साहित्यिकी दिंनाक: 26 Nov 2011 12:41:14 घमण्डी लाल अग्रवाल घूंसा खाते एक दिन, खाते हैं जो घूस। मुस्काती है जिंदगी, रक्त मनुज का चूस।। गायब अब सच्ची हंसी, मिश्रित इसमें गर्ज। सांसों में निशि दिन पले, सिर्फ स्वार्थ का कर्ज।। पहुंच और नौकरी का, है ऐसा संबंध। जैसे काई का रहे, पोखर से अनुबंध।। बांट रही है यह सदी पीड़ा-दु:ख-संत्रास। इसलिए मानव दिख रहा, चिंतित और उदास।। गैया गुमसुसी खड़ी, पंछी सभी अधीर। आज सूख क्यों है गया, आंखों वाला नीर।। न्यायालय में भीड़ है, सच का नहीं गवाह। चोरी-डाका डालकर, करो खूब निर्वाह।। खोल भ्रष्टता के दिए, जिसने ज्यादा पृष्ठ। राजनीति में वह हुआ, उतना ही उत्कृष्ट।। कहां गुलाबों को मिले, पूरा आदर-मान। गोभी वाले फूल की, क्या प्यारी मुस्कान।। जिस पथ की मंजिल नहीं, उस पर चलना व्यर्थ। इस जीवन को दीजिए, निशि दिन नूतन अर्थ।। राजभवन की खिड़कियां, करने लगीं गुहार। कहो कहां पर कैद है, शीतल-मंद बयार प्रश्न मशालें कर रहीं, कहां गए वे लोग। चखते थे जो क्रांति का, हंसकर मोहन भोग।।