लोक जीवन में वर्षा
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सरोकार
मृदुला सिन्हा
किसान के जीवन में बारिश का महत्व सब जानते हैं। फसल के लिए वर्षा होनी चाहिए और समय से होनी चाहिए। तुलसीदास ने समय के सदुपयोग के लिए उपमा दी-
'का वर्षा जब कृषि सुखाने,
समय चूक पुनि का पछताने।'
व्यक्ति के जीवन में समय का भी महत्व है। समय आता है, बीत जाता है। यदि समय की समझ किसी को न हो तो समय बीत जाने पर पछतावा ही होता है। समय को समय से पहचानना चाहिए और वर्षा को समय पर बरसना चाहिए। फसल बोने-रोपने का समय चूक जाने पर वर्षा का भी महत्व नहीं है।
लोकजीवन में वर्षा को निमंत्रण देने की भी लोकरीतियां हैं, तो अधिक वर्षा होने पर उसे रोकने की भी। वर्षा नहीं होती तो खेती-बाड़ी का काम भी बंद। सूखे खेत को लोग निहारते, दु:खी होते रहते हैं। वर्षा नहीं तो खेती नहीं, खेती नहीं तो किसान का भविष्य सुरक्षित नहीं। क्या खाएगा, क्या पियेगा। वर्षा के लिए शास्त्रीय विधि से बड़े-बड़े यज्ञ भी करवाए जाते रहे हैं। महिलाएं अपने ढंग से इन्द्र भगवान को आमंत्रित करती रही हैं। 'पानी मांगने' का एक लोग अनुष्ठान होता है। मिथिलांचल में यह खेल रात्रि को खेला जाता है। महिलाओं और लड़कियों का झुंड कई खेल खेलता है। मेढक (बेंग) को मारना एक बड़ा अनुष्ठान होता है।
लोकविश्वास है कि मेढक, बादल का अन्यतम प्रेमी है। यदि वह कष्ट में होगा तो उसके प्रेमी बादल अवश्य क्षितिज पर आएंगे और फिर वर्षा होगी। असम के निवासी अनावृष्टि होने पर मेढक की शादी करवाते हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के लोगों का विश्वास है कि मेढक का क्रंदन वर्षा के देवताओं द्वारा सुना जाता है। यहां सूखा पड़ने पर महिलाएं शाम को किसी के आंगन में एकत्र होती हैं। मिट्टी के छोटे बर्तन में मेढक पकड़कर रखा जाता है। पांच अलग-अलग घरों से पानी मांगकर उस बर्तन में डाला जाता है। फिर इसे धान कूटने वाली 'ढेकी' में रखकर मूसल से कूटकर मार डाला जाता है। मेढक के मरने के बाद महिलाएं ऊंचे स्वर में पानी की कमी के गीत गाती हैं।
तमिलनाडु में वर्षा के आह्वान के लिए महिलाएं मेढक को बांस के बने पंखे से बांध लेती हैं तथा घर-घर जाकर कहती हैं-'मेढकी को स्नान कराना है, हे वर्षा के देवता पानी दो।' नेपाल के निवासियों के बीच लोक विश्वास है कि मेढक वर्षा के देवता इन्द्र का दूत है।
मरे हुए 'बेंग' को कोई महिला किसी झगड़ालू महिला के घर फेंकती है। सुबह होने पर आंगन में मरे हुए मेढक को देखकर महिला मेढ़क फेंकने वाली को गालियां देती है। लोक विश्वास है कि जितनी गालियां दी जाएंगी, उतनी ही वर्षा की तेज बौछारें पड़ेंगी। इस प्रकार उस क्षेत्र का प्रसिद्ध जट-जटिन का प्रदर्शन आरम्भ में वर्षा के आह्वान के लिए अनुष्ठान के रूप में किया जाता होगा, धीरे-धीरे अनुष्ठान उत्सव में बदल गया और जीवन के हास-उल्लास, संघर्ष आदि के तत्व जुड़ जाने से जट-जटिन जैसे नाट्यरूप अस्तित्व में आये। आज ग्राम्यजीवन में जट-जटिन का प्रदर्शन अनुष्ठानिक (वर्षा के आह्वान के लिए) कम, जनरंजनात्मक अधिक होता है। धीरे-धीरे यह आयोजन अपने अनुष्ठानिक स्वरूप को छोड़ता गया और नाटकीयरूप को प्राप्त करता गया।
