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Mar 17, 2012, 12:00 am IST
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"हिन्दुस्थान में लाहौर"

दिंनाक: 17 Mar 2012 18:24:07

“हिन्दुस्थान में लाहौर”

द  मुजफ्फर हुसैन

यह छोटा-सा शीर्षक चौंका देने वाला है। जब इस शीर्षक से दैनिक डॉन ने सम्पादकीय लिखा तो उसके पाठक चौंक गए। भला पाकिस्तान सरकार इस दुस्साहस को किस प्रकार सहन कर सकती थी। लेकिन पाकिस्तान की जनता ने इस पर कोई शिकायत नहीं की। भारत की जनता भी खुश नहीं हुई। एक समय जरूर था कि लव के नाम पर बसे उस नगर के लिए भारतीय लालायित रहते थे। विभाजन के समय भी उसे भारत में बनाए रखने के अनेक प्रयास किये, लेकिन रेडक्लिप का पत्थर कलेजा उसे भला किस प्रकार स्वीकार कर सकता था। रेडक्लिप और उसके दो साथियों ने इस नगर को भारत में शामिल करने के लिए बड़ी रिश्वत मांगी। तत्कालीन लाहौर के आर्य समाज के नेताओं का कहना था कि जब इस नगर की जनसंख्या में 60 प्रतिशत हिन्दू हैं, तो फिर इसे पाकिस्तान को किस प्रकार दिया जा सकता है? इसकी गुहार दिल्ली तक लगाई गई। लेकिन एक भी माई का लाल ऐसा नहीं था कि वह रेडक्लिप की तृष्णा को शांत कर देता। इसलिए लाहौर पाकिस्तान के हिस्से में गया। अब केवल उसकी यादें भारत में हैं, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं।

लाहौर की पृष्ठभूमि

लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि एक बार फिर से लाहौर भारत में बसाए जाने के समाचार दुनिया ने सुने और पाकिस्तान के अखबारों ने उसकी चर्चा अपने पन्नों पर की। भारत में लाहौर  बसाने के लिए किसी सरकार को मजबूर नहीं होना पड़ा। लेकिन ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की जो घटना पाकिस्तान में घटी, उसे फिल्माने का निश्चय हालीवुड की एक कम्पनी के मन-मस्तिष्क में आया। यह विषय इतना रोमांचकारी और दिलचस्प है कि कोई भी दर्शक और निर्देशक उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है। ओसामा जैसे कुख्यात आतंकवादी की मौत पर फिल्म बनाना सिनेमा जगत के दिग्गजों का एक आकर्षक और प्रिय विषय होना स्वाभाविक है। वास्तव में तो यह घटना एबटाबाद में घटी थी। पाकिस्तान के इस्लामाबाद से यह नगर कोई बहुत दूरी पर नहीं है। फिर भी एबटाबाद एक अंजान स्थान है। इसलिए फिल्म निर्माता ने सम्पूर्ण घटनाक्रम लाहौर की पृष्ठभूमि में फिल्माना तय किया। किन्तु पाकिस्तान सरकार तो अपने माथे पर लगे इस कलंक को अपने यहां फिल्माने की आज्ञा भला किस प्रकार दे सकती है? इसलिए इस विषय पर फिल्म बनाने वाली हालीवुड की कम्पनी ने भारत के नगर चंडीगढ़ में इसे फिल्माने का तय किया। यानी पाकिस्तान के लाहौर की हलचल और उसका वातावरण चंडीगढ़ में “मिनी लाहौर” बसा कर पैदा करने का प्रयास किया गया। वहां हालीवुड की निदेशक कैथरीन बिगोली फिल्म की शूटिंग कर रही हैं। कैथरीन का कहना है कि सतत 6 माह के प्रयास के पश्चात् भी पाकिस्तान सरकार ने फिल्म बनाने की अनुमति उन्हें नहीं दी।

विचारों का खुलापन

तब वह निराश होकर भारत आ गईं। यहां उन्होंने कई स्थानों का दौरा किया लेकिन उन्हें मात्र चंडीगढ़ ही पसंद आया। उन्हें ऐसा लगने लगा कि वह यहां पर अपनी फिल्म को अधिक सजीव और दर्शनीय बना सकेंगी। निर्देशक को चंडीगढ़ में लाहौर बसाने और तैयार करने में बहुत समय नहीं लगा। वह जिस प्रकार की परिस्थिति चाहती थीं वह मिल गई। उनका कहना था कि पाकिस्तान में आज्ञा मिल भी जाती तब भी उन्हें इस्लाम के नाम पर अनेक शर्तें माननी पड़तीं। सम्भवत: वहां का रूढ़िवादी समाज उसके लिए बगावत भी कर देता। अब पाकिस्तान के किसी भी नगर में खुलापन नहीं है। वह शहर हो या देहात सभी स्थानों पर कट्टरवादी वातावरण देखने को मिलता है। वह अपनी शूटिंग में यथार्थवादी वातावरण को प्रस्तुत करने का प्रयास करतीं। लेकिन जन सामान्य अथवा तो वहीं की सरकार उसे अपने समाज के लिए ठीक नहीं मानती तो वह क्या कर सकती थीं? पाकिस्तान के हर नगर में अब मजहबी संकीर्णता के दर्शन होते हैं। अपनी शूटिंग में उन्हें कुछ बुर्काधारी महिलाएं दिखानी थीं। पता नहीं पाकिस्तान का समाज और सरकार उसे किस रूप में लेती। यदि उसका विरोध होता तो फिर सम्पूर्ण सेट ही तहस-नहस करना पड़ता। चंडीगढ़ में पचासों महिलाएं बुर्का ओढ़े घूम रही थीं। इतना ही नहीं फिल्म में यथार्थ लाने हेतु वहां कुछ रिक्शा चलाए गए। उनकी नम्बर प्लेट बदल देनी पड़ी। किसी को ऐसा नहीं लगे कि यह पाकिस्तान का भाग नहीं है। जब लाहौर को दर्शाना था तो फिर कुछ दुकानों पर उर्दू में लिखे बोर्ड भी लगाने पड़े। चंडीगढ़ में पंजाबी में लिखे बोर्ड तो सामान्य बात है। आपको हिंदी और अंग्रेजी में भी मिल जाएंगे। लेकिन वहां उर्दू में लिखे बोर्ड दिखाई पड़ना कठिन ही नहीं असम्भव है। इसलिए उर्दू में बोर्ड बनाए गए और दुकानों पर इस तरह से लगाए गए कि मानो वह लाहौर का ही क्षेत्र हो।

