राज्यों से
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जम्मू-कश्मीर/ विशेष प्रतिनिधि
0 क्रिकेट में पाकिस्तान की हार पर बौखलाए प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे पुलिसकर्मी 0 पुनर्वास नीति के अन्तर्गत पुलिस में भर्ती किए गए हैं ये अलगाववादी
कश्मीर घाटी में अलगाववादी-आतंकवादी भारत विरोधी नारे लगाएं, पाकिस्तान जिंदाबाद बोलें, यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन स्थिति उस समय गंभीर हो जाती है जब राज्य सरकार के कर्मचारियों, विशेषकर पुलिस बल में से भी ऐसे स्वर उभरने लगते हैं तथा पुलिस अपना दायित्व निभाने में साम्प्रदायिक सोच के साथ अमानवीय व्यवहार करने लगती है। इस संबंध में पिछले दिनों में कुछ चौंका देने वाली घटनाएं एक बार फिर से सामने आने लगी हैं।
पिछले दिनों बंगलादेश में आयोजित एशिया कप प्रतियोगिता के दौरान एक क्रिकेट मैच में पाकिस्तान भारत से हार गया। इस पर भारतीय खेल प्रेमियों ने देशभर में कई स्थानों पर आतिशबाजी कर खुशियां जताई। किन्तु जम्मू के कठुआ क्षेत्र में स्थित एक पुलिस प्रशिक्षण शिविर में विचित्र स्थिति पैदा हो गई। पुलिस का प्रशिक्षण ले रहे जम्मू के कुछ हिन्दू युवकों द्वारा भारत की जीत पर खुशियां मनाने पर उसी शिविर में प्रशिक्षण पा रहे कश्मीर युवकों ने पहले विरोध किया और फिर उत्तेजित होकर भारतविरोधी तथा पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए। इससे पुलिस प्रशिक्षण शिविर में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। वरिष्ठ पुलिसकर्मी तथा प्रशासनिक अधिकारी तनाव को देखते हुए इस प्रशिक्षण शिविर में आए और अब मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है। इस घटना पर टिप्पणी करते हुए एक स्थानीय समाचार पत्र ने लिखा है कि जो पुलिसकर्मी पाकिस्तान की क्रिकेट टीम पर भारत की विजय को सहन नहीं कर पा रहे हैं, वे पाकिस्तान द्वारा छेड़े गए अलगाववाद और आतंकवाद से कैसे लड़ेंगे?
उल्लेखनीय यह भी है कि इस प्रशिक्षण शिविर में प्रशिक्षण पा रहे अनेक या कहें कि अधिकांश युवक ऐसे हैं जो कभी आतंकवादी थे या जिन्हें सुरक्षाबलों पर हमले और पत्थरबाजी करने के आरोप में पकड़ा गया था। बाद में उन्हें सुधरने या पुनर्वास के नाम पर पुलिस में भर्ती किया गया है।
एक अन्य घटना- कुछ दिनों पूर्व राजौरी जिले में हिन्दुओं के एक धार्मिक जुलूस पर पत्थर फेंके गए तथा भारत विरोधी नारे लगाए गए। लेकिन पुलिस- प्रशासन ने कानून का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने की बजाय मामले को दबाना चाहा। फिर दोनों पक्षों के कुछ युवकों को पकड़ लिया। जब तनाव बढ़ा तो कफ्र्यू लगा दिया गया। इस एकपक्षीय और साम्प्रदायिक सोच के विरुद्ध जब आंदोलन शुरू हुआ तो वहां सशस्त्र पुलिस बल की नियुक्त कर दी गई, जिसमें पुनर्वास नीति के अंतर्गत भर्ती किए गए अलगाववादी कश्मीरी युवकों की बहुसंख्या है। इन पुलिस वालों ने कफ्र्यू के बीच लोगों के घरों में घुसकर अपनी बर्बरता का प्रदर्शन किया। पुलिस की इस बर्बरता के विरुद्ध विश्व हिन्दू परिषद तथा अन्य राष्ट्रवादी संगठनों ने कड़ा विरोध किया, जम्मू बंद रखा, तब कुछ प्रशासनिक अधिकारियों को वहां से हटाने के अतिरिक्त राज्य की इस “साम्प्रदायिक” पुलिस को हटाकर वहां केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल को तैनात किया गया।
चिंता की बात तो यह है कि अलगाववादियों के बढ़ते दबाव के मद्देनजर इस राज्य से सैनिकों तथा अद्र्धसैनिक बलों की संख्या कम करके उनके स्थान पर राज्य पुलिस को बड़े स्तर पर गठित किया जा रहा है। राज्य पुलिस की संख्या 35000 से बढ़ाकर एक लाख से भी अधिक करने की योजना है, जिसका सारा खर्च केन्द्र सरकार को वहन करना होगा। लेकिन इस पुलिस में पुनर्वास नीति के अन्तर्गत बड़ी संख्या में उन कश्मीरी युवकों को भर्ती किया जा रहा है जो पूर्व में आतंकवादी और अलगाववादी गतिविधियों में लिप्त थे। अलगाववादियों की बहुतायत वाली राज्य पुलिस के हाथों में जम्मू-कश्मीर कितना सुरक्षित होगा और हिन्दू कितने सुरक्षित, बताने की जरूरत नहीं।द
प.बंगाल/ बासुदेब पाल
माओवाद-आई.एस.आई. गठजोड़ का एक और खुलासा
