बात बेलाग
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बात बेलाग
समदर्शी
भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक चर्चित अधिकारी रहे हैं टी.के.ए. नायर। लंबे समय तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रमुख सचिव के रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय में रहे नायर देश के सबसे दबंग नौकरशाह रहे हैं और चुपचाप अपना काम करने और कराने में माहिर माने जाते हैं। सत्ता गलियारों की खबर रखने वाले तो यहां तक कहते हैं कि प्रमुख सचिव पद पर रहते हुए नायर ही असल में पीएमओ माने जाते थे और सारे बड़े फैसलों में उन्हीं की चलती थी। इसीलिए प्रमुख सचिव पद से सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने उन्हें अपना सलाहकार नियुक्त कर लिया। सलाहकार के रूप में उनकी कारगुजारियां तो जब सामने आएंगी तब आएंगी, लेकिन प्रमुख सचिव कार्यकाल की एक बानगी सामने आ गयी है। नायर मूलत: केरल के हैं, लेकिन बानगी कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू की है। बंगलुरू देश के सबसे महंगे और शानदार शहरों में से एक है। उसी बंगलुरू के दक्षिणी हिस्से में बीईएमएल की हाउसिंग सोसाइटी में वर्ष 2008 में नायर की भतीजी ए.प्रीति प्रभा और एक पारिवारिक मित्र उमा देवी नांबियार को कौड़ियों के मोल भूखंड आवंटित कर दिये गये, जबकि उनका बीईएमएल से दूर का भी कोई रिश्ता नहीं रहा। इस आवंटन का समय संदेह को और भी गहरा देता है। ये आवंटन उस समय किये गये, जब टाट्रा ट्रक सौदे में बीईएमएल अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक वीआरएस नटराजन की भूमिका की बाबत शिकायतें प्रधानमंत्री कार्यालय, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और रक्षा मंत्रालय में लंबित थीं। यह वही टाट्रा ट्रक हैं, जिनकी खरीद के लिए रिश्वत की पेशकश का सनसनीखेज खुलासा सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने पिछले दिनों किया था। फिर भी नायर का दावा है कि इन आवंटनों में कहीं कोई अनियमितता नहीं हुई। पर इस सवाल का जवाब कोई नहीं दे रहा कि अगर आवंटन नियमानुसार थे तो फिर भूखंड वापस क्यों कर दिये गये?
नाटक चालू आहे
'मिशन यूपी' के फ्लॉप शो से पस्त कांग्रेसी 'युवराज' एक बार फिर सक्रिय हो रहे हैं। पहले 20 हजार से अधिक वोट पाने वाले उम्मीदवारों को बुलाकर दिल्ली में समीक्षा दरबार सजाया और फिर खुद उत्तर प्रदेश जाकर कार्यकर्त्ताओं में फिर से जोश भरने की कोशिश की। बेशक राजनीति चुनावी हार-जीत से परे एक सतत् प्रक्रिया है, बशर्ते वह नौटंकी के बजाय गंभीर सोच और समर्पण से की जाये। पर 'युवराज' के दरबारियों को तो कुछ और आता ही नहीं। मिशन यूपी का पूरा ब्लू प्रिंट 'युवराज' ने खुद तैयार किया, उस पर अमल की नीति-रणनीति भी उन्होंने ही बनायी, लेकिन जब चुनावी भंवर में नैया डूब गयी तो ठीकरा कमजोर संगठन के सिर फोड़ दिया गया। दिल्ली की समीक्षा बैठक से लेकर 'युवराज' के फिर-फिर उत्तर प्रदेश दर्शन तक यही राग अलापा जा रहा है, पर नेहरू परिवार की अपनी राजनीतिक जमीन अमेठी-रायबरेली में भी कांग्रेस की लुटिया डूब जाने के बाद अब कांग्रेसी कार्यकर्त्ता भी मुखर होने लगे हैं। ताजा दौरे में 'युवराज' को कई जगह तल्ख शिकायतें भी सुननी पड़ीं, जिन पर घाघ राजनेता की तरह उन्होंने कह दिया कि भितरघातियों को बख्शा नहीं जाएगा। बेशक भितरघाती किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती बम की तरह होते हैं। पर जब 'युवराज' ने खुद ही 40 प्रतिशत कांग्रेसी टिकट अन्य दलों से आये दल-बदलुओं को थमा दिये थे तो वह किन भितरघातियों के विरुद्ध कार्रवाई करेंगे?
जियो और जीने दो
पिछले कुछ समय से राजस्थान में कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विरुद्ध पार्टीजनों के ही असंतोष की खबरें लगातार आ रही थीं। बेशक मतदाताओं ने कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया था और जोड़तोड़ की सरकार चलाना वाकई मुश्किल होता है। फिर गहलोत की छवि कभी भी अच्छे प्रशासक की नहीं रही। सत्ता की मलाई मिलने की उम्मीद में कुछ अरसा तो कांग्रेसी शांत रहे, पर गुजरते वक्त के साथ उनकी बेचैनी और असंतोष बढ़ने लगा। राजस्थान के कांग्रेसियों के इस असंतोष को दिल्ली में पदारूढ़ राजस्थानी कांग्रेसियों ने भी इस उम्मीद में हवा देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी कि क्या पता, नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति में उनका ही दांव लग जाये। लेकिन गहलोत भी इसी कांग्रेस में पले-बढ़े हैं। सो, उन्होंने राजस्थान में तबादलों पर लगा प्रतिबंध हटा लिया है। इस दांव का असर भी दिखने लगा है। राजस्थान के कांग्रेसियों को अपना चिर-परिचित काम मिल गया है, जिसमें मलाई पाने का हुनर तो उन्हें आता ही है। इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि राजस्थान से कांग्रेसी असंतोष की खबरें आना रुक जाएं और गहलोत फिर से चैन की बंसी बजाते नजर आयें।