लोगों का विश्वास है कि ऐसी लोकपरंपराओं से इन्द्र देव प्रसन्न होते थे। इन्द्र देव लोगों की जरूरत भर ही पानी बरसा दें, ऐसा नहीं होता। कभी-कभी जरूरत से अधिक वर्षा होती है। बाढ़ आ जाती है। आंगन, दरवाजा, खेत-खलिहान, सड़क-पोखर सब पानी से लबालब भर जाता है। दादी कहा करती थीं- 'इस बार तुम लोगों ने इन्द्र देव से अधिक पानी मांग लिया।'
दादी पुराने कपड़ों की एक औरत की आकृति बनाती थीं। उसे आंगन के कीचड़ में गाड़ देती थीं। उनकी यह धारणा थी कि ऐसा करने पर बारिश रुक जाएगी। कहीं-कहीं मेढ़क को भी मारकर टांग दिया जाता है। बारिश अधिक होने पर न जाने कितने जीव-जंतु जमीन के अंदर से निकल आते हैं। इनमें घोंघा और केकड़ा मुख्य हैं। बारिश होने पर छोटे-बड़े घोंघे बहुत निकलते हैं।
केकड़ा भी बारिश के दिनों में ही जमीन से निकलता है। वर्षा के दौरान सांप, बिच्छू, जोंक, कछुआ जैसे अनेक जीव। मच्छर और कीट पतंग भी बहुतायात मात्रा में। इसलिए पानी के अंदर चलना हो या मेड़ पर, किसान बिना लाठी के नहीं चलता था। न जाने कब कहां कौन जीव-जंतु बाहर आ जाए और पौधों को जकड़ ले। वर्षा न होने पर दादी चिंतित होती थीं- 'अब क्या होगा? सूखा पड़ जाएगा। त्राहि-त्राहि मच जाएगी। अकाल पड़ेगा।'
अधिक बारिश होने पर दादी की चिंता गहरा जाती। वे झांकती थीं-'अब क्या होगा। पेट में अन्न नहीं, बाहर निकले तो कीड़े-मकोड़े जान के दुश्मन। सांप काटने से लोग मरेंगे।' वर्षा के साथ ऐसे ही जिआ जाता था। वर्षा ऋतु में अनेक प्रकार के संगीत सुनाई देते हैं जो दूसरे मौसम में नहीं सुनाई देते। संगीतज्ञों द्वारा गाए जाने वाले मल्हार की बात मैं नहीं कर रही। झींगुर, मेढ़क (पीले बड़े मेढक जिन्हें ढाबुस कहा जाता है) का मिलाजुला अलाप सुनने लायक होता है। एक निश्चित ताल स्वर में दोनों मानो मल्हार गाते हैं। तुलसीदास ने तो इनके गायन की वेद पाठ के लय से तुलना कर दी है- 'दादुर धुनि चहुंओर सुहाई, वेद पढ़े जनु वट समुदाई।'
शाम होते ही चारों ओर खुली जगह में जुगनंू का नन्हा प्रकाश दिखता है। तुलसीदास ने भी इनके प्रकाश का मजाक उड़ाया है-
'खगोत जन, जहं तहं करहि प्रकाश।'
इनका भुक-भुक कर जलना मनोहारी दृश्य उपस्थित करता है। भादों की काली अंधेरी रात्रि में तो इनके प्रकाश का अपना अलग प्रभाव होता है। पृथ्वी को रत्नगर्भा कहा गया है। सारे रत्न पृथ्वी से ही निकलते हैं। कोयला और संगमरमर भी। पर बरसात में तो पृथ्वी में छुपे सारे जीव-जंतु बाहर आ जाते हैं। लोक जीवन में अपनी उपस्थिति से भय भी पैदा करते हैं और अधिक वर्षा के कारण आई विषम परिस्थिति में भी पृथ्वी अपने भूमिपूत्रों की जान की रक्षा करती है। वर्षा आवश्यक है और वर्षा ऋतु की विशेष पहचान बनाने वाली लोकरीतियां और जीव-जंतु भी।