लोगों की गरीबी, बेकारी, अशिक्षा की आड़ में सत्ता के विरुद्ध संघर्ष के नाम पर शुरू हुई हिंसक माओवादी विचारधारा का तरीका तो शुरू से ही गलत था, पर जो रास्ता उन्होंने चुना, अब वे उससे भी भटक गए हैं और सत्ता-व्यवस्था के विरुद्ध अब वे भारतविरोधी पाकिस्तान से भी हाथ मिला रहे हैं, उसकी मदद ले रहे हैं, उसे सहायता दे रहे हैं। इसका खुलासा पहले भी कई बार हो चुका है, खुफिया विभाग को इसके अनेक प्रमाण मिल चुके हैं। इसी कड़ी में गत दिनों कोलकाता में पुलिस की “स्पेशल टास्क फोर्स” के जवानों ने जब एस. रामकृष्णन सहित 4 माओवादियों को पकड़ा तो उनसे पूछताछ में अनेक चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा हुआ। माओवादी सरगना रामकृष्णन और उसके साथियों (दीपक कुमार, सुकुमार मण्डल, शम्भू पाल और वाणी मुदि) को सुरक्षाबलों ने फिल्मी अंदाज में दिन-दहाड़े भीड़ भरे कालेज स्ट्रीट इलाके से पकड़ा। धरपकड़ के बाद जब इनके कोलकाता स्थित ठिकाने का पता चला और वेलधारिया स्थित एक किराए के घर पर छापेमारी की गई तो वहां से राकेट लांचर और सुरंग विस्फोटक (लैंड माइन्स) बनाने की योजना का खुलासा हुआ और उसके लिए आवश्यक सामग्री भी मिली। पता चला कि रामकृष्णन पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर है और वही ये घातक हथियार बनाने की तैयारी कर रहा था। पर इसके कल पुर्जे कहां से आए, जब इसका खुलासा हुआ तो पहले से हैरान सुरक्षाबलों की चिंता और बढ़ गई।
पूछताछ में रामकृष्णन ने पुलिस को बताया कि कोटेश्वर राव उर्फ किसनजी (जोकि अब मारा गया है) के समय में माओवादियों का उल्फा से संबंध घनिष्ठ हुआ। किसनजी और उल्फा के कमाण्डर इन चीन परेश बरुआ के मित्रवत् संबंध थे। उन दिनों परेश बरुआ चटगांव और ढाका से अपनी गतिविधियां संचालित कर रहा था। अवैध हथियारों के व्यापार और आतंकवादी गतिविधियों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. उसे मदद दे रही थी। आई.एस.आई. का एक प्रमुख अधिकारी मुहम्मद असलम ही इस सबको अंजाम दे रहा था। यही मुहम्मद असलम परेश बरुआ के माध्यम से किसनजी से मिला और इस तरह माओवादियों और आई.एस.आई. के बीच संबंध बना। रामकृष्णन ने बताया कि शुरू-शुरू में असलम के माध्यम से आई.एस.आई. ने नगद सहायता देने का प्रलोभन दिया, लेकिन उससे इसलिए इनकार कर दिया गया क्योंकि डर था कि इस बहाने आई.एस.आई. कहीं नकली भारतीय नोट न थमा दे और उसे चलाने के चक्कर में माओवादी पकड़े जाएं। तब उल्फा प्रमुख परेश बरुआ ने आई.एस.आई. के मध्यम से माओवादियों को हथियार भिजवाने की कवायद शुरू की। इससे आई.एस.आई. को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए एक नया साथी मिला, माओवादियों को हिंसा के लिए हथियार मिले और परेश बरुआ को हथियारों की बिक्री के लिए एक और खरीददार।
सुरक्षा बलों द्वारा मुठभेड़ में माओवादी नेता किसन जी को मार गिराए जाने के बाद से माओवादियों के हौसले पस्त थे। उनका मनोबल फिर से बनाने और किसनजी की मौत का बदला लेने के लिए रामकृष्णन के नेतृत्व में 4 अन्य माओवादी कोलकाता महानगर आ गए। उनकी सोच थी कि जंगल के बाहर भीड़-भाड़ वाले इलाके में उन्हें कोई पहचान नहीं पाएगा। उनका इरादा था इन राकेट लांचरों और लैंड माइन्स का निर्माण कर ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में विकास के कार्यों में लगी सरकारी योजनाओं पर हमला कर उन्हें तबाह कर देना। ताकि सरकार हतप्रभ रह जाए, विकास रुक जाए और उनका भय बना रहे।
रामकृष्णन की गिरफ्तारी से इस बात का भी खुलासा हुआ है कि आई.एस.आई. माओवादियों के बीच यह गठजोड़ केवल पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका संजाल देश भर में फैल चुका है। पूछताछ में पता चला कि राकेट लांचर और लैंड माइन्स के कलपुर्जे अलग-अलग कर उन्हें सामान्य परिवहन ट्रकों के माध्यम से रायपुर (छत्तीसगढ़) भी भेजा गया था। कोलकाता पुलिस व गुप्तचर विभाग की सूचना पर जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने रायपुर के कुछ गोदामों और ट्रांसपोर्ट कार्यालयों पर छापेमारी की तो खमतराई और सरस्वती नगर थाना क्षेत्र के दो गोदामों में 75 डिब्बों में बंद नट-बोल्ट व पाइप बरामद हुए। अनुमान है कि इनसे 500 राकेट लांचर तैयार किए जा सकते थे। इन सबको जब्त कर लिया गया है और पुलिस इन्हें मंगाने और पहुंचाने वालों की खेाज कर रही है। रायपुर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी दीपांशु काबरा का कहना है कि बंगाल खुफिया विभाग ने यदि पुख्ता सूचना नहीं दी होती तो 15 लाख की आबादी वाले रायपुर शहर से इस प्रकार के कलपुर्जे ढूंढना बहुत मुश्किल होता। अब खुफिया विभाग ने देशभर के अन्य उन स्थानों को भी सूचित कर दिया है जहां राकेट लांचर बनाने के लिए उसके कलपुर्जे भेजे गए हैं।द











