवन राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, आगे उनके पुत्र/भाई अध्यक्ष बनने की तैयारी में हैं। ईमानदार कार्यकर्त्ता उपेक्षित हैं, पूंजी वाले प्रिय और सक्रिय हैं। दलों में तदर्थ नियुक्तियां हैं।
राजनीति राष्ट्रसेवी ध्येय थी। त्याग और तप की सिद्धि थी, इसी की प्रसिद्धि थी। महात्मा गांधी, विपिन चन्द्र पाल, सरदार पटेल, डा. राममनोहर लोहिया, पं. दीनदयाल उपाध्याय, डा. अम्बेडकर, अटल जी, कुशाभाऊ ठाकरे, मधुलिमये, बाल आप्टे आदि नेता इसके उदाहरण हैं। शुरुआती राजनीति में लोभ-लाभ नहीं थे। संविधान सभा के सदस्यों का कोई वेतन नहीं था। सत्रों के लिए 45 रुपए प्रतिदिन यात्रा भत्ता था। आर्थिक स्थिति पर विचार चला। सभा ने इसे घटाकर 45 रुपए से 40 रुपए कर दिया। 1952 में पहली लोकसभा बनी। 1954 में सांसदों का वेतन भत्ता कानून बना। तबसे लगभग 38 बार वेतन, भत्ता, सुविधाएं बढ़ीं। सांसद विधायक निर्वाचन क्षेत्र निधि आयी। जो माननीय थे, वे जनघृणा के पात्र बने। राजनीति भी घृणा की पात्र बनी और कारोबार हो गयी। संविधान निर्माण के समय ही आशंका थी कि आगे ‘{Éä¶Éä´É®ú राजनीतिज्ञों' का एक वर्ग बन सकता है। वही हुआ। कांग्रेस ने धनबल की राजनीतिक संस्कृति को बढ़ाया। चुनावी राजनीति में करोड़ों की राशि बहाई गई। 1970 के दशक तक जनसंघी, सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट जनता से फटी पुरानी धोतियां रंगकर झंडा बनाते थे। कार्यकर्ता दीवारों पर नारे लिखते थे। लेकिन कांग्रेस तिकड़म से जीत जाती थी। फिर कर्मठता रंग लाई। गैरकांग्रेसी सरकारें आयीं। बाकी दलों का भी कांग्रेसीकरण हुआ। राजनीति काजल की कोठरी हो गई।
पदलिप्साहैवर्तमानराजनीति
समकालीन राजनीति का मतलब पद लिप्सा है। लेकिन 60-70 के दशक तक ऐसा नहीं था। राजनीति तब लोक जागरण थी। सामाजिक परिवर्तन का औजार थी। समाज और राज को बदलने की इच्छा से बेचैन लोग राजनीति करते थे। मार्क्सवादी वैज्ञानिक समाजवाद समझाते थे। समाजवादी बराबरी का नारा देते थे। कांग्रेस सत्ता पार्टी थी लेकिन उसके भी अनेक नेता त्यागी थे। कांग्रेस का लक्ष्य सत्ता था लेकिन समूचे राजनीतिक वातावरण में राष्ट्रसेवा का भाव था। राष्ट्र के वैभव के लिए दीर्घकालीन तपकर्म थे। अपराधी सभी दलांे से डरते थे। दलों के भीतर अनुशासन था। महत्वाकांक्षाए भी थीं लेकिन राष्ट्र सर्वोपरि था। सभी दलों में पढ़ाकू-लड़ाकू, घुमंतू, सिद्धान्तनिष्ठ लोग थे लेकिन क्या से क्या हो गया? सिर्फ 30-35 वर्ष में ही राजनीति मुनाफे का उद्योग बन गयी। हाईकमान प्रबंधक बन गये। वे आपस में ही पद लाभ बांटने लगे। पं दीनदयाल उपाध्याय ने सतर्क किया था कि दलों का रूप कम्पनी जैसा नहीं होना चाहिए, उनका रूप किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान या ज्वाइण्ट स्टाक कम्पनी से अलग प्रकार का होना चाहिए। (पोलिटिकल डायरी, 139) ठीक लिखा था। आधुनिक राजनीति में तमाम दल ‘|ÉÉ<´Éä]õ लिमिटेड Eò¨{ÉxÉÒ’ की तरह चलते हैं। वे एक अच्छी कम्पनी जैसे भी नहीं हैं। ठीक-ठाक कम्पनियां अपने मजदूरों को उचित पगार और बोनस देती हैं। ज्यादातर दलों में पद, प्रतिष्ठा और दायित्वों का सामान्य वितरण भी नहीं है। दल संचालक/मैनेजर निचले स्तर के लोगों को आदर्श और विचार का पाठ पढ़ाते हैं लेकिन इसका असर नहीं होता। आदर्श के प्रचार के लिए स्वयं आदर्शवादी होना पहली जरूरत है।
प्राचीनभारतसेप्रेरणालें