हालांकि कुछ संगठनों ने इस बात पर आपत्ति जताते हुए विरोध प्रदर्शन किए कि फिल्म में भारत को अलकायदा की धरती व पाकिस्तानी बाजार को चण्डीगढ़ में दर्शाना गलत है। लोगों का यह विरोध बाजिव भी था। जब यह मालूम हुआ कि ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने किस तरह से घेरा और उसका काम तमाम किया  उसे दर्शाने के लिए यह फिल्म तैयार की जा रही है तो लोग शांत हुए। निदेशक भारतीयों के इस व्यवहार से बड़ी खुश थीं। ओसामा पैदा हुआ यमन में, पला-बढ़ा सऊदी अरब में और आतंकवादी बनकर भटकता फिरा अफगानिस्तान के जंगलों में, मारा गया पाकिस्तान में, लेकिन उस पर फिल्म बनी हिन्दुस्थान में। इसे भी भारतीय विचारों के खुलेपन का एक “चमत्कार” ही कहना चाहिए।

इस शूटिंग में एक ऐसा मोड़ भी आया जब भारतीयों ने उसे न केवल नकार दिया, बल्कि उसका विरोध करने के लिए सेट के आस-पास एकत्रित हो गए। मामला बहुत ही संवेदनशील था। फिल्म के सेट  पर जब पाकिस्तान का झंडा फहराया गया तो चंडीगढ़ के राष्ट्रवादी भारतीयों को यह पसंद नहीं आया। उन्होंने निदेशक के सम्मुख अपना विरोध प्रदर्शित किया और इस बात की चेतावनी दी कि हिन्दुस्थान की धरती पर पाकिस्तान का झंडा नहीं फहराया जा सकता है। विरोध कर रहे लोगों ने सवाल किया कि यहां से दिल्ली का लालकिला कितना दूर है? हमारी संसद दिल्ली में है, जो भारत की सार्वभौमिकता और एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है। पाकिस्तान में हुई ओसामा की मौत की घटना को लेकर यदि चंडीगढ़ में पाकिस्तान का ध्वज फहराया जा सकता है तो आने वाले कल को यह हरकत दिल्ली के लालकिले और भारतीय संसद पर भी की जा सकती है। इसलिए इस मामले में हम कोई समझौता नहीं कर सकते हैं।

भारत के प्रति विष-वमन

दैनिक डॉन ने अपने सम्पादकीय के लगभग अंतिम हिस्से में विश्व हिन्दू परिषद् की बात की है। पत्र लिखता है कि विश्व हिन्दू परिषद् राष्ट्रवादियों का संगठन है। यह समाचार नगर में फैलते ही, स्वयंसेवक बंधु बाहर निकल आए। उन्होंने फिल्म के निदेशक को चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान का झंडा हम यहां किसी भी स्थान पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह हमारे राष्ट्र के स्वाभिमान का प्रश्न है। डॉन लिखता है कि निदेशक ने अपनी शूटिंग के लिए जहां-जहां पाकिस्तानी झंडे लगाए थे, वहां से उखाड़ कर फेंक दिए गए। फिल्म की जहां शूंटिग हो रही थी वहां के वातावरण को सांकेतिक तौर पर बताना और बात है, जबकि चंडीगढ़ में पाकिस्तानी झंडे लगाकर वातावरण को बदलने का प्रयास दूसरी बात है। कैथरीन को जितनी सहायता देनी थी भरपूर तरीके से दी गई, लेकिन हर जगह पाकिस्तानी झंडा लगाया जाना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

उक्त घटना के पश्चात् पाकिस्तानी मीडिया में यह छपा कि भारत के नगर चंडीगढ़ में पाकिस्तानी झंडों को उखाड़ कर फेंक दिया गया। कई स्थानों पर पाकिस्तान के झंडे का अपमान हुआ। एक ऊर्दू अखबार ने यह भी लिखा कि इस प्रतिक्रिया के बाद चंडीगढ़ में लगे उर्दू के बोर्डो को भी हटा दिया गया। अच्छा यह होता कि पाकिस्तान के मीडिया ने भारतीयों की इस उदारता और सहनशीलता की प्रशंसा की होती। लेकिन जनता को बिना कारण बताए भारत के प्रति विष वमन करते रहना, वहां के नेता और मीडिया की आदत हो गई है। फिल्म अभी अधूरी है लेकिन अमरीका ने किस तरह से अपने जानी दुश्मन को हलाक किया इसे देखने के लिए विश्व की जनता आतुर है। अमरीका ने लगभग सम्पूर्ण गाथा को अनेक बार टेलीविजन पर प्रदर्शित कर दिया है, लेकिन एक फिल्म के रूप में जब दुनिया ओसामा की मौत को देखेगी तो अवश्य ही आतंकवाद पर लानत-मलामत करेगी। द

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