साहित्यिकी दिंनाक: 05 Dec 2011 11:20:19 साहित्यिकी योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' नई ताजगी भर जाती हैं पुरखों की यादें मन को दिया दिलासा, दुख के बादल जब छाए खुशियां बांटी संग, सुखद पल जब भी घर आए सपनों में भी बतियाती हैं पुरखों की यादें स्वार्थपूर्ति का पहन मुखौटा मिलता हर नाता अवसादों के अंधड़ में जब नजर न कुछ आता बड़े प्यार से समझाती हैं पुरखों की यादें कभी तनावों के जंगल में भटके जब-जब मन और उलझनें बढ़ती जाएं दूभर हो जीवन नई राह तब दिखलाती हैं पुरखों की यादें क्षण नुकीले डा.तारादत्त निर्विरोध क्षण नुकीले हुए जा रहे, बंध ढीले हुए जा रहे। उम्र आधी हुई जा रही, घाव पीले हुए जा रहे। कल तलक जो हरे थे यहां, लोग नीले हुए जा रहे। सूखती जा रही देह के, प्राण गीले हुए जा रहे। थे कंगूरे मगर रेत के, आज टीले हुए जा रहे। एक था सर्प, उसके यहां दस कबीले हुए जा रहे।