प्राचीन भारत से प्रेरणा लेनी चाहिए और सांस्कृतिक राष्ट्रवादी राजनीति से जुड़े त्यागी नेताओं से भी। भारत में राज्यव्यवस्था का विकास ईसा पूर्व कम से कम 6-7 हजार वर्ष पुराना है। ऋग्वेद में स्वराज्य (1.80 व 8.93), राजधर्म (5.37 व 1.174) राजकर्म (1.25 व 4.42) सहित अनेक स्तुतियों में आदर्श राजनीति के सूत्र हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद में सभा समितियां हैं। सभाध्यक्ष भी हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र लगभग 340 वर्ष ईसापूर्व है। शुक्रनीति की राज्यव्यवस्था में योग्यता को ही नियुक्ति का आधार माना गया है, कर्मियों की नियुक्ति, पदोन्नति योग्यता और काम के आधार पर करे, जाति या कुल के आधार पर नहीं। जातियां कुल श्रेष्ठता के मापदण्ड नहीं हैं- ‘xÉ जात्या, न कुलेनैव श्रेष्ठत्वं प्रतिपद्यते।” (वही 2) लेकिन स्वतंत्र भारत में आरक्षण की राजनीति है, राजनीति का आरक्षण है। बहुत वीभत्स है आधुनिक राजनीति का रूप रंग और चेहरा। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। गरीब भुखमरी के शिकार हैं। सम्प्रति सांस्कृतिक राष्ट्रवादी साम्प्रदायिक हैं और जिन्ना की मुस्लिम लीग से भी ज्यादा साम्प्रदायिक कांग्रेस सेकुलर। संसद भवन के हमलावर दोषसिद्ध आतंकी अफजल को भी यह राजनीति ‘MÉÖ¯û’ मानती है। केन्द्र और यूपी जैसे राज्यों के बजट भी हद दर्जे तक मुस्लिमपरस्त और साम्प्रदायिक हैं। राष्ट्रीय एकता बारूद के ढेर पर है। कट्टरपंथी वोट बैंक की ही उपासना है। बंगलादेशी घुसपैठियों की ‘<xÉEò˨ÉMÉ’ फ्री है। आई.एस.आई. के घुसपैठियों का भी सुस्वागतम् है। मुम्बई हमले के आरोपी पकड़ से बाहर हैं। भारत सरकार मिमियां रही है। राष्ट्र सन्न है और अलगाववादी पाकपरस्त ताकतें प्रसन्न।
राष्ट्रजीवनकीदिशा?
आखिरकार हमारे राष्ट्रजीवन की दिशा क्या है? राष्ट्रजीवन प्रश्नाकुल है। राष्ट्रीय प्रश्न उठाना हमारी प्राचीन परम्परा है। यजुर्वेद में ‘|ɶxÉÉå को देवता' कहा गया है। युधिष्ठिर धर्मराज थे। सत्तावापसी चाहते थे। लोकचेतना के प्रतिनिधि यक्ष ने उनसे अनेक प्रश्न पूछे थे। महत्वपूर्ण प्रश्न था ‘EòÉ {ÉxlÉÉ?’ जीवन मार्ग क्या है? युधिष्ठिर ने कालजयी उत्तर दिया था ऋषि अनेक हैं? श्रुतियां (वेद वचन) भी बहुत है। धर्मतत्व जटिल है, अन्तर्गुहा में है। इसलिए महापुरुषों द्वारा बताया गया मार्ग ही ठीक पन्थ है। श्रीराम, श्रीकृष्ण, शुक्राचार्य, कौटिल्य, दयानंद, विवेकानंद, योगी अरविन्द, शिवाजी, कम्बन, गांधी, हेडगेवार आदि मार्गद्रष्टा महापुरुष हैं। यक्ष का एक और प्रश्न भी बहुत दिलचस्प है। पूछा था ‘ÊEò¨É +ɶSɪÉǨÉÂ?’ सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?' युधिष्ठिर का जवाब था ‘<ºÉ संसार के सभी प्राणी मरते हैं लेकिन इसे स्वीकार नहीं करते और तरह-तरह के उपाय करते हैं।' यही प्रश्न आधुनिक काल में किया जाये कि आज का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? तो उत्तर होगा प्राचीन इस हिन्दू राष्ट्र में अल्पसंख्यकवादी राजनीति है। हिन्दू बहुसंख्यक होकर भी दोयम दर्जे के नागरिक हैं। राजनीति लूट रही है। वे शोषित हैं तो भी चुप हैं। 2012 का स्वाधीनता दिवस ऐसे ही ढेर सारे यक्ष प्रश्न लेकर आया है। जन-गण-मन के अधिनायक और भारत के भाग्यविधाता मौज में हैं। राष्ट्र स्तब्ध। योगी अरविंद के शब्दों में ‘ZÉ{É^õÉ मारकर चुनौती देने वाला समय सामने है।